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■कुछ जमीन से कुछ हवा से. ■विनोद साव.
■परिचय-
हिंदी साहित्य के प्रसिद्द व्यंग्यकार विनोद साव ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ के लोकप्रिय स्तंभकार हैं. हम यहां उनके नियमित स्तम्भ ‘कुछ जमीन से कुछ हवा से’ को न्यूज़-पोर्टल के अपने सुधि पाठकों तक भी पहुंचा रहे हैं. ज्ञातव्य हो कि विनोद जी जाने माने लेखक हैं उनके व्यंग्य, उपन्यास, यात्रावृत्तों की सत्रह किताबें प्रकाशितहो चुकी हैं. ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ सहित उन पर कई पत्रिकाओं के विशेषांक निकले हैं. वे देश भर में अनेक प्रतिष्ठित पुरस्कारों से सम्मानित हैं. यह विश्वास है कि यहां पाठक गण उनकी लेखनी का भरपूर अस्वाद लेते रहेंगे.
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♀ शैली के घर में
♀ विनोद साव

रायपुर विधानसभा रोड पर शैली ने कार चलाते हुए कहा था “पापा आप कार नहीं लिए रहते तो मैं डीमेट (दिशा कॉलेज) में एडमिशन लेने इस रिमोट एरिया में कैसे आती. हर चीज घर में रहनी चाहिए पता नहीं कब किसकी जरूरत पड़ जाए.” यह कहते हुए उसके सांवले चेहरे पर दो बड़ी आँखों में आकांक्षा और आल्हाद के भाव चमक उठे थे. एमबीए के लिए कैट के रिजल्ट में वह चूक गई थी तब चेयरमैन कोटा में उसने स्थान पाया था. वह भी ऐसे समय में जब अनुशंसा करने वाले साहब केन्द्रीय इस्पात मंत्री के हेलीकाप्टर उतरने के हेलीपैड में उनका स्वागत करने के लिए बुके लेकर खड़े थे. फिर शैली की प्रतिभा का विस्फोट हुआ. अपने कॉलेज में न केवल कैट में चयनित उम्मीदवारों के मुकाबले रिजल्ट में वह आगे निकल गई बल्कि कॉलेज की गतिविधियों में अपने मधुर व्यवहार और आत्मीय व्यक्तित्व से वह अलग जगह बना गई. हिन्दी और अंग्रेजी दोनों भाषाओँ में उसके वाक कौशल की पहचान बनी. कॉलेज के प्रमुख कार्यक्रमों के अंग्रेजी में संचालन के लिए उसे अक्सर चुना जाने लगा. इसके पहले वह छत्तीसगढ़ पर्यटन मंडल और एयर-होस्टेज अकादमी में अपने व्यक्तित्व विकास का अवसर वह पा चुकी थी. इस बीच अपने एक छूटे हुए कोर्स को पूरा करने सैंट थॉमस कॉलेज, भिलाई में पहुंची तब कॉलेज के लड़कों के भीतर एक तरंग उठी थी ‘जो आ रही है वो एयर-होस्टेज है बेट्टा.. सम्हल के रहना.” यह सुनते हुए हम बाहर निकले थे.

उस पर लिखी एक कहानी है ‘हैप्पी बर्थडे टू यू.. शैली’ उसकी पंक्तियाँ हैं. “अपने दोनों बेटों के बीच चंदा घोड़े पर सवार थी। बेटों के बीच वह जब भी होती है उसका चेहरा प्रदीप्त हो उठता है। मानों वह केवल बेटों की मां हो। उनसे थोड़ी अलग थलग होकर शैली अक्सर मुझे निहारती रहती है। उन बेटियों की तरह जो पापा की बेटियॉ कहलाती हैं। पंपी और शुन्नू की तरह उसका कोई ’निकनेम’ नहीं है। वह घर बाहर सब ओर बस शैली है।
शंकरा-भिलाई और सीएसआइटी-दुर्ग कॉलेजों में उसने ट्रेनिंग-कोऑर्डिनेटर की भूमिका निभाई जहाँ टीसीएस (टाटा-कंसल्टेंसी सर्विसेज) वाले उसकी कार्यक्षमता से प्रभावित हुए और उसे पुणे में नियुक्ति मिली. इस पर मेरे यात्रावृत्तांत ‘केसरीवाडा’ की ये पंक्तियाँ हैं ‘लड़कियों का यह सबसे पसंदीदा शहर है. पुणे नाम में ही लड़कियों को कुछ सखी संप्रदाय जैसा भान होता है और यह नगरी उनके हर दिल अजीज हो जाती है. देश के हर कस्बे, हर शहर की बेटियॉ अंगड़ाई लेती हैं तो बस पुणे में ‘जॉब’ करने की ललक उनमें चटकने लगती है, फिर कहीं नैन मटक्का हो गया तो इसी शहर में अपना घर बसा लेने को उनका जी चाहता है। यह उनके लिए मायके और ससुराल से अलग कोई तीसरी दुनियॉ हो जाती है, जहॉ उनकी अपनी दूसरी दुनियॉ होती है। इस दुनियॉ में ’पूनाइट’ बसती हैं यानी पुणे वालिये।‘
“अब आप बैंगलोर कब आएंगे.” उसकी आवाज पीछा करती है जब हम व्हाइटफील्ड बैंगलोर में उसके अपार्टमेंट की लिफ्ट पर चढ़ते हैं. वह आठ साल पुणे में रहकर शिशिर और हृदान के साथ बंगलोर आ गई थी. हम लगातार छः बरस तक पुणे जाते रहे पर मैं बैंगलोर न जा सका था. एक बार सब लोग दुर्ग से गए थे तब मैं उज्बेकिस्तान गया हुआ था. वहां से विडियो कांफ्रेंस में शैली और सब लोगों से बात हुई थी. वह मम्मी से बोल उठती है ‘पापा जी बैंगलोर आते नहीं बड़े भाव खाते हैं.”
आज हम गिरे भाव से उसके बैंगलोर में हैं. उसकी सहेलियां उसे अपना ‘आइकन’ मानती थीं. वे हमें चाय पर बुलाती हैं. एक कहती है ‘अंकल.. कोरोना में जब यहां बैंगलोर के अस्पताल में डिलीवरी के लिए मैं भर्ती थी. छत्तीसगढ़ के मेरे मायके और ससुराल से कोई नहीं आ सका था तब शैली ने दो दिनों तक अस्पताल आकर मुझे और मेरे बच्चे को सम्हाला था.” जुड़वाँ बच्चों की मां एक दूसरी सहेली कहती है “अंकल.. आंटी! शैली के कहने पर मैंने भी अपने बच्चों को सेक्टर-9 हॉस्पिटल भिलाई में जना डॉ.सुनीता अग्रवाल के पास जहाँ शैली ने हृदान को जना था.. और भी कई सहेलियों ने ऐसा किया था.’
हम अपार्टमेंट के नीचे उस बेसमेंट को देखते हैं जिसकी भी एक दुनिया है। यहां विशाल कार पार्किंग है जिसमें शिशिर की ‘पोलो’ खड़ी है। बच्चों के खेलने कूदने के लिए लॉन और झूले हैं. यहां हृदान ने अपनी मम्मी को कई तरह की बाल-लीलाओं से मोहा होगा कितने ही करतब दिखलाए होंगे जिन्हें देखकर उसकी मम्मी निहाल होती रही होगी. ऊपर दूसरी तल के घर में मैं और चन्द्रा पंद्रह दिनों से हैं. हमारे साथ स्मृतियों का साया होता है. हम रसोई से आने वाली आवाज की ओर जब तब देख उठते हैं पर वहां एक बंगाली कुक खाना बना रहा होता है. घर सफाई बाई करती है. शिशिर वर्क फ्रॉम होम करता है और हृदान क्लास-2 की ऑनलाइन परीक्षाएं देता है.
वह कोरोना की दूसरी लहर थी. साल भर पहले ताइवान से एक फोन आया था एक अपरिचित नौजवान देवेशपथ सरिया का वह बोलता है “मैंने फेसबुक पर चित्र देखकर विचलन में यह कविता लिखी है सर! आप देख लें और इस पर मुझसे चर्चा करेंगे तो अच्छा लगेगा. उसकी कविता का शीर्षक है ‘उसकी ऑंखें खुली रहनी चाहिए थी.” इसमें कवि ने शैली की वॉल पर जाकर उसके चित्रों के सहारे उसके दस वर्षीय वैवाहिक जीवन के अनमोल पलों को स्पर्श किया था अपनी लम्बी कविता में. उसकी चुनौतियों को रेखांकित किया था.
हम बैंगलोर एयरपोर्ट से रायपुर जाने के लिए निकलते हैं.. नहीं आती है शैली हमारे साथ हम फिर फिर जाएँगे वहां ‘शैली के घर में.’
■स्तम्भकार संपर्क-
■90098 84014
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