■बसंत रितु के गीत : दुर्गा प्रसाद पारकर. 4 years ago मोर हिरदे के भँवरा ह गुनगुनावत हे मया के दवना ह महमहावत हे बसंती पुरवाही करत हे चारी रंगे के दिन आगे बही तोर पारी...
■वसंत ऋतु पर दो कविताएं : ■देवेश द्विवेदी ‘देवेश’. 4 years ago ♀ वसंत मञ्जरी लगी आमों पर कोयल भी गान करे भंवरा भी गुनगुनाय आला वसन्त है। वसन्ती बयार चले नदिया भी खिलखिलाय धरती के अधरों...
■कविता आसपास : डॉ. कमलेंद्र कुमार श्रीवास्तव. 4 years ago ♀ कोरोना सुन ले मेरी ♀ डॉ. कमलेंद्र कुमार श्रीवास्तव [ जालौन,उत्तरप्रदेश ] दुष्ट कोरोना अब तू सुन तेरी अब तो आफत आई । मास्क...
■छतीसगढ़ी कविता : डॉ. बलदाऊ राम साहू. 4 years ago ♀ बसंत आ गे ♀ डॉ. बलदाऊ राम साहू [ दुर्ग,छत्तीसगढ़ ] देखौ जी, रितु बसंत आ गे, धरती के मन हरसागे। आमा रूख मा...
■कल से लेकर आज़ तक : छत्तीसगढ़ी कविताओं में वसंत. ■अरुण कुमार निगम[दुर्ग]. 4 years ago भारतवर्ष में तीन मुख्य ऋतुएँ ग्रीष्म, वर्षा और शीत होती हैं। चार उप-ऋतुएँ भी होती हैं - शरद, हेमन्त, शिशिर और बसंत। इन सब ऋतुओं...
■इस माह के कवि : समीर उपाध्याय [गुजरात]. 4 years ago ♀ हिंद की रूह है हिंदी. हिंद की रूह है हिंदी। संस्कृत की बख़्शीश है हिंदी। इंसानियत का पैग़ाम है हिंदी। हिंद की रूह है...
■कविता आसपास : समीर उपाध्याय. 4 years ago ♀ रूह मिलन की ऋतु : वसंत. ♀ समीर उपाध्याय. [ चोटीला, जिला-सुरेन्द्र नगर,गुजरात ] वासंती वैभव की छटा है निराली। चारों दिशाओं में बहार...
■भावांजलि : लता मंगेशकर. 4 years ago ♀ गीता विश्वकर्मा 'नेह' स्वर की देवी सुर साम्राज्ञी लता दीदी तुम थी तो खूब । मेरे अधरों पर थे प्यारे गाए तेरे गीत रसीले,...
■’रोज़ डे’ पर उत्खनन मिली 1997 की सतह पर एक पुरानी कविता- शरद कोकास. 4 years ago उपहार में दी जाने वाली नाज़ुक वस्तुओं के साथ अपेक्षाएँ जुड़ी होती है जो कभी नहीं टूटती बेरोज़गारी के दिनों में जेबखर्च से पैसे बचाकर...