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■अगहन गुरुवार पर विशेष.
♀ पुन्य फलदायी होथे-अग्घन बिरस्पत.
♀ डॉ. नीलकंठ देवांगन
【 शिवधाम कोडिया, जिला-दुर्ग,छ. ग. 】
छत्तीसगढ़ मं बारों महीना कोनो न कोनो तिहार बार आथे, वरत परब आथे | बिरस्पत ल लक्ष्मी दाई के बार माने जाथे | धन दवलत देवइया लक्ष्मी के नांव मं बिरस्पत के दिन वरत उपास रेहे जाथे | ये दिन पिंवरा जिनिस खास होथे- पिंवरा कपड़ा, पिंवरा फूल, पिंवरा चना पिसान के बने खाय पिये के रोटी पिठा, चीला, बूंदी, लड्डू | अग्घन महीना मं जादातर माई लोगिन मन अग्घन बिरस्पत के उपास रिथें | लक्ष्मी दाई के पूजा करके, ओला परसन्न करके धन, जस, सुख, समरिद्धि के आशीरवाद लेथें |
छत्तीसगढ़ ओन्हारी सियारी के राज- छत्तीसगढ़ ल धान के कटोरा केहे जाथे | इहां धान के खूब पैदावारी होथे | पहिली इहां ओन्हारी सियारी, रबी अउ खरीफ फसल भरपूर होवय | धान ,गहूं ,कोदो, चना,राहेर, लाख, लाखड़ी, उरिद, मसूर होवय | सबके कोठी भरे रहय | कोदो ल पंदरा बीस साल ले रखे रहयं | जरूरत मुताबिक दरवा के भोक्कड़ भात खांय | भांटा पताल के दिन मं खाना जादा खवावय | कहूं अकाल दुकाल पर जाय त कोठी मं भरे अनाज ह काम आवय | जेखर जगा नइ रहय, उधारी बाढी़ करके चला लेवंय | अग्घन महीना मं लक्ष्मी दाई के सौहें दरसन अन्न के रूप मं होवय | सबके मन चंगा रहय | घर ह गद बोलय | गांव ह गद बोलय | काबर के घरो घर कोठी मं अन्न भरे रहय |
सुसाइटी मं धान बेचा जथे- अब तो बोंय के पुरतन रख के सबो ल सुसाइटी मं बेंच देथें | धान काटे के, मिंजे के मशीन हारबेस्टर आ गेहे | खेते मं काट मींज के सीधा सुसाइटी मं लेग के बेंच देथें | पहिली बियारा मं धान ल रखंय, दौरी मं निते गाड़ा मं मिंजय तब घर लावंय | अब तो बियारा मं लाय के जरूरत घलो नइ परय | मंडी मं लेग के बेंच देथें | कोटा मं चांउर मिल जथे |
तभो ले अग्घन बिरस्पत के महत्तम कम नइ होये | परंपरा अउ आस्था ले प्रेरना पाके नेम धरम के पालन करत ये वरत उपास ल रहिथें | अग्घन बिरस्पत के वरत एक कथा ले जुड़े हे-
कथा- पाटनपुर नगर मं मंगलसेन राजा के चोल अउ चिल्ल नांव के दू रानी रिहिन | एक दिन छत मं राजा छोटे रानी ल अंगुरी के इशारा करके बताइस के मैंहा वोदे जगा सुग्घर बगीचा बनवावत रहेंव | उहां एक बरहा खुसर गे | रखवार मन बताइन | मैंहा सैनिक मन ल आदेश देंव -‘देखव, ये बरहा भागन मत पावय | जेखर आघू ले बरहा भागही वोला मौत के सजा दिये जाही |’ सैनिक मन वोला छेंके बर नाका बंदी करन लागिन | बरहा ह सेंध पाके भाग गे | राजा भाला धरके घोड़ा मं चढ़ के पिछलग्गू भागिस | भागत भागत जंगल मं सपेड़ा मं आगे | राजा ह भाला ले वोला बेध दिस | जइसे ही भाला ओखर शरीर मं घुसिस, वोहा गंधर्व रूप मं आके राजा ल बहुत धन्यवाद दिस | राजा अचरज मं परगे | ये का होगे? तब वोहा पूरब जनम के बात ल बताइस -‘मैंहा गंधर्व रहेंव | नाचे गाय के बहुत सउंख रिहिसे | एक दिन ब्रह्मा ल गाना सुनावत रहेंव | सुर ल भुला गेंव | ब्रह्मा नराज होके मोला धरती मं बरहा बने के सराप दे दिस | अतेक बड़ सजा सुनके बिनती करेंव त किहिस के तोर उद्धार मगनसेन राजा ले होही | आज ब्रह्मा के बात सही होइस |’ चक्रवर्ती राजा होय के आशिरवाद देवत वोहाअपन लोक मं चल दिस |
नगर वापसी मं एक गरीब दुखी बाम्हन ल देखिस | वो बताइस -‘मोर जनम तोरे संग होय रिहिसे | तैं अपन भाग ले राजा बन गेस ,मै गरीब | अब मोला सेवा के मौका दे | ‘तब राजा ह अपन घोड़ा ल पानी पिया के लाने बर किहिस | तरिया मं पानी पियावत घोड़ा ह लद्दी मं सटके ल धरिस| घोड़ा ले कूद
बाम्हन ह चारों मुड़ा देखिस | एक जगा देवता मन के स्त्री मन वरत अनुष्ठान करत रिहिन | वोहा ऊंखर जगा जाके वरत के पुन्न परभाव ल पूछिस | राजा घलो आगे | देवी मन बतादिन के ये वरत करे ले महा लक्ष्मी माता परसन्न होथे, आशिरवाद वरदान देथे | ओखर बिधि बिधान ल घलो बतादिन | पूजा मं अरपन करे डोरा ल घलो दे दिन |
राजा आके चोल रानी ल पहिरे बर दिस | रानी ल भरम होगे के राजा ह कोनो दूसर स्त्री जगा तो नइ जात होही? नइ पहिरिस, फेंक दिस | वोला चिल्ल रानी देखिस, उठाइस अउ पहिर लिस | वो दिन अग्घन महीना के बिरस्पत परे रहय | माता लक्ष्मी ह बुढ़िया रूप मं पहिली चोल जगा गिस | ओखर मन खिन्न रहय | नइ पहिचानिस,, तिरस्कार करके भगा दिस | वोला बराही कस होय के सराप देके चिल्ल जगा गिस | वो तो खुश रहय | खूब सुवागत सत्कार करिस | लक्ष्मी परसन्न होके धनवान सुखी होय के आशिरवाद दिस | ये बात पूरा नगर मं बगर गे | सबौ माई लोगिन मन अग्घन बिरस्पत के वरत उपास शुरू कर दिन | तब ले परंपरा आस्था चले आवत हे |
ये उही कथा ये जउन ल युधिष्ठिर के पूछे मं कृष्ण ह बताय रिहिसे के ये वरत ल करे से दुख दूर ह जथे, सुखे सुख मिलथे | इही कथा ल देवराज इंद्र के पूछे मं नारद बताय रिहिसे जब वृत्तासुर देवता मन ल हरा के सरग ल जीत गे रिहिसे, देवता मन दुखी भयभीत हो गे रिहिन | ये वरत ल करके अपन राजभाग पाय रिहिन हे |
विधि अउ सावधानी- ये वरत ल स्त्री अउ पुरुष दुनों कर सकथें फेर स्त्री मन जादा करथें | पहिली दिन घर अंगना ल गोबर से लिप लंय | बिरस्पत के सुरुज उये के दू घंटा पहिली नहा के घी के दीया जलावैं | ये दिन साबुन तेल मत लगावैं ,झाड़ू मत करयं,नवा झाड़ू मत लेवंय | मां लक्ष्मी के याद मं रहयं | कथा सुनंय सुनावंय |
घर मुहांटी ले पूजा कमरा तक चांउर पिसान ले लक्ष्मी जी के चरन चिन्ह बनावंय | ओखर ऊपर पांव मत रखंय | चौंकी मं पीला कपड़ा बिछा के कलश स्थापन करंय | ग़ौरी गौरा बनावंय | केला के पत्ता, आमा के पत्ता ले सजावंय | आंवला, चना दार, गुड़, मुनक्का, किसमिस के भोग लगावंय | माता ल पान, कमल फूल चढ़ावंय | कुमकुम, हल्दी,केसर से तिलक करंय |
चारों बिरस्प्त के विधि विधान ले पूजा करंय | चांउर के दस जगा ढेरी बनावंय | आठ अष्ट लक्ष्मी के अउ एक एक सरस्वती कुबेर के |ढेरी मं सिक्का रखंय | दसमुखी दीया जलावंय | कच्चा सूत के दस गांठ पार के लक्ष्मी जी के सामने रखंय | दूसर दिन कलाई मं बांध लंय | चरन चिन्ह ल झाड़ू से झन पोछंय
| कपड़ा ले बटोर लंय | चांउर के चार भाग करके एक भाग अन्न पात्र मं, एक भाग गउरैया चिरई ल, एक भाग गाय ल अउ एक भाग बाम्हन ल या मंदिर मं दंय |
ध्यान रखंय- बिरस्प्त पूजा के धन दूसर मं मत बाटंय, परिवार मं ही उपयोग करंय | ये दिन धन खर्च मत करंय , दान मत दंय, पूजा सामग्री मं उपयोग ल ही देवंय | आखिरी बिरस्प्त के ख्याल रखंय- माता ल बिदा बिसरजन मत करंय |हूम धूप फूल पान ल ठंडा कर दंय | कलाई मं बंधे डोरा ल पुन्नी के दिन खोल के बिसरजित कर दंय |
ये वरत ले महालक्ष्मी परसन्न होथे | चारों अग्घन बिरस्प्त के नेम धेम ले पूजा करे से घर परिवार मं सुख शांति आरोग्य समरिद्धि खुशहाली आथे | माता के किरपा बरसत रहिथे |
■लेखक संपर्क-
■84355 52828
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