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साहित्य स्तम्भ ‘आरंभ’ के इस अंक में पढ़ें कुछ लघु कथाएँ : केंद्रीय विद्यालय में पदस्थ डॉ. प्रेमकुमार पाण्डेय की रचनाओं को

11 months ago
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वक्त तुम नदी हो?

लेखन सामान्यतः दो तरह से किया जाता है। पहला -आपके अन्दर कोई विचार अनायास कौंधे और आप कलम उठाने के लिए मजबूर हो जाएं। दूसरा – बीज कोई और दे। उस बीज की प्रकृति के अनुरूप आप उसे अपनी मेघा या मन में बो दें। फिर धीरे-धीरे वह पुष्पित- पल्लवित होने लगे और आप उसे काग़ज़ पर उतार दें। मुझे भी एक विषय मिला ‘वक्त’। विषय के अनुरूप मैंने इसे मेधा में रोपित किया और आज काग़ज़ पर उतार रहा हूं।

वक्त क्या है? शायद एक‌ प्रवाह। जिस तरह इस ब्रह्माण्ड का आदि अंत नहीं है वह अभी भी विस्तार पा रहा है ठीक उसी तरह वक्त भी मात्र प्रवाह है। हम अपनी सुविधानुसार उसे ठहरा हुआ वक्त,बीता हुआ वक्त, खुशी का वक्त,गम का वक्त, जज्बातों का वक्त आदि आदि नाम दे देते हैं।

यदि गंभीरता से विचार किया जाय तो जो प्रवाह है वह खण्ड- खण्ड हो ही नहीं सकता। यह तो वैसा ही हुआ जैसे हम नदी के पानी को विभिन्न पात्रों में भरकर कहें ,बाल्टी का पानी,गिलास का पानी,बोतल का पानी।हम अपने द्वारा अपनाई गई सीमाओं का आरोप जल पर कर रहे हैं। वक्त बस वक्त है वह न खुशी का होता‌ न दुख का,न ठहरता,न उसके जज़्बात होते हैं। उसका कोई भूत ,भविष्य, वर्तमान नहीं होता। मनुष्य अपनी मन: स्थिति, परिवेश को वक्त पर आरोपित करके उसे खण्ड-खण्ड करने का प्रयास करता है।
हमारी अपनी सीमाएं हैं वक्त की नहीं। जब इस धरती पर मनुष्य नहीं था तब भी वक्त था। आपके होने न होने,हंसने-गाने, चीखने -चिल्लाने आदि का कोई प्रभाव वक्त पर पड़ता ही नही‌ं।हम हैं वक्त को बनाने संवारने में लगे हुए हैं। यह कितना बड़ा दम्भ है। हम संवार खुद को रहे हैं और कहते हैं वक्त को संवार रहे हैं। उचित परिश्रम‌ न करने के कारण जब असफलता हाथ लगती है तो आरोपित कर देते हैं कि वक्त खराब है। यह सारी प्रकृति क्रिया की प्रतिक्रिया स्वरूप गतिशील है। जड़,जंगम,चेतन जो कुछ भी उपलब्ध है वह सब स्वयम् में ब्रह्म ही है और वहीं ब्रह्म अपने जैसा सृजित करके सृष्टि को गति प्रदान कर रहा है। वक्त और‌ ब्रह्मांड दोनों अन्योन्याश्रित हैं, इन पर अपनी भावनाओं और मन:स्थिति को आरोपित करके उसे खण्ड-खण्ड करने का मतलब है कि हम अपनी लघुकथा का ही परिचय दे रहे हैं।

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बौना कौन?

बात बड़ी टटकी ही है पर आप लोगों से साझा किये बिना रह नहीं पा रहा हूं ।
विद्यालय में विद्यालय प्रबंधन समिति की बैठक होनी थी। नामित अध्यक्ष से कुछ कागज़ों पर हस्ताक्षर अत्यावश्यक थे, साथ ही इसी संबंध में कुछ खरीदारी करनी थी। मैंने विद्यालय की डाटा इंट्री ऑपरेटर से कहा कि चलो दोनों काम करके आ जाएं। उसे ले जाना अनिवार्य था क्यों कि ज़रूरत पड़ने पर वह संवाद कर सकती थी। तेलगु में संवाद की मेरी अपनी सीमाएं हैं।
इस आपरेटर की भी अपनी राम कहानी है। पसंद से विवाह, वैधव्य,एक छोटी बच्ची की मां और पति की मृत्यु के लिए उसे दोषी मानते हुए ससुर द्वारा किया गया केस,कोर्ट के चक्कर। पति द्वारा उसके नाम पर लिए गये लोन की भरपाई। समय स्वयं समस्या की काया धारण कर उसे निरंतर डराया करता।
यह संयोग ही था कि हम जिस उद्देश्य से गये थे हमारा काम सहज ही होगा। जब हम बाज़ार में सारा सामान खरीद चुके तब उसने आग्रह किया कि सर मेरी मां आज घर पर ही हैं,मेरा घर पास ही है , मेरे घर चलिए। समय कम था पर मैं उसके आग्रह को ठुकरा न सका। मां आज घर पर हैं ,इस वाक्य से ध्वनि हो रहा था कि वे “कामकाजी महिला हैं” मैंने जिज्ञासा शांत करने के लिए पूछा कि किस डिपार्टमेंट में काम करतीं हैं? उसने सकुचाते हुए बताया कि वे कुली हैं। उत्तर भारत में कुली रूढ़ हो गया है रेलवे स्टेशन पर यात्रियों का भार उठाने वालों के लिए। मैंने भी यही समझा कि शायद रेलवे स्टेशन पर रजिस्टर्ड कुली हो,लेकिन मैं जिस स्थान की बात कर रहा हूं वह बहुत छोटी जगह है। कुछ गाड़ियां ही रुकती हैं। कुली के लिए विशेष काम कुछ दिखा नहीं। मेरे पूछने पर उसने स्पष्ट किया कि वे कहीं भी जाकर काम पा लेती हैं जैसे किसी का घर बन रहा हो, सड़क बन रही हो। इतनी जानकारी के बाद घर जाना तो अनिवार्य हो गया। उसने पहले ही फोन कर दिया था। मेरे घर पहुंचने पर मां ने स्वागत किया। मेरे लिए प्रतिबंधित होने पर भी मैंने उनके लाये शीतल पेय को स्वीकार कर लिया। मां कहीं से कुली नहीं लग रहीं थीं। चेहरे पर आभा, आंखों में चमक,रंग गेहुंए से हल्का दबाव हुआ पर उसे काला नहीं कहा जा सकता था। उस महिला और उसके काम में कोई सामंजस्य नहीं दिख रहा था। मां बेटी एक साथ रह रही थीं, भाई विवाह के बाद पत्नी के साथ अलग रहता था। वे जिस घर में रहते थे उसे घर कैसे कहूं ?एक कमरा वह भी चौकोर नहीं। कुछ गोलाई लिए हुए। वही किचेन, ड्राइंगरुम और बेडरूम सब कुछ था। यह गोलाकार कमरा भी किसी रिश्तेदार की कृपा पर उपलब्ध था। मैं वहां से चला आया पर उन आंखों की चमक और चेहरे की आभा मेरा साथ नहीं छोड़ रही थीं। जिसके जीवन में इतना संघर्ष हो उसके चेहरे पर इतनी शांति कैसे हो सकती है? ऐसी शांति तो बड़े-बड़े साधकों को लम्बी साधना के बाद नसीब होती‌ है।

खैर बात आई गई हो गई। अब मेरी दिनचर्या में जुड़ गया कि डाटा इंट्री ऑपरेटर दिखी नहीं कि एक ही सवाल “मां कैसी हैं? काम पर गई हैं या नहीं?” एक दिन पूछने पर उसने बताया कि आज मां काम पर नहीं बल्कि तिरुपति अस्पताल गई हैं। मुझे लगा कि तबीयत खराब होगी किसी विशेषज्ञ डाक्टर को दिखाने गई होंगी लेकिन उसने बताया कि वे आटो बुक करके डागी (कुत्ते)को लेकर गई हैं। कुत्ते का पैर टूट गया है,वह खड़ा नहीं हो पा रहा है। मैंने कहा ये कैसे हुआ? उस दिन तो डागी को मैंने घर में नहीं देखा। उसने तब जो कुछ बताया उसे सुनकर मैं स्तब्ध ही नहीं रहा बल्कि मेरी हैसियत उस कुली के सामने कीड़े मकोड़े सी हो गई। अभी तक वे मां-बेटी दया की पात्र लग रहीं थीं आज मैं स्वयं अपने आप को उनकी दया का पात्र महसूस करने लगा। उसने बताया कि उसके घर में कोई कुत्ता नहीं है। घर के सामने स्ट्रीट डाग पर किसी ने गाड़ी चढ़ा दी,वह रात भर रोता रहा, इसीलिए मां आज काम पर नहीं गई बल्कि उस पिल्ले को लेकर हास्पिटल गई है। मैंने अनुमान लगाया कि आटो वाला तिरुपति आने-जाने का कम से कम पांच सौ रूपए चार्ज करेगा साथ ही दवा का खर्च। एक कुली का कितना बड़ा दिल होगा? कितनी विराट सोच होगी?अपनी रोटी के लिए संघर्षरत होने पर भी इतने गहरे तक जीव दया से ओतप्रोत! कहां से लाते हैं लोग इतनी करुणा। बुद्ध का करुणा का यह श्रोत कहां से प्राप्त होता होगा? बड़ी बड़ी पोथियां पढ़कर भी मैं वहां तक नहीं पहुंच पाऊंगा जहां वह करुणामयी मां आसीन हैं। अब उस मां के चेहरे की चमक, आंखों की दिव्यता और चेहरे पर पसरे सुकून का रहस्य खुलने लगा था।

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पाती

माघ का जाड़ा था। इस साल खर्रा इतना पड़ा कि पेड़ों के पत्ते दोना हो गए । घरों में दिन-रात अलाव जलता, शाम पांच बजते-बजते घरों के दरवाज़ें बंद हो जाते। खाने के बाद पानी पीने की इच्छा नहीं होती, पानी को देखकर ही शरीर में फुरहुरी उठती । जिनको खाने-पीने की सुविधा है,उनके लिए जाड़ा आनंद का मौसम है, खाओ-पीओ और शरीर बनाओ । गरीब आदमी तो पेट में पैर डालकर जाड़ा काटता है।
घर में शादी- विवाह की हलचल खत्म हो गई थी। मौसम के चलते सभी कुछ मंद गति से चल रहा था । ऐसे में बाबू जी कनटोप लगाए अलाव ताप रहे थे । इनका मौन मेरे अंदर खौफ पैदा कर देता है, क्योंकि –मौन के बाद की ध्वनि कलेजा चीरकर रख देती है। एकाएक बाबूजी ने कहा- क्यों अरविंद मुम्बई नौकरी पर नहीं जाना है क्या ? शादी हुए पंद्रह दिन बीत गए,सारे मेहमान कब के जा चुके हैं। मेहरारू को अगोर कर बैठने से पेट थोड़े ही भरेगा। नौकरी छूट गई तो क्या करोगे ? इस बातचीत का छोर पकड़ में नहीं आ रहा था। कहूं तो क्या कहूं ? गला फंस गया था , मुम्बई की चालों और बनिए का मनहूस- सा चेहरा मेरे सामने घूम गया । खखार कर मैंने कहा- कौन सी सरकारी नौकरी है ? बनिए की नौकरी है एक छोड़ो हजार मिलती है । मन के चोर को छिपाते हुए मैंने कहा – वहां छूट जाएगी तो यहीं कुछ करूंगा । बाबू जी फिर मौन हो गए । जितना लम्बा मौन होगा उतनी गहरी बात होगी , मैं समझ रहा था।
बाबू जी ने कहा- देखो अरविंद जब पढ़ने का समय था, तब तुमने खूब लड़कदहेड़ी की, भागकर मुम्बई चले गए। दो पैसा कमाया, इससे इलाके में मेरी प्रतिष्ठा बढ़ गई । लोग कहते हैं- पण्डित जी का लड़का मुम्बई में रहता है। तुम क्या करते हो, कैसे पैसा कमाते हो यह वहां देखने कोई नहीं जाता । परिवार की बनी बनाई प्रतिष्ठा को बचाकर रखना तुम्हारी जिम्मेदारी है । अभी किसी से उधार मांगूं तो चट दे देगा,क्योंकि तुम मुम्बई में कमाते हो,तुम अपने दिमाग से यह बात निकाल दो कि तुम यहीं कुछ करोगे।यहां गांव में क्या धरा है कि तुम कुछ करोगे। परदेश की नौकरी गांव में खाली हींग की डिबिया की तरह गमकती है । पढ़ाई के बूते तुम्हें कोई कलेक्टरी मिलेगी नहीं ,गांव घर में कुली कबाड़ी का काम कर नहीं सकते,इज्जत का सवाल है । तुम घर के अकेले लड़के हो मां-बाप नहीं चाहेंगे कि लड़का परदेश में रहे,लेकिन परिवार की इज्जत के लिए सीने पर पत्थर रखना पड़ता है ।हमारे बाबू मरे थे तो एक एकड़ जमीन और यह घर छोड़ गए थे । मैंने बहुत कुछ बनाया नहीं तो बिगाड़ा भी नहीं,अपनी पंडिताई के बल पर
परिवार की प्रतिष्ठा बढ़ाई । दूर-दूर से लोग सगुन बिचरवाने आते हैं। किसी का कुछ गुमा नहीं कि पंडित जी की शरण में बैठ गए । सरस्वती ने भी ऐसा वरदान दिया है कि परिवार की गाड़ी को मैं यहां तक खींच लाया।कभी किसी को थाह नहीं लगने दिया कि हमारी आर्थिक स्थिति क्या है । तू मुम्बई में कमाने लगा तो लोगों ने कहा – यह पंडित जी के सत्य ईमान का ही प्रताप है । लड़का उतने बड़े शहर में जाकर कमा रहा है ।कभी-कभी भ्रम को कायम रखना ज़रूरी होता है ।तुम्हारी शादी मैंने कैसे की है , तुम्हें क्या मालूम ? हज़ार लोग काटने वाले थे,लेकिन मेरी ख्याति रंग लाई । लड़की के पिता ने कहा- शादी करेगा तो यहीं। इसे कहते हैं प्रतिष्ठा । बाबू जी जैसे मुझसे बात नहीं कर रहे हों बल्कि पत्रा बांच रहे हों । ऐसी सपाट आवाज़ में मेरे जाने का हुक्म सुना दिया ।
लटवा सेन्हुर की गमक मुझे अपनी ओर खींच रहे थी । बाबूजी से मुक्ति पाने का एक ही उपाय था । मैंने कहा – मैं तो ऐसे ही कह रहा था । एकाध दिन में टिकट निकाल कर चला जाऊंगा।यह वाक्य सुनते ही बाबूजी ने बड़ी आत्मीयता से कहा – जाओ, जाकर आराम करो, थक गए होगे।
सुघरा मेरा इंतज़ार कर रही थी, शायद लज्जावश सोने का अभिनय कर, रजाई ओढ़क़र पड़ी थी । जब से सुघरा व्याह कर आई है, इस कमरे की हवा मादक हो गई है । इस हवा से दूर जाने की इच्छा ही नहीं होती । मेरे रजाई में घुसते ही वह चिहुंकी पर शीघ्र ही चैतन्य होते हुए प्रश्न किया,आप मुम्बई जा रहे हैं ? हां एकाध दिन में चला जाऊंगा। मैं कैसे रहूंगी ? कहते-कहते आंखें छलछला आईं । मैं नहीं कह सका कि तुम्हारे बिना मैं कैसे रहूंगा ? शायद यह पुरुष स्वाभिमान के खिलाफ था ,वास्तविकता यही थी कि सुघरा के बिना रात की कल्पना से बेचैनी लगने लगी थी। इतने कम दिनों में इसने मेरी एकाकी जिंदगी में प्रेम का स्रोता बहा दिया था। उंगलियों को गीलेपन का अनुभव हुआ, मैंने धीरज बंधाया, हरदम के लिए थोड़े ही जा रहा हूं ? जल्दी ही लौट आऊंगा। यह सब मैं बहुत धीरे से कह पाया। मैं जानता था कि चाहकर भी जल्दी नहीं लौट सकता। आने-जाने में बहुत पैसा खर्च होता है ।
सुघरा ने सीने में मुंह छिपाते हुए कहा- आप मुझे भूला तो नहीं जाएंगे ? मैं जानता था उसकी आशंका निर्मूल नहीं है। मुम्बई है ही माया नगरी । कैसी बात करती हो मैं तुम्हें कभी भूल सकता हूं ? भला कोई अपनी पत्नी को भूलता है?तुम सदैव मेरे दिल में रहोगी। उसने कहीं बहुत गहरे डूबते हुए कहा – बुरा मत मानिएगा मेरी एक सखी का पति भी मुम्बई गया था , वहां से आ तो गया लेकिन छूत का रोग लेकर । उसके साथ- साथ सखी भी तिल-तिल कर मर रही है। मैंने समझाया था, घिनहा रोग है, दूर रहना। कहने लगी जब यही नहीं रहेंगे तब जी कर क्या करूंगी ? अच्छा है मैं भी इनके साथ चली जाऊंगी ।ये मुम्बई भतार खोर है , कितनों का आदमी छीन लिया । हम तो कहते हैं- नमक रोटी खाना और घर-गांव में रहना । आदमी क्यों पैसे के पीछे भागता है, समझ में नहीं आता ? मत जाइए ना। यह सब क्या कह रही हो सुघरा, तुम्हें मुझ पर विश्वास नहीं है ? मैं ऐसा वैसा लड़का नहीं हूं । ईमानदारी से कमाता हूं और किफायत से खर्च करता हूं। एक-एक पैसा जोड़ने में इन कामों के लिए समय कहां बचता है? अरे नहीं नहीं “विश्वास की ही डोर से बंधी हूं , विश्वास क्यों नहीं करूंगी?”
इसमें सुघरा का दोष नहीं ,उसने गांव में अनेक औरतों को चूल्हा- चक्की में होम चढ़ते देखा है । वह अपने पति के वियोग की कल्पना मात्र से कांप जाती है । मुझे और तेजी से खींच लेती है जैसे छोड़ेगी ही नहीं।उसने ग्रामीण जीवन के अनुभव से सीखा है कि- स्त्री का सबसे बड़ा सुख उसका मरद होता है । थोड़ा कमाना साथ रहना। लेकिन करे क्या ? विधाता ने जो लिखा भोगना ही पड़ेगा । वह विधि का विधान है,कैसे मिटेगा?
सुघरा के रात-दिन पल-छिन इंतजार में बीत रहे थे । आज़ ही पोस्टमैन ने मनीआर्डर का पैसा बाबू जी को दिया । सुघरा सोचने लगी। माघ महीने में वो मुम्बई गए थे । एक साल हो गया। नियमित पैसा आता है उसी में बाबू जी और अम्मा को कुछ लिखा रहता है । हमारे लिए एक आखर भी नहीं। हो सकता है इसलिए कि मैं पढ़ी-लिखी नहीं हूं । वही खाट, वही रजाई, पता नहीं किसकी नजर लग गई?नैहर भी जाने का मन नहीं करता। मैं जाऊं और कहीं वो आ जाएं तो बुरा मान जाएंगे । रात में उनके सपने देखती हूं ,पर सपने से तो जीवन नहीं चलता । आज गौरय्या ने कमरे के आले पर तिनका रखा , गौरा और गौरय्या घोसला बना रहे हैं। मुझे अंदर तक खालीपन का एहसास हो रहा है । आग लगे ऐसे नारी-जीवन को । मैं भी गौरय्या होती तो कितना अच्छा होता ।दुष्यंत और शकुंतला की कहानी की तरह वे मुझे भूल तो नहीं जाएंगे ? सुघरा के मन में आंधी चल रही थी ।
सुघरा ने निश्चय किया की वह अरविंद को पत्र लिखेगी, पर कैसे ? उसे तो लिखना- पढ़ना आता नहीं । तो क्या हुआ ? कुछ न कुछ तो करना ही होगा। वह एक निश्चय के साथ उठी। उसने पड़ोस की विमली की फुग्गा चोटी की, बड़ी-सी गुड़ की पिड़िया देते हुए कान में कहा- किसी से कहना नहीं बच्ची,चाचा को चिट्ठी लिख दो।‘भगवान कसम चाची, किसी से नहीं कहूंगी । अगर कहूं तो जीभ में कीड़े पड़ें ।‘ नहीं बच्ची तुम्हारा विश्वास है । कल भी आना बाल में तेल डाल कर फुग्गा चोटे कर दूंगी ।सुघरा ने मन की पीर और आंसू की धार में डूबते-उतराते बोला और विमली ने लिखा था-
प्रिय प्राणनाथ,
चरणों की दासी का प्रणाम ।
अत्र कुशलम, तत्रास्तु के पश्चात भगवान शंकर की कृपा से यहां अम्मा, बाबू जी ठीक हैं। इस साल पिछले साल से भी ज्यादा जाड़ा पड़ा। कबरी गाय ने बछिया जना है । आपके बिना मैं प्यासी हिरनी की तरह तड़प रही हूं । होली पर भी आप नहीं आए, हम बाट जोहते रहे । हमारे लिए कभी दो आखर भी नहीं लिखा । इतने निर्मोही क्यों हो गए हैं? हमारे साथ ही कुल्लू मास्टर के लड़के की शादी हुई थी। उसके यहां लड़की हुई है। अम्मा बरहों में गई थीं। चिट्ठी को तार समझिए, काम समेट कर जल्दी आ जाइए । यह चिट्ठी विमली से लिखवाया है । इसके बारे में किसी से मत कहिएगा ।
आपकी दासी
सुघरा
‘चाची मुम्बई वाला चाचा का पता बताइए, लिफाफा पर लिख दें । कल स्कूल जाते समय डब्बा में डाल देंगे। ‘ ‘ का बच्ची बिना पता के चिट्ठी नहीं जाएगी? पता तो हमारे पास नहीं है।‘
“चाची बिना पता के चिट्ठी नहीं जा सकती ।‘ ‘ तो बच्ची ये चिट्ठी हमें दे दो, इसके बारे में किसी से न कहना , हमारी कसम।’
सुघरा ने चिट्ठी को कई बार उलटा-पलटा, इसका क्या करें ? बिना पते के जाएगी नहीं। उनकी चिट्ठी फाड़ भी नहीं सकती । बिस्तर पर बैठे-बैठे मुस्करा देते है । चिट्ठी को चूमकर ब्लाउज में डाल लेती है। हमारे प्रियतम तो हमारे हृदय में हैं,उनका पता तो यहां है । यहां से अपने आप उनके पास पहुंच जाएगी । मन को बड़ी शांति मिली, धीरे-धीरे उसकी आंख लग गई, क्या सपना देखती है कि- अरविंद उसकी पाती बांच रहा है और आने की तैयारी कर रहा है ।

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टूटा साज

हमारी तो कभी सुने नहीं जिंदगी भर हारमोनियम बजाए और भाई- भतीजों की स्तुति गाए, अब दिखा दिया न अंगूठा, लो खाओ कटहर का कोवा। राजदेई शब्द-बांण चला रही थी, जिससे गंगाधर आहत हो रहे थे,लेकिन भीष्म की तरह प्राण को साधे हुए थे ।गंगाधर जीवन भर गांव से बाहर परदेश में संगीत शिक्षक रहे, जो कुछ कमाया भाई- भतीजों में लगा दिया ।समझते थे रिटायर होने के बाद गांव-घर में सुख से रहेंगे, बाकी की जिंदगी दाल-रोटी खाएंगे और भजन गाएंगे, पर विधाता का खेल ही कुछ निराला है।पत्नी के शब्द जितना आहत नहीं कर रहे थे ,उससे ज्यादा तो अपनों के विश्वास-भंग ने चोट पहुंचाई थी। राजदेई का भी इसमें क्या दोष? भतीजी की शादी में इससे नाक-कान तक का उतरवा लिया गया था । कितने साध से एक-एक पैसा काट-काट कर इसने ये दोनों चीजें बनवाई थीं। पति सरकारी काम से बाहर जाते तो रजदेई नमक से रोटी खाकर रह जाती, सोचती थोड़े पैसे बचेंगे तो वक्त जरूरत काम आएंगे। इसी तरह के पैसों से उसने दो थान गहना गढ़वाया था। गंगाधर ने अफसरों की मिन्नतें करके भविष्यनिधि का पैसा निकलवाया था। अफसरों ने समझाने की कोशिश भी की थी, वह रिटायरमेंट के बाद काम आएगा पर कहां माने थे वो । पहले भतीजी की शादी जरूरी है कि अपना बुढ़ापा संवारने की सोचूं ? मुझे किस बात की चिंता है , मेरे लक्ष्मण से भाई जो हैं । इसी को कलयुग कहते हैं। जिनके लिए पत्नी और बेटे का विरोध लिया, उन्हें कष्ट में डाला ,वही लोग कहते हैं तुम्हारा यहां क्या है? उन्हें कैसे समझाएं कि उनका यहां क्या है। अगर यहां कुछ न होता तो यहां के लिए अपने जीवन के साठ साल क्यों गला देता ? ये अमराई, पोखर,शिवाला,पगडंडी, चौपाल सब तो अपने हैं। इन्हीं के लिए तो लौटकर आए थे। बेटा बार-बार मना कर रहा था। कहता था- मेरे पास आइए बड़ा बंगला है, चैन से रहिएगा। लेकिन गंगाधर ने अपने भाइयों के साथ रहना उचित समझा । पत्नी की बकबक सुनना जब सहन से बाहर हो गया तो पैरों में चप्पल डाली और निकल पड़े गांव की ओर ।

विद्यासागर झा की चौपाल पर लोग ताश खेल रहे थे । बगल में पान,सुरती‌‌-चूना, जर्दा सब डलिया में सजाकर रखा था। बीच –बीच मे‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌‌ चाय बनकर आ जाती थी। इस तरह का स्वागत इस दरवाजे़ की शोभ थी। झा टोला के जितने भी रिटायर या बुजुर्ग लोग थे , जिनकी वजह से घर में खटर-पटर होती थी वे सभी निजात पाने के लिए यहीं जमघट लगाते थे। दिनभर ताश खेलते शाम को भांग छनती। कुछ लोग गांजा भी खींच लेते । दो-दो गिलास भोलाबाबा का प्रसाद पाकर लोग दिशा मैदान जाते । उनकी मान्यता थी कि इसके सेवन के बाद पेट खलखलाकर साफ होता है। उस टोला में विद्यासागर झा का ऐसा दबदबा था कि कोई दूसरी जात का जूता-चप्पल पहन कर टोला के बीच से निकल नहीं सकता था । राजपूत भी जूता ही उतार कर पालागी करते हुए चरणों में मस्तक रख देते थे । झाजी अपने पुरखों की परम्परा का निर्वाह बड़ी सजगता से कर रहे थे । एक बार झोंक में किसी ने पालागी नहीं की तो खड़ाऊं से उसकी वह धुनाई की कि बच्चू को छट्ठी का दूध याद आ गया । झा टोला में वे सूर्य की तरह चमकते थे । उनकी आर्थिक स्थिति बैलगाड़ी की तरह चरमरा गई थी, फिर भी वे बाप-दादा की इज्जत के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते थे । इस चौपाल का ही खर्च बीस-पच्चीस रूपया रोज‌ था, लेकिन क्या करें? यह चौपाल तो कई पीढ़ियों से जमती आई है तो जमती रहेगी ,चाहे कुछ हो जाए ।
गंगाधर जैसे ही उस चौपाल के पास से गुजरे विद्यासागर ने आवाज दी- क्यों गंगाधर रिटायर होकर गांव आ गए ? घर में क्या करते हो? यहीं चौपाल पर आ जाया करो, मन बहल जाया करेगा । सुना है तुम्हारे भाई शशिधर और शिखरधर ने तुम्हारे साथ बहुत अन्याय किया है । इस तरह का अन्याय झा टोला में नहीं चलेगा । तुम कहो तो उन्हें यहीं बुलाकर सबके सामने चार जूता लगाऊं। उनकी इतनी हिम्मत की मेरे रहते अन्याय करें। गंगाधर पसीना-पसीना हो गए, रिरियाते हुए कहा – नहीं- भैइया ऐसी कोई बात नहीं है ,सब ठीक हो जाएगा, आपस का मामला है । झा ने कड़क कर कहा – “ नहीं-नहीं, कोई बात होतो बताना, गांव-घर का आदमी किस दिन काम आएगा।“

गंगाधर तेजी से वहां से निकल गए । कहीं भी चैन नहीं , घर पर पत्नी प्रलाप करती है और बाहर लोग, वे जाएं तो कहां ? गंगाधर शिवाला की जगत पर बैठकर सोचने लगे। जिस समय बाबू का स्वर्गवास हुआ दोनों भाई दस-बारह साल के थे। इन्हें पढ़ाया –लिखाया, शादी-व्याह किया । इनकी रगों में मेरे परिश्रम का खून दौड़ रहा है । इन्हीं को मैं विद्यासागर से जूते लगवाऊं, अपमानित करवाऊं। इतना बड़ा नीच कर्म मुझसे नहीं हो सकता,फिर मेरी मुक्ति किसमें है? बेटा और पत्नी कहते हैं केस कर दो। किसके ऊपर केस करूं? अपने ही भाइयों के ऊपर,जिनके कंधों पर चढ़कर शमशान जाना है, उन्हीं को कोर्ट-कचहरी के चक्कर लगवाऊं? नहीं-नहीं ,यह नहीं हो सकता । बेटा कमा रहा है, उसकी चिंता है नहीं । हम बुढ़वा-बुढ़िया केलिए पेंशन पर्याप्त है, फिर काहे की हायहाय खटखट। जमीन कौन-सी मैंने बनाई है। पुरखों की सम्पत्ति है, चाहे मेरे पास रहे, चाहे भाइयों के पास। कौन सा इस उम्र में मैं खेती करूंगा ? हे भोलेनाथ यह सब अपनी अर्द्धांगिनी को कैसे समझाऊं? वह तो साक्षात मायारूप है, अपने क्रोध से मुझे भी भस्म कर देगी ।

संध्या आरती के पश्चात चेहरे पर दृढ़ निश्चय का भाव लिए गांगाधर उठे और पूरे गांव का एक चक्कर लगाया । घर-घर गए । सूरज पूरब से न निकल कर पश्चिम से निकल रहा है। ब्राह्मण टोला का आदमी दूसरे टोला के लोगों के घर जा रहा है । उनके बीच बैठकर बातचीत कर रहा है। बिलवासी के घर तो खुद कहकर चाय बनवाई । बिलवासी झिझक रहा था लेकिन उन्होंने कहा – मेरी चाय पीने की इच्छा है बिलवासी, मैं बहुत थक गया हूं। “ धन्य भाग्य हमारे” ,बिलवासी ने कहा था ।
गंगाधर का दृढ़ निश्चय कार्य रूप में परिणित होने लगा। एक कमरे के घर के ऊपर बोर्ड लग गया- “ संगीत-विद्यालय “ । शाम होते ही विभिन्न टोले के बच्चे इकट्ठा होने लगते । गंगाधर हारमोनियम सम्हाल कर भजन गाते , बच्चे दुहराते । बच्चों के बेसुरे गाने में भी उन्हें आत्मिक सुख मिलने लगा । उन्हें लगने लगा कि उन्होंने जीवन की सार्थकता खोज ली है । चौपाल पर समय गंवाने से इन बच्चों को संगीत सिखाना बेहतर है। संगीत व्यक्ति को संस्कारित करता है। रिटयर्मेंट का खाली समय भरने लगा था । पत्नी ने भी सब कुछ यथावत स्वीकार कर लिया । इतना कहना नहीं भूली कि – जीवन भर बच्चों के साथ रहते-रहते तुम्हारा दिमाग बच्चों जैसा हो गया है, कुछ समझने को तैयार ही नहीं हो तो मैं क्या करूं? समझदार आदमी तो वो है जो अपनी गलतियों से सीख ले। संतोष किस चिड़िया का नाम है, जो अकर्मण्य होते हैं वही सबसे पहले संतोष का चोला ओढ़ लेते हैं । खाओ परोपकार का रसगुल्ला। तुम कभी नहीं सुधरोगे।

संगीत विद्यालय अभी शुरू ही हुआ था कि एक दिन शशिधर और शिखरधर ने गंगाधर को घेर लिया। भइया आप अच्छा नहीं कर रहे हैं। कौन- कौन से जात के लड़कों को घर में घुसेड़ते हैं। ऐसा नहीं चलेगा । आप सब धर्म-ईमान घोरकर पी गए हैं। शहर की हवा लग गई है आपको,लेकिन हमें कुल-परिवार के मान-सम्मान की चिंता है। सिर्फ बाम्हन के लड़कों को पढ़ाना होतो ठीक , नहीं तो बंद कीजिए ये सब नौटंकी। अगर आप हमारी बात नहीं मानेंगे तो मजबूरी में हमें विद्याधर भइया से आपकी शिकायत करनी पड़ेगी । उन्हें तो आप जानते ही हैं, वे कहीं पर भी बेइज्जत कर सकते हैं । आपका दिमाग फिर गया है, ये सब काम छोड़िए,कुछ दिन बेटे के पास शहर होकर आ जाइए । गंगाधर से रहा नहीं गया उन्होंने कहा- “ अरे शिखर,सरस्वती किसी की बांटी नहीं है, उस पर सभी का हक है।“ कहते –कहते गला भर आया, आंखें छलछला आईं, आंगोछे से आंसू को पोंछ लिया। कहीं दूर से आवाज़ आई मुझे अपने मन का करने दो । “ तो ठीक है आप नहीं मानेंगे तो भोगिएगा” शशिधर ने कहा ।

गंगाधर प्रात: चार बजे़ ही उठ जाते और कई मील दूर दिशा मैदान के लिए जाते, उससे टहलना भी हो जाता। एक पंथ दो काज । आज जब वे दक्षिण का खेत पार करके ऊसर की ओर बढ़े तो क्या देखते हैं कि उनके संगीत विद्यालय का बोर्ड वहां पड़ा है और किसी ने उस पर झाड़ा फिर दिया है । उन्हें ऐसा लगा जैसे किसी ने इस गांव की मति पर ही झाड़ा फिर दिया हो। गंगाधर शौच से उठकर जब पूर्वाभिमुख हुए तो जनेऊ को कड़ा लपेटने के कारण सिर हल्का- सा झुक गया, मानों कुल के द्वारा मानवता को लज्जित करने के कारण शर्म से नत हो गया हो ।
उषा ने सूर्य के स्वागत के लिए पूर्व दिशा में राख का चौका लीप दिया था, अरुणोदय की लालिमा शुभलक्ष्मी की तरह चरण-चिह्न छोड़ती ससुराल में प्रवेश कर रही थी। बालरवि की आभा से गंगाधर का मुखमण्डल झिलमिला उठा, उनमें एक नई आशा और विश्वास का संचार हुआ। तेज कदमों से चलते हुए इनारा पर पहुंचे। अभी हाथ मटिया ही रहे थे कि संगीत प्रेमी बच्चों का दल उनके घर की ओर बढ़ता हुआ दिखा। कुछ ही देर में गंगाधर की उंगलियां हारमोनियम पर नाचने लगीं । दूर आकाश में एक स्वर लहरी गूंज उठी – “ वो सुबह कभी तो आएगी …..इन काली सदियों के सर से जब रात का आंचल ढ़लकेगा……..।“

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