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संस्मरण : जब दोनों देवियां हमारे घर उतरी और फिर चली गई : राजिम [छत्तीसगढ़] का त्रिवेणी संगम और हमारे घर का आध्यात्मिक संगम – कैलाश जैन बरमेचा

🌷 **जब दोनों देवियाँ हमारे घर उतरीं…
और फिर चली भी गईं** 🌷
दुर्ग शहर की हवा उस दिन ज़रा अलग ही थी।
मानो किसी अनदेखे सौभाग्य ने शहर को हल्की-सी मुस्कान दे दी हो।
और फिर…
एक-एक करके दो देवियाँ हमारे घर उतरीं—
🌹 सरोज जीजी
🌹 सरिता (छोटी साली)
इन दोनों के संग जो उजाला घर में भरा,
वह सिर्फ हँसी की गूँज नहीं थी—
वह जीवन की वह ऊर्जा थी जो वर्षों तक मन को तृप्त रखती है।
उनके कदम पड़ते ही लगा जैसे
घर नहीं, पूरा आँगन खिल उठा हो…
और खुशियों का एक अनोखा मेला हमारे भीतर उतर आया हो।
🌼 सरोज जीजी — व्यक्तित्व की वह ढाणी, जिस पर शब्द भी नतमस्तक हो जाते हैं
सरोज जीजी का घर में प्रवेश होना
एक साधारण घटना नहीं—
यह एक आशीर्वाद है।
उनकी बातें… उनका वह रसपूर्ण बोलना…
मानो नदी का अविरल प्रवाह।
न रुकती हैं, न थमती हैं,
और सुनने वाले का मन भी कभी तृप्त नहीं होता।
कभी-कभी ऐसा लगता है—
उनकी वाणी में कोई दिव्य धारा बहती है,
जो हर तनाव, हर चिंता को बहा ले जाती है।
जीजी दूसरों के लिए अपना हिस्सा काट देना कोई त्याग नहीं समझतीं—
बल्कि स्वभाव समझती हैं।
दुख में सबसे आगे,
सुख में सबसे पीछे,
और हर परिस्थिति में…
सबका हाथ थामकर खड़ी रहने वाली वह आत्मा
जिसकी छाया में जीवन सुरक्षित हो जाता है।
हम जब मानसिक रूप से टूट रहे थे,
दुनिया समझे या न समझे,
जीजी ने साधु बनकर हमें भी संभाला,
माँ को, और मंजू (मेरी पत्नी) को भी समझाया।
उनकी यह करुणा शब्दों से परे है—
जीवन में ऐसे लोग मिल जाएँ,
तो समझ लो
ईश्वर अपने किसी दूत को भेज देता है।
🐦 सरिता — चिड़िया जैसी चहकती, घर को जीवंत बना देने वाली मिठास
सरिता का स्वभाव तो जैसे ताजी सुबह हो—
चहचहाती, मुस्कुराती,
और मन को हरा कर देने वाली।
उसकी आवाज़ में वह चुलबुलाहट है
जिसे सुनकर
माँ और पिताजी तक प्रफुल्लित हो जाते थे।
मानो पुरानी थकी हुई डाली पर
अचानक कोई महीन खुशबू वाला फूल खिल गया हो।
सरिता की बातें ऐसी हैं कि
बस उसके पास बैठो…
और समय रुक जाए।
उसकी हँसी,
उसकी मासूमियत,
उसका अपनापन—
सब मिलकर घर में ऐसी सुख-धारा बहा देते हैं
कि मन कह उठे—
“बस… यह पल यहीं थम जाए।”
🌸 मंजू के चेहरों पर खिला हुआ सुख का उजाला
इन दोनों बहनों के साथ रहकर
मेरी पत्नी मंजू के चेहरे पर जो चमक आई—
वह देखने लायक थी।
उसका भाव साफ कह रहा था—
“यह मेरे अपने हैं…
मेरी आत्मा के हिस्से हैं…
और इनके संग मुझे पूरा जीवन मिलता है।”
तीनों बहनों की हँसी,
तीनों की रात की बातें,
खाना बनाते समय की नोकझोंक,
मस्ती, यादें, और प्यार—
इन सबने घर में एक ऐसा जीवन–ऊर्जा भरी
जो हर किसी के भीतर शांति और आनंद की तरंग बनकर दौड़ गई।
🌊 राजिम का त्रिवेणी संगम… और हमारे घर का आध्यात्मिक संगम
ये दोनों देवियाँ—
राजिम की,
जहाँ तीन पवित्र नदियों का संगम है।
और सच कहूँ,
जब ये दोनों बहनें और मंजू एक साथ आँगन में बैठीं—
तो लगा जैसे
दुर्ग शहर में ही त्रिवेणी संगम उतर आया हो।
त्रिवेणी संगम—
जहाँ लोग अपने दुख बहाकर आते हैं,
जहाँ आत्माएं शांति पाती हैं,
जहाँ अस्थियों का विसर्जन भी
मुक्ति का मार्ग बन जाता है।
उसी तरह
इन तीनों बहनों का मिलन
हमारे घर में इतना आध्यात्मिक था
कि हर दुख, हर क्लेश, हर तनाव
मानो चुपचाप बहता चला गया।
उनके तीन स्वभाव—
सरोज जीजी की करुणा,
सरिता की चहचहाहट,
और मंजू की मधुर शांति—
जब एक साथ मिले,
तो वह संगम
जीवन के हर कोने को पवित्र कर गया।
🌼 ( सरोज जीजी की होने वाली बहू का दिव्य प्रवेश)
और इस बार एक और शुभ घड़ी बनी—
जब सरोज जीजी की होने वाली बहू,
ऋषिकेश की जीवनसंगिनी बनने वाली कन्या,
हमारे घर के आँगन में आई।
उसके पगलिया—
यानी घर की देहरी पर उसके पावों का पहला स्पर्श—
मानो एक पवित्र ऊर्जा की धारा लेकर आया।
जैसे ही उसने आँगन में कदम रखा,
ऐसा लगा कि
पूरे घर में सकारात्मक तरंगें फैल गईं।
हवा हल्की हो गई,
रौशनी जैसे और कोमल हो उठी,
और मन में एक अनकही शांति उतर गई।
उसकी उपस्थिति में
एक अलग ही सुखद अनुभूति हुई—
मानो किसी शुभ संस्कार के फूल चुपचाप घर में बिखर गए हों।
उस पल ने
सरोज जीजी के सुख-सौभाग्य को भी
और हमारे परिवार के भविष्य को भी
एक पवित्र स्पर्श दे दिया।
उसका सौम्य, विनम्र, संस्कारी स्वरूप
अपने आप में एक दिव्य आशीर्वाद जैसा प्रतीत हुआ—
और दिल ने कहा—
“घर की लक्ष्मी ने पहली बार कदम रखा है…”
💔 और अब… जब वे जा रही हैं…
क्या कहूँ…
दिल का एक कोना खाली हो गया है।
आज घर की हवा धीमी लग रही है,
सीढ़ियाँ शांत हैं,
आँगन जैसे किसी आवाज़ की प्रतीक्षा में है।
काश…
यह दोनों बहनें एक हफ्ता और रुक जातीं—
तो ये दिन
हमारी जीवन-भर की यादें बन जाते।
पर नियम तो नियम है—
आना भी तय… जाना भी तय।
फिर भी…
वे जो प्रेम,
जो अपनापन,
जो हँसी,
जो यादें छोड़ गई हैं—
वे हमारे दिलों में
हर दिन एक नया उजाला भरती रहेंगी।
और सच कहूँ—
जब वे थीं…
घर सिर्फ घर नहीं—
एक पवित्र संगम था।
और जब वे चलीं—
तो बस मन ने धीरे से कहा—
“कोई अपना लौट गया।”

▪️ • कैलाश जैन बरमेचा
[ दुर्ग-छत्तीसगढ़ ]
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chhattisgarhaaspaas
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