ग़ज़ल -सुमन ओमानिया, नई दिल्ली
6 years ago
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जिनसे थी अनजान सदा मैं
रही ढूंढती पहचान सदा मैं
जिससे थी अन्जान सदा मैं
रही ढूढ़ती पहचान सदा मैं….
रोज चुराई आँखे उनसे
अब बिन देखें हैरान सदा मैं….
बात भला कैसे सहज करूँ
करती उनका सम्मान सदा मैं….
पलता था जो मेरे ही भीतर
प्रेम से खुद परेशान सदा मैं….
प्रेम उनका , अमृत जैसा
करूँ नित्य पान सदा मैं….
वे प्रेम गीत मैं जीवन संगीत
गुनगुनाती प्रेम गान सदा मैं….
ख्वाब अधूरे होंगे हमारे पूरे
दिल में रखी अरमान सदा मैं..
chhattisgarhaaspaas
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