poetry

कविता, कब-तक यों चलते जायेंगे ? – डॉ.सुभद्रा खुराना, भोपाल-मध्यप्रदेश

जीवन गतिशील है गति ही प्रगति देती है आशावान बने रहे कब तक यों चलते जायेंगे ? उभरेंगे चाँदी के तारक सिहरेंगे, ढलते जायेंगे। कब...

ग़ज़ल -शुचि ‘भवि’

किसी ख़ुशी से इन्हें अब ख़ुशी नहीं मिलती किसी भी चेहरे की रंगत खिली नहीं मिलती लिखा था तुमने जो ख़त में हमारा नाम कभी...

गीत -शुचि ‘भवि’

बिन सूरज के जैसा होगा रोज़ यहाँ पर दिन मेरा भी जीवन वैसा ही मीत तुम्हारे बिन चिड़ियों का कलरव है ग़ायब मन ठहरा-ठहरा फ़लक...

देव उठनी, प्रबोधिनी एकादशी, तुलसी विवाह पर विशेष कविता -आलोक शर्मा

जागेंगे आज जगतपति जागेंगे आज जगन्नाथ उठेंगे योगनिद्रा से जगत के पालनहार सोयी नहीं है सबकी प्रार्थना जागती रही है मनोकामना विनय के , हमारे...
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