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■समूह वागर्थ : ■आज़ के कवि डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’.
■डॉ. माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’,नवगीत संग्रह ‘रिश्ते टूट गए’ से साभार.
-प्रस्तुति मनोज जैन ‘मधुर’.
[ संपादक मण्डल ‘वागर्थ’ ]

समूह वागर्थ इन दिनों प्रादर्श नवगीतों की एक सीरीज पर काम कर रहा है। कविता का अपना उद्देश्य होता है। अक्सर देखने में आता है कि हमारे सम्मानीय कवि बन्धु, छन्द का बहुत शानदार वितान, कविता में तान तो देते हैं; परन्तु उन्हें खुद ही पता नहीं चलता कि उन्होंने क्या लिखा ? किसके लिए लिखा ? और क्यों लिखा ? हमारी इस सीरीज में, हम उद्देश्य परक कविता का चयन कर पाठकों के सामने, प्रादर्श रूप में यहाँ प्रस्तुत करते हैं; कि आपका लिखा कैसा हो !
इसी कड़ी में कवि माणिक विश्वकर्मा नवरंग जी का एक नवगीत प्रस्तुत है। वागर्थ उन रचनाओं और रचनाकारों को भी सम्मान देता आया है, जिनका ध्यान धारदार कथ्य की रक्षा में टिका रहता है। हमें उन सुसज्जित छाँदसिक रचनाओं में कोई दिलचस्पी नहीं जिनमें कविता सिरे से नदारद रहती है।
आइए पढ़ते हैं एक प्रादर्श नवगीत
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प्रस्तुति
वागर्थ सम्पादक मण्डल
(प्रेषक – मनोज जैन ‘मधुर’)
हम बंजारे
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गाँव तुम्हारा,शहर तुम्हारा
हम बंजारे
नदी किनारे,नाव नहीं है
दूर-दूर तक,छाँव नहीं है
भटक रहे हैं,इधर-उधर से
मारे-मारे
फँसी न कोई,जाल देखकर
तटबंधों का, हाल देख कर
अपना क्या है,फिर लौटेंगे
हैं,मछुआरे
खुशहाली का,नाम नहीं है
पास किसी के,काम नहीं है
बुरे वक्त में प्यास बुझाएँ
फिर भी खारे
माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’
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18 अगस्त 2021 को समूह वागर्थ द्वारा फेसबुक पटल पर प्रस्तुत नवगीत – हम बंजारे पर अनेक साहित्यकारों द्वारा रखे गए विचारों में से कुछ का विवरण निम्नानुसार है –
● नवगीतकार माणिक विश्वकर्मा जी का गीत – हम बंजारे ,
बंजारों पर आधारित है। बंजारे राजस्थान की वह घुमन्तू साहसी जाति जो कबीले के रूप में एक साथ रहती पर कहीं भी अपना घर नहीं बनाते । सत्य को अभिव्यक्त करता भावपूर्ण गीत ।
इसीलिए कवि कह रहा है हम बंजारे हैं ।यह शहर और गांव हमारे लिये नहीं ।
“गांव तुम्हारा / शहर तुम्हारा।
नदी किनारे नाव नही है
दूर दूर तक छांव नहीं है
भटक रहे हैं मारे मारे ।”
बंजारों की अलग कहानी प्रकृति के बीच ही वह रहते हैं । धूप से बचने , छांव भी नहीं और नदी पार करने के लिये नाव भी नही ।सब कुछ अपने दम पर । वन-वन भटकने वाले बंजारे । इसी प्रकार से फंसी न कोई मछली जाल में जाल देख कर ही भाग गई ।अपना क्या है मछुआरे हैं फिर जाल बिछा देंगे उनके लिये । तटबंधों का हाल देख कर नही फंसी ।
खुशहाली का नाम नहीं है
पास किसी के काम नहीं है
बुरे वक्त में प्यास बुझाये
फिर भी खारे ।
समसामयिक विषय पर प्रहार बेरोजगारी ।किसी भी हाथ को काम नही है और जब काम ही नहीं है बेरोजगार हैं तो खुशहाली भी कहां से आयेगी तीखा व्यंग्य करते हुये बुरे वक्त में हम ही काम आते हैं फिर भी सभी के लिये खारे ही रहे जो बुरे वक्त में प्यास बुझाने के लिये खारे पानी की तरह। सामाजिक बिडम्बना और विषमताओं को दर्शाता गीत । धन्यवाद । बधाई एवं शुभकामनाएं
उषा सक्सेना
● गीतों की सहज भूमि पर ही गहन भावों की उत्पत्ति होती है और ऐसे गीत ही पाठक से जुड़ पाते हैं । सरल, सार्थक एवं सारगर्भित नवगीत के लिए डा माणिक विश्वकर्मा जी को बहुत बहुत बधाई ।
ज्ञानचंद मर्मज्ञ
● माणिक भाई का रचना फलक काफी विस्तृत है । वह गज़ल तो कहते ही हैं समीक्षा और समालोचना मे भी सिद्ध हस्त हैं । वह गीत और नवगीत न केवल लिखते हैं बल्कि मंचों पर बडे़ मोहक अंदाज मे प्रस्तुत करने के लिये भी जाने जाते हैं । वह छत्तीसगढ़ के उन साहित्यकारों मे से हैं जिन्होने अपनी प्रतिभा के दम पर हिंदी साहित्य जगत मे ऊंचा स्थान प्राप्त किया है । सहज सरल भाषा मे बडी़ बात कह जाना उनकी विशेषता है जिसे प्रस्तुत रचना मे महसूस किया जा सकता है ।नवरंग जी को बधाई और प्रस्तुति के लिये आपको साधुवाद ।
डॉ.अजय पाठक
● माणिक विश्वकर्मा एक बड़ा नाम है कविता में.गज़ल, नवगीत, नयी कविता -कविता की हर विधा के जानकार और हर विधा में निपुण। ‘कम में बम ‘ उनकी खासियत है.वैसे मैं बताना चाहूँगा कि ‘कम में बम ‘का प्रयोग इसके पहले किसी ने किया हो, मुझे याद नहीं.यदि किसी ने किया हो, तो संदर्भ सहित बताएँ। बहरहाल माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग ‘की बात चल रही थी।नवरंग सर न स्वयं साहित्य की हर विधा के ज्ञाता हैं, अपितु हर विधा के जानकारों को उचित स्थान व सम्मान देते हैं। इन्हें उन लोगों से बहुत चिढ़ है, जिन्हें साहित्य का ‘स’ नहीं आता, किन्तु जुगाड़-तुगाड़ से साहित्य में पुरस्कार पाने और बाँटने लगे हैं।
शैलेश बोहरे सँजरिया
● अभी माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’ जी के दो नवगीत संग्रह आए हैं। नवगीत कविता की चुनौती संवाद को लेकर है। अब तक की नवगीत कविता या तो बयान देती रही, अथवा ब्यौरे देती रही। स्थितियों की विकटता अथवा प्रेम, करुणा आदि की कहीं किसी से साम्यता दिखा कर उसके प्रभाव को बढ़ाने में लगी रही। किन्तु, वह जन से संवाद नहीं कर पाई। आज सबसे बड़ी जरूरत है उसके जनसंवादी होने की है। आज तक कोई भी जनसंवादी स्वर कभी लय विहीन नहीं देखा गया। यहाँ तक कि उर्दू नज़्म में भी लय है। गद्य कविता के कंटेंट फूल होकर भी जनसंवादी न होने का कारण उसका लयहीन होना ही है। लय में ही छंद भी है।
नवरंग जी की नवगीत कविता में एक जनसंवादी स्वर है। उसके भीतर से जो कहन आ रही है, उसमें इस संवाद की पुकार है। इसलिए यह उल्लेखनीय है। इसलिए नवरंग जी का अभिनन्दन है। नवरंग जी हिन्दी ग़ज़ल के प्रतिष्ठित और स्थापित हस्ताक्षर हैं। हिंदकी के नाम से हिन्दी ग़ज़ल के लिए बड़ा काम किया है उन्होंने। उनके नवगीतों में भी कविता का वही संवाद स्वर दिखाई पड़ता है, जो ग़ज़ल को आम आदमी से जोड़ती है। वागर्थ को साधुवाद नवरंग जी का नवगीत पढ़वाने के लिए। सादर…
राजा अवस्थी, कटनी
● बहुत सुंदर और भावपूर्ण नवगीत। आ.नवरंग जी को हार्दिक बधाई और आभार वागर्थ समूह।
हरगोविंद मैथिल
● सुन्दर व सशक्त नवगीत! डॉ.राकेश सक्सेना
● नवगीत पढ़ने के ही साथ साथ दृश्य भी गीत बनकर उभर आते हैं। बेहतरीन सृजन के लिए बहुत बहुत बधाई आदरणीय नवरंग जी।
श्रवण चोरनेले
● बहुत शानदार नवगीत… बहुत प्रभावी कहन ।
राजकुमार महोबिया
● सुंदर नवगीत है, नवरंग जी को बधाई |
श्रीकृष्ण शर्मा
● संदर्भ अनुकरणीय है , वागर्थ समूह का कार्य वाकई सराहनीय है । मनोरंजन के लिए लिखना तो सभी करते हैं परंतु मार्गदर्शन के लिए लिखना सबसे होता भी नहीं है , लेकिन नहीं हो सकता ऐसा भी कदापि नहीं । साहित्य से जुड़े रहने का लाभ साहित्य साधक को तो होता ही है परंतु देश समाज को भी हो इस दृष्टिकोण से यदि कोई संस्था प्रेरित करती है तो अनेक साधुवाद । ” हम बंजारे ” की पंक्तियां केवल व्यथा को ही व्यक्त नहीं करतीं वरन् मानव द्वारा स्वयं के ही लिए रोपित संकट को भी व्यक्त करती हैं । अनेक शुभकामनाएं ।
हेमंत माहुलीकर
● नदी किनारे नाव नहीं है
दूर दूर तक छाँव नहीं है
वाह,नवरंग जी के गीत भीतर तंक छू जाते हैं।
विजय राठौर
● आदरणीय दादा नवरंग जी के शानदार नवगीत मनोज जी आपने पटल पर आज रखे।बहुत आभार आपका।
श्याम सुन्दर तिवारी
● शानदार गीत के लिए हार्दिक बधाई। – सुरेन्द्र वाजपेयी
● बहुत बढ़िया सुन्दर भावपूर्ण नवगीत.. बहुत बहुत बधाई हार्दिक शुभकामनाएं।
केवल कृष्ण पाठक
● आसान और अर्थ पूर्ण लिखना दुष्कर कार्य है, आदरणीय नवरंग जी यह काम सहजता से करते हैं। यह उनकी विशिष्टता है।
ओमप्रकाश यादव
● दमदार – गिरिश पंकज
● थोड़े में बहुत कुछ सारगर्भित कह दिया।
आपकी कविता को सलाम ।
राम अवधेश सिंह
● सरल शब्दों में मोती पिरोना कोई आपसे सीखे
ओम गोंडुले
● आनन्ददायक नवगीत ,मनभावन लेखन
आज के दौर में ऐसे साहित्य की बहुत आवश्यकता है
धर्मराज देशराज
● वर्तमान को उकेरता बहुत ही प्रभावी नवगीत।बधाई बहुत-बहुत बधाई नवरंग जी।
डॉ.पी.सी.लाल यादव
● आ० माणिक विश्वकर्मा जी के नवगीत पहेलियाँ नही बुझाते, सरल सहज बिम्बों का वितान रचते हैं.
रूपेन्द्र राज
● अद्भुत नवगीत । अभिव्यक्ति एवं अनुभूति का सुन्दर समन्वय।
पुन्नी विश्वकर्मा
● बेहद उम्दा एवं लाजवाब नवगीत सेवक राम
● बहुत उम्दा दिनेश सत्यार्थी
● वाह दीपक विश्वकर्मा
● जानदार राकेश शर्मा
● बहुत सुन्दर नवगीत मधुलिका दुबे
● बहुत सुन्दर रचना गीता विश्वकर्मा
● बहुत सुन्दर उमरचंद जायसवाल
● ज़ानदार राकेश शर्मा
● भावपूर्ण नवगीत -साधुवाद संगीता ताम्रकार
● वाह,शानदार जयहिंद
● बहुत ही सुन्दर ,वाह संगम त्रिपाठी
● बहुत सुन्दर राम आश्रय जायसवाल
● बहुत बढ़िया नवगीत आशा देशमुख
● बहुत सुन्दर और भावपूर्ण महेश गुप्ता
सभी साहित्यकारों एवं सुधीजनों को माणिक विश्वकर्मा ‘नवरंग’ द्वारा आभार व्यक्त किया गया।
♀ कवि संपर्क-
♀ 94241 41875
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chhattisgarhaaspaas
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