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कृति से कृतिकार की रचना : कृति- ‘बिना शीर्षक’ : कृतिकार- राकेश भारद्वाज
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फैसला
– राकेश भारद्वाज

ज़िंदगी से परेशान मायूस
बैठा देख कर एक दिन,
एक आवाज़ ने पूछा मुझसे,
तैयार हो मेरे साथ चलने को..?
पलट कर देखा,
एक बड़ी सौम्य-सी,
मुस्कुराती सफ़ेदपोश आकृति
मेरे पास खड़ी थी…
कौन हो ? पूछा मैंने…
मैं मौत हूँ,
ज़िंदग़ी की जुड़वाँ बहन…
अमूमन दिखाई नहीं देती,
पर होती हमेशा आस पास हूँ…
ज़िंदग़ी की बेवफ़ाई के शिकार,
और उसके सताए हुओं का
हाथ थामने को…
पर मुझे ये शाप है कि,
ज़िंदगी जिन्हें त्याग देती है,
सिर्फ़ उन्हीं को अपना सकती हूँ…
या फिर उन्हें,
जो ज़िंदगी का ख़ौफ़नाक
असली चेहरा देख लेते है
और उससे छुटकारा चाहते हैं…
मैंने कहा,
हाँ मैंने देखा है ज़िंदग़ी को,
उसके ख़ूबसूरत मुखौटे के अंदर के
ख़ौफ़नाक चेहरे को…
उससे जुड़ी हुई हर चीज़ को
बेनक़ाब देखा है मैंने…
क्या तुम मुझे अपनाओगी..?
बहुत अकेला हूँ,
ज़िंदगी से मिले अपनों की ख़ुदगर्ज़ी से
टूटा हुआ हूँ,
दोस्तों की बेरुख़ी का सताया हुआ हूँ,
दुश्मनों के ख़ौफ़ का मारा हुआ हूँ,
ज़िंदगी से बहुत डरा हुआ हूँ…
मौत ने मुस्कुराते हुए कहा…
तभी तो पूछ रही हूँ,
तैयार हो मेरे साथ चलने को..?
मैं ज़िंदगी की तरह
बेवफ़ा नहीं हूँ,
कभी किसी से दग़ा नहीं करती,
लोगों को ज़िंदगी से
हज़ारों शिकायतें होती हैं…
पर किसी को मुझसे
कभी कोई शिकायत नहीं होती…
मैंने मौत की आँखों में झाँका,
उसकी बातों में
ईमानदारी की झलक दिखी,
जो ज़िंदगी के साथ गुज़रे वक़्त में
ज़िंदगी की बातों में
कभी नहीं दिखी…
ज़िंदगी ने तो सदा छला है मुझे,
उसने जो जैसा दिखाया,
वो वैसा कभी नहीं मिला है मुझे…
बस मैंने मन बना लिया,
मौत पर भरोसा करने का…
मैंने मौत के बढ़े हाथ की तरफ़
अपना हाथ बढ़ा दिया मंज़ूरी का…
पर मेरे साथ चलने की कुछ
औपचारिकताएँ निभानी ज़रूरी हैं,
तुम्हें ज़िंदगी का साथ
विधिवत छोड़ना होगा,
मौत ने कहा…
मतलब? मैंने ठिठक कर पूछा…
तुम्हें किसी हादसे का शिकार होना होगा,
ज़िंदगी से अपना पिंड छुड़ाना होगा…
और मौत मेरा हाथ थामकर
नदी के पुल की तरफ़ चल पड़ी…
उसका इरादा भाँपकर मैंने कहा,
नहीं, मुझ डूबने से डर लगता है,
दम घुटने का बड़ा ख़ौफ़ है मुझे,
किसी ऊँची इमारत से कूदना ठीक होगा…
ठीक है, उस सामने वाली
ऊँची इमारत पर चलते हैं…
और मौत ने रुख़ मोड़ लिया !
तभी ज़िंदगी ने
अपना जाल फेंका…
घर में,
समाज में, अपनों का ख़याल
मेरी तरफ़ फेंका…
ज़ालिम दुनियाँ में
कैसे होगी उनकी बसर,
ये सवाल उठाया…
और मेरे गले में पड़े,
जिम्मदारियों के पट्टे को
ज़ोर से झटका…
मौत ने भी झटका महसूस किया,
उसने मेरी तरफ़ देख कर
मुझे सचेत किया…
ये ज़िंदगी की चाल है,
उसका मायाजाल है, बचो…
ये रिश्ते ये नाते सब,
ज़िंदगी के प्रपंच हैं,
इनका विचार त्याग दो…
बस उस इमारत को देखो,
जो तुम्हें मुझसे मिलाएगी,
और तुम्हारे सब दुखों का
समूल नाश करेगी…
ज़िंदगी ने पैंतरा बदला,
एक झटका और दिया,
मेरे दिल में ऊँचाई से गिरने का,
एक नया ख़ौफ़ पैदा कर दिया,
और मैं इमारत की ऊँचाई को देख कर,
ठिठक गया !
मौत सब देख रही थी…
उसने मेरी आँखों में झाँका,
फिर सबकुछ जानने वाली,
अट्टहास-सा करती,
एक मुस्कान के साथ,
मौत ने मेरा हाथ छोड़ते हुए कहा…
नहीं, अभी तुम तैयार नहीं हो,
ज़िंदगी की ग़ुलामी से
बग़ावत के लिए…
अभी उसके पैदा किए हुए हादसे
तुम्हें डराते हैं…
अभी तुम्हारे जज़्बात भी,
ख़ुदगर्ज़ रिश्तों की गिरफ़्त में हैं !
नहीं, अभी तुम तैयार नहीं हो,
मेरे साथ चलने के लिए…
पर मायूस न हो,
ये दुर्दशा सिर्फ़ एक तुम्हारी ही नहीं,
हज़ारों, लाखों हैं जो ज़िंदगी की क़ैद में,
छटपटा रहे हैं,
पर उसके छलावों के आगे,
लाचार हैं…
लेकिन तुम यूँ निराश न हो,
मैं तुम्हें विश्वास दिलाती हूँ,
जिस दिन तुम सचमुच तैयार हो जाओगे,
मेरे साथ चलने की शर्तों को पूरा कर पाओगे,
उस दिन मैं तुम्हें निराश नहीं करूँगी,
हमेशा के लिए अपने साथ ले लूँगी…
मैं तुमसे दूर नहीं हूँ, यहीं आस पास हूँ…
और फिर मौत ओझल हो गई…
और मैं..?
ज़िंदगी से मायूस,
उसके मायाजाल में क़ैद,
और अब मौत की नज़रों में भी कमज़ोर,
सर झुकाए, भारी क़दमों से,
मैं ज़िंदगी की अपनी कालकोठरी की ओर मुड़ गया…
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chhattisgarhaaspaas
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