नूरुस्सबाह खान ‘सबा’ की गज़लें : ‘दौर ही ऐसा है क्या करे आदमी…’/’ख्यालों में कोई जब झांकता है…’ और ‘जब तलक ज़लज़ला नहीं आता…’
▪️ [1] दौर ही ऐसा है क्या करे आदमी अपने साए से भी अब डरे आदमी ज़िन्दगी ज़ोर - व - ज़ुल्मत के साए में...