विमोचन : ‘मुझे सत्ता नहीं रोटी चाहिए/हिकारत और एहसान के दर्प में लिपटी नहीं/हक और आत्मीयता के ताप में पकी हुई/और इस रोटी के लिए सत्ता चाहिए/जिसमें सबके हिस्से की अपनी रोटी हो…’ : इन पंक्तियों के कवि घनश्याम त्रिपाठी का ‘ समुद्र को बांधना अभी शेष है’ के बाद ‘ जो रास्ता संघर्षमय होता है’ का विमोचन
👉 [बाएँ से] घनश्याम त्रिपाठी, कैलाश बनवासी, प्रो. सियाराम शर्मा, मदन कश्यप, नासिर अहमद सिकंदर, मीता दास, वासुकि प्रसाद ' उनमत्त' और एन. पापा राव...