बाल ग़ज़ल : डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’ 8 months ago अब क्या सोच रहे हो लल्ला ? किसको देख गये हो झल्ला। गेंद लिए गुमसुम बैठे हो, छोड़ कहाँ आए हो बल्ला । आज तुम्हें...
छठ पूजा पर्व पर विशेष : भावना संजीव ठाकुर 8 months ago ▪️ छठ पूजा-सूर्य, सत्य और संयम का महापर्व - भावना संजीव ठाकुर [ रायपुर-छत्तीसगढ़ ] भारतीय संस्कृति के असंख्य पर्वों में छठ पूजा अपनी अद्भुत...
साहित्य स्तम्भ ‘आरंभ’ के इस अंक में पढ़ें कुछ लघु कथाएँ : केंद्रीय विद्यालय में पदस्थ डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय की रचनाओं को 9 months ago 🟥 वक्त तुम नदी हो? लेखन सामान्यतः दो तरह से किया जाता है। पहला -आपके अन्दर कोई विचार अनायास कौंधे और आप कलम उठाने के...
विशेष अवसर पर विशेष कविता : अमृता मिश्रा 9 months ago ▪️ दशहरे की रात - अमृता मिश्रा [ अध्यापिका, दिल्ली पब्लिक स्कूल, भिलाई-छत्तीसगढ़ ] आज रात फिर रावण जला! हर- घर हर मन हर्षोल्लास पला।...
‘आरंभ’ श्रृंखला-2 : डॉ. प्रेम कुमार पाण्डेय 9 months ago [ • प्रगतिशील एवं जन-विचारधारा की साहित्यिक संस्था 'आरंभ'. साहित्य का कोई अंत नहीं होता,अंत ही प्रारंभ है और इसी उद्देश्य को लेकर हमने गठित...
बेटी दिवस पर दो कविताएं : डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय [केंद्रीय विद्यालय सरायपाली, छत्तीसगढ़] 9 months ago ▪️ बेटी छोटी- बिटिया सम्भालती है घर को माँ की तरह. छोटे भाई की पोंछती है नाक झाडू-बुहारू चौका- चूल्हा आए- गए में हाथ बटाती...
इस माह की ग़ज़ल : फरीदा शाहीन 9 months ago [ • छत्तीसगढ़ भिलाई की फरीदा शाहीन, भारतीय स्टेट बैंक में उप प्रबंधक के पद पर पदस्थ हैं. • शाहीन जी कॉलेज के दिनों में...
साहित्यिक स्तम्भ ‘आरंभ’ : नूरुस्सबाह खान ‘सबा’ 9 months ago [ • इस माह से हम 'छत्तीसगढ़ आसपास' में एक नया स्तम्भ 'आरंभ' प्रकाशित कर रहे हैं. यह स्तम्भ प्रगतिशीलता एवं जन विचारधारा को समर्पित...
महेन्द्र मद्धेशिया की लघु कविताएँ 9 months ago •1 आदिवासी गीत उसने ढोल बजाना नहीं छोड़ा, हालाँकि उसका जंगल बेचा जा चुका था। वह गाता रहा, क्योंकि गीत ही उसकी सबसे बड़ी जमीन...
इस माह की रचनाकार : डॉ. दीक्षा चोबे [दुर्ग-छत्तीसगढ़] 9 months ago ▪️ बादर आथे [ छत्तीसगढ़ी गीत ] बादर आथे घेरी बेरी, पानी ला बरसाथे। गली खोर मा चिखला माते, घाम घलो तरसाथे।। रेचक मेचक लइका...