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■पिता पर दो कविताएं : मिथिलेश राय [शहडोल मध्यप्रदेश]
♀ पिता-1
एक टेबल है,
जिस पर उन्हें, देखा बैठा
कभी कुछ लिखते, घर,
ऑफिस के जरूरी कागजात,
या, अफसर, नाते रिश्तेदारों,
मित्रों को पत्र, इसी पर
सुबह शाम रख दी जाती है,
उनकी चाय एक दो बिस्कुट के साथ,
दोनों में बड़ा गहरा लगाव है, अधुरे से
लगते है, दोनो एकदूसरे के बगैर,
एक कुर्सी है जिस पर बाहर आँगन
में बैठते है वे पढ़ते हुए अखबार,
यार मित्रों, व अधिया पर खेत लेकर
बोने वाले किसानों के साथ,
एक छाता है, जिसे धूप और,
बारिश वाले दिनों में रखते है साथ,
एक छड़ी है सहारे के लिए,
एक साइकिल है जिस के हैंडिल पर
गुदा है, उनका नाम, व दिनांक जिस
दिन उन्होंने उसे खरीदा था,
उसके डंडे पर बैठकर जाता था मैं
स्कूल, बाज़ार, और कभी कभी
उनके ऑफिस भी,
एक चश्मा जिससे बूढ़े होते हुए
देखना चाहते है वे सारी चीजें
एकदम स्पस्ट खासकर हमारे चेहरे पर
सदा देखना चाहते थे खुशी,
हमे उदास देखकर वे हो जाते है,
विचलित,
एक खूँटी है जिस पर धूल, और
पसीने के गंध से भरे पजामा कुर्ता
टांगते रहे है वे, अपने पाजामा और
कुर्ते के भीतर ही रखते है,
वे अपनी, चिन्ता
ऊब, उदासी, दुख,परेशानी को,
हम कभी नही जान सके, उन्हें
कभी पूरा का पूरा
एक पिता है,
एक अदद अबूझ पहेली,
♀ पिता-2
अभी तो पिता है,
घने छायादार पेड़ सा,
तपते दिनों से क्या घबराना,
बादल सा, जलभरे, खुशियों के,
गरज बरस ही जायेंगे सूखते,
सुखों को हरिया जाएंगे
समय रहते,
पहाड़ सा, जीवन के झँझवातो
की आंधी तूफान को रोक लेंगें
मुझ तक आने से पहले ही,
नदी सा, जलकलश लिए,
जंगल, घाट, बियाबान से
गुजरते हुए,
उंगली पकड़कर चलाते,
कंधे पर बैठा, घुमाते, गिरने पर,
रखते पीछे से कंधे पर हाथ, जीत
पर खुश होते ताली बजाते,
पीठ ठोंकते,
उनके रहते मजाल क्या की
कोई दुःख ,
गावँ शहर बाजार,गली मोहल्ले
चलते रोक ले मेरी राह,या
पैर में लत्ती फंसा चित्त कर दे
धोखे से,
अंधेरा हो चाहे जितना सघन
कितना बलशाली, नही टिक सकता,
उखड़ ही जायेंगे उसके पैर,
पिता की रोशनी के सामने,
डर ने ले रखा है वनवास
देखकर छुप जाती है,
निराशा, उम्मीद के फूल
समय समय लर खिलते ही
रहते है , समय की डालियो पर,
बरसात में सिर पर छाता,
सर्दियों में अलाव,सा
उनका होना, सदा साथ होना है,
सबसे अधिक बल का,
उनके होने से,भोजन में
नमक, चीनी, हल्दी, मिर्च
खट्टे मीठे, अच्छे खराब, की
समझ बाकी है,
हंसी- ठठ्ठा बोल बतकही,
रुआब, अकड़, चर्चा, बहस
नाच, गाना, गीत संगीत,
कजरी,चैता, फगुआ, सोहर,
तीज त्यौहार, आस पड़ोस,
गांव जवार, रिश्ते, नाते,
सब सब कुछ बना हुआ है
जीवन मे,
रातों में भरपूर नींद,
नींद में सुनहरे सपने,
सपनो में नही रुका है
सुंदर सुंदर बाग, बगीचे,
जंगल पंछी वा मित्रों,
उम्मीद, इच्छाओं, और
रुचियों के सुंदर प्रदेशो का आना,
अभी तो है, पिता,
पर, पिता के, ना रहने के
बारे में सोचकर,
कांप उठता हूँ। भीतर,
बाहर से मैं,
■कवि संपर्क-
■88898 57854
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chhattisgarhaaspaas
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