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- ■गाँधी जी को याद करते हुए : मिथिलेश राय.
■गाँधी जी को याद करते हुए : मिथिलेश राय.
♀ चश्मा
तुम्हारे पीछे छूट गया है,
तुम्हारा चश्मा,
गोल- फ्रेम वाला,
उसे पहनकर कुछ लोग
तुम्हारे जैसा, दिखना
चाहते है।
उनके लिए तुम्हारा यह
चश्मा नुमाइश की कोई
चीज है, वे नही देखना
चाहते इस चश्मे से
दुनिया को तुम्हारी तरह
प्रेम और अहिंसा से भरकर
ऐसे नमूनों को, तुम्हारा,
चश्मा पहना देखकर
कभी कभी छूट जाती
मेरी भी हंसी
जैसे तुम अपनी किसी
तस्वीर में दिखते हो
विस्मय से हँसते हुए
♀ लाठी
तुम पहुँचना चाहते थे,
हर, निर्बल, असहाय,
जाति, धर्म, नस्ल,
छूत-अछूत से सताये, गये
मनुष्यों तक, देने संबल
साथ उनके खड़े होने,
दूर दूर तक यात्रा करते
थक जाते होंगे, इसलिए
ले रखा था लाठी का सहारा,
तुमने लाठी को सहारा माना,
लाठी के जोर के खिलाफ
तुम्हारी लाठी का सहारा पाकर
कितने ही लोग उठ खड़े हुए
डरना छोड़कर जुल्म और
हर अन्याय के खिलाफ,
देखो ना
जिन भी लोगों ने
लाठी के जोर पर खड़ी की
अपनी दुनिया,
कितना डरते है ,वे
आज भी तुम्हारी लाठी
देखकर,
[ ●मिथिलेश रॉय,प्रगतिशील लेखक संघ,जिला-शहडोल, मध्यप्रदेश ●संपर्क- 88898 57854 ]
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chhattisgarhaaspaas
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