poetry

कविता, मन- डॉ. बीना सिंह

राज की बात मैं आज बताती हूं मेरे अंदर भी एक समंदर उछलता है कभी इधर तो कभी उधर बच्चों सा नादान भोला भाला मन...

कविता, कब-तक यों चलते जायेंगे ? – डॉ.सुभद्रा खुराना, भोपाल-मध्यप्रदेश

जीवन गतिशील है गति ही प्रगति देती है आशावान बने रहे कब तक यों चलते जायेंगे ? उभरेंगे चाँदी के तारक सिहरेंगे, ढलते जायेंगे। कब...

ग़ज़ल -शुचि ‘भवि’

किसी ख़ुशी से इन्हें अब ख़ुशी नहीं मिलती किसी भी चेहरे की रंगत खिली नहीं मिलती लिखा था तुमने जो ख़त में हमारा नाम कभी...
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