छतीसगढ़ी गीत, ज़ादा तुम ला का समझाना -बलदाऊ राम साहू 5 years ago जादा तुम ला का समझाना सब ला एक्के बात बताना सच के नइ हे अब पैमाना। घेरी - बेरी का दुहराना झूठ ल सच के...
बाल गीत, पढ़ते-पढ़ते- संतोष झांझी 5 years ago क--कमल का ख--से खरल जीवन जीना नही सरल ग--से गमला घ--से घड़ा पढे लिखे का नाम बड़ा ङ--कभी कभी ही आता,मिलता जब संस्कृत का ज्ञाता...
परवल होथे गुणकारी- बलदाऊ राम साहू 5 years ago परवल होथे गुणकारी जब बजार मा परवल आथे सबके मन ला गजब रिझाथे। हरियरे - हरियर धारीदार हे बन जाये तब मजेदार हे। भरवा, भुँजवा...
बाल कविता-बलदाऊ राम साहू, दुर्ग, छत्तीसगढ़ 5 years ago दद्दू जब भी जाते बाजार लौकी लेकर आते हैं चार। जब लौकी लेकर आते हैं हलवा जरूर बनवाते हैं। इनके गुण लोग जो गाते किस्सा...
कविता, कौन लिखता है कविता -विक्रम ‘अपना’, नंदिनी-अहिवारा 5 years ago जिसके नन्हे दिल के भीतर निर्झर, झरता झरना है हेतु रखता, जो जन-मन पर मानवता को रंगना है शिल्पी है तो, पाहन छूकर निश्चित देव...
कविता, विरक्ति -अरुण कुमार, सरायपाली-छत्तीसगढ़ 5 years ago विकल्प की अनुपस्थिति का कारण हैं ; विकल्प की उपस्थिति में इंसान का वैराग्य होना गैरजिम्मेदार ही कहलायेगा ; चारो ओर से रिक्त इंसान ही...
कविता, नीरवता -दीप्ति श्रीवास्तव, रायपुर-छत्तीसगढ़ 5 years ago नीरवता जब मन में आती जग सूनाकर जाती सखा बंधु सब पराये लगते अपनी व्यथा न बोली जाती हंसी खुशी सब साथ ले जाती नीरवता...
नव गीत, शीत ऋतु मन झूम गाये -डॉ. मीता अग्रवाल ‘मधुर’, रायपुर-छत्तीसगढ़ 5 years ago शीत ऋतु मन झूम गाये सनन सन सन पवन डोले संग मेघों को उड़ा कर शीत ऋतु मन झूम गाये ओस बूंदो में नहाकर। शीत...
कविता, सिख रही हूँ- दिलशाद सैफी 5 years ago इन मौसमों को बदलना तो आसान नहीं है अब खुद को बदलने का हुनर सिख रही हूँ..! धूप से सिख लिया रंगों को चुराने की...
कविता, मन- डॉ. बीना सिंह 5 years ago राज की बात मैं आज बताती हूं मेरे अंदर भी एक समंदर उछलता है कभी इधर तो कभी उधर बच्चों सा नादान भोला भाला मन...