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■ग्लैमरस राष्ट्रवाद : ■उज्ज्वल पाण्डेय.
वैसे तो मैं क्रिकेट का उतना बड़ा शौक़ीन नहीं हूँ जितने कि मेरे पिता जी हैं। मुझे इस खेल से विलासिता की बू आती है । भारत में तो क्रिकेट अपने आप में ही एक मज़हब है और तो और इसके देवता तक घोषित हैं। वह देवता जो अरबों का मालिक है। ऐसा नहीं है कि इस धर्म का देवता ही अरबपति है अपितु इस धर्म के लिए खेलने वालों से लेकर इसके बड़े-बड़े अधिकारी तक मोटी पूँजी के स्वामी हैं। आप मेरी इस बात से ज़रूर ही इत्तेफ़ाक़ रखेंगे कि धर्म/मज़हब की ओर से खेलने वाला बेहिसाब दौलत बटोर ही लेता है।
क्रिकेट में पैसा है, ग्लैमर है फलस्वरूप युवा वर्ग का आकर्षण भी है। जहाँ आकर्षण होगा वहाँ बाज़ार भी होगा, जहाँ बाज़ार होगा वहाँ से प्रतिस्पर्धा को भी ख़ारिज नहीं किया जा सकता। प्रतिस्पर्धा कभी भी अकेली नहीं आती। प्रतिस्पर्धा जीवन के सकारात्मक मूल्यों और आदर्शों को भंजित करने की गज़ब की क्षमता रखती है। मैं निजी तौर पर किसी भी स्वस्थ प्रतिस्पर्धा की कल्पना करने में अक्षम हूँ। मेरा मत है कि प्रतिस्पर्धा जब भी आती है वह रिश्तों के महल में आग लगा कर ही जाती है।
खैर, मैं क्रिकेट की बात कर रहा था। चंद दिनों पहले फ़ेसबुक पर आवारागर्दी करते हुए मेरी बेरोज़गार नज़र उस पोस्ट पर गई जिसमें भारत बनाम पाकिस्तान मैच का ज़िक्र था। उस पोस्ट में आगामी टी – 20 क्रिकेट संबंधी जानकरियां भी थीं । मैंने कॉमेंट बॉक्स की ओर रुख किया एवं पाया कि लोग वास्तव में भारत बनाम पाकिस्तान मैच के लिए अति उत्साहित हैं, कुछ डिजिटल चोरों ने कॉमेंट बॉक्स में ऑनलाइन टिकट प्राप्त करने हेतु लिंक अभी से छोड़ रखा था। यह मैच संभवतः डेढ़-दो महीने बाद खेला जाना है। लोगों के भीतर वतनपरस्ती का जुनून दौड़ रहा है , दौड़े भी क्यों न ? पाकिस्तान भारत का पसंदीदा दुश्मन जो ठहरा। हरिकिशुना का मंझला बेटा मंगरुआ भी क्रिकेट खेलता है , गौरतलब है कि उसे वही गेंदबाज अच्छा लगता है जिसकी गेंद पर वह छक्का पीट सके। मंगरुआ उस गेंदबाज का सामना करने से डरता है जो उसके डंडे उखाड़ सके। मीठी-मीठी देशभक्ति इस दौर के फ़ैशन का हिस्सा है। एक वर्ग भगत सिंह व अशफ़ाक़ की देशभक्ति को नापसंद करता है। भीड़ भी अब मात्र क्रिकेट मैचों में ” भारत माता की जय ” चिल्लाना चाहती है। यह आज की देशभक्ति है। आए दिन उबाल मारता लहू एकाएक शांत पड़ जाता है जब बारी आती है भारत-पाक क्रिकेट मुक़ाबले की। मौसमी देशभक्ति आख़िर कब तक?
जब भारत-पाक मैच का उन्माद परवान चढ़ता है तब हम भूल जाते हैं मुंबई हमला, उरी हमला और पुलवामा ब्लास्ट। हम भूल जाते हैं उन सत्ता के चमचे-बेलचे पत्रकारों के चेहरे को जिन्हें हमले से पहले हमले का ब्योरा मिल जाता है। इस आवारा राष्ट्रवाद के दौर में प्रिय पाठकों यह आवश्यक है कि हम मिथ्या राष्ट्रवाद और सच्ची देशभक्ति को वक़्त रहते पहचान लें। पाकिस्तान अगर हमारा दुश्मन है तो भारत खेल के लोकप्रिय व सबसे बड़े मंच पर उस देश का स्वागत क्यों करता है जिसने हमें असंख्य घाव दिये हैं। भारत को अपने घावों को नासूर नहीं करना चाहिए और दुश्मन का हर मंच पर विरोध करना चाहिए। एक दिन के मैच देखने से दुनिया क्या यह नहीं समझेगी कि विश्व के इन दो मुल्कों के बीच कुछ भी तनावग्रस्त नहीं ? इस मैच से और कोई संकेत जाए न जाए मगर दुनिया हमे ग़ुलाम मानसिकता से ग्रसित ज़रूर मानेगी। आख़िरकार क्रिकेट एक खेल ही है। क्रिकेट स्टेडियम पी.ओ.के नहीं है , कारगिल का मैदान नहीं है और न ही क्रिकेट बैट व गेंद आधुनिक हथियार हैं। मैच को किसी जंग का मैदान मान लेना महानता नहीं अज़ीम मूर्खता है।
[ ●सोनारडीह,जिला-धनबाद,झारखंड के उज्ज्वल पाण्डेय छात्र हैं. ●लेखन में उनकी रुचि है. ●’छत्तीसगढ़ आसपास’ पत्रिका से प्रभावित होकर उज्ज्वल पाण्डेय ने अपनी एक रचना भेजी,जिसे हम प्रकाशित कर रहे हैं. ●उत्साहवर्धन के लिये रचना पर पाठक अपनी प्रतिक्रिया से अवगत कराएं. -संपादक ]
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