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- ■समीक्षा : ‘श्री शिवरीनारायण माहात्म्य’. ■संपादक-प्रो.अश्विनी केशरवानी, समीक्षक-प्रांजल कुमार.
■समीक्षा : ‘श्री शिवरीनारायण माहात्म्य’. ■संपादक-प्रो.अश्विनी केशरवानी, समीक्षक-प्रांजल कुमार.
♀ चारों युग में थी शिवरीनारायण की महत्ता-प्रांजल कुमार [जार्ज टाउन,टेक्सास,यू.एस. ए.]
♀ श्री प्रकाशन,दुर्ग
‘शिवरीनारायण’ छत्तीसगढ़ का एक प्रमुख धार्मिक, सांस्कृतिक और पुरातात्विक नगर है। प्रदेश की जीवनदायिनी और मोक्षदायिनी चित्रोत्पला गंगा-महानदी के उत्तरी तट पर स्थित होने के कारण इस नगर की महत्ता बढ़ गयी है। प्राचीन काल में महानदी से ही आवागमन और व्यापार होता था। नदियों के तट पर अनेक सभ्यता जन्मीं, पल्लवित और पुष्पित हुई है। सन् 1861 से 1891 तक शिवरीनारायण बिलासपुर जिले का एक प्रमुख तहसील मुख्यालय था। यहां सन् 1882 से 1887 तक भारतेन्दु हरिश्चंद्र के मित्र और सहपाठी ठाकुर जगमोहनसिंह तहसीलदार थे। उन्होंने काशी के समान यहां भी साहित्य का अलख जगाया और यहां के बिखरे साहित्यकारों को जोड़कर उन्हें लेखन की दिशा दी। पंडित मालिकराम भोगहा उनके प्रिय शिष्य थे। भोगहा जी उनके सानिघ्य में अनेक पुस्तकें लिखीं। उस काल में शिवरीनारायण को काशी के साहित्यिक सहोदर की मान्यता थी। यह छत्तीसगढ़ प्रदेश के लिए गौरव की बात है।
प्रस्तुत ‘श्री शिवरीनारायण माहात्म्य‘ इन्हीं सब तथ्यों को प्रमाणित करने वाला ग्रंथ है, जिसका कुशल संपादन प्रो. अश्विनी केशरवानी ने किया है। इसके पूर्व भी उन्होंने ‘शिवरीनारायण: देवालय और परंपराएं‘ पुस्तक लिखी है। इस ग्रंथ में पंडित मालिकराम भोगहा द्वारा लिखित श्री शिवरीनारायण माहात्म्य, श्री बुटु सिंह चैहान द्वारा लिखित ‘श्री शिवरीनारायण-सुंदरगिरि माहात्म्य और पंचकोशी यात्रा तथा पंडित हीराराम त्रिपाठी द्वारा ब्रजभाषा में लिखित श्री शबरीनारायण माहात्म्य संग्रहीत है। तीनों माहात्म्य याज्ञवलक्य संहिता, रामावतार चरित्र और स्कंदपुराण से लेकर लिखा गया है। किसी भी नगर का लिखित साहित्य जब तक न हो तब तक उसकी महत्ता प्रकाशमान नहीं होती। इस दिशा में इस ग्रंथ का प्रकाशन स्तुत्य है। इसके लिए लेखक, संपादक और प्रकाशक बधाई के पात्र हैं।
इस ग्रंथ में शिवरीनारायण क्षेत्र में मतंग ऋषि का गुरूकूल आश्रम, शबरी से श्रीराम-लक्ष्मण की भेंट, उसके बेर खाने का प्रसंग और उनकी मंशानुरूप ‘‘शबरीनारायण नगर‘‘ की स्थापना की पुष्टि होती है। इस ग्रंथ में खरौद में स्थित लक्ष्मणेश्वर महादेव की स्थापना श्रीराम के द्वारा लक्ष्मण के अनुरोध पर लंका विजय के निमित्त किये जाने का उल्लेख है। खरौद के दक्षिणी द्वार पर शबरी मंदिर और गर्भ गृह के द्वार पर श्रीराम लक्ष्मण की धनुर्धारी आदमकद प्रतिमा इस तथ्य की पुष्टि करता है। इस तथ्य का भी इस ग्रंथ में उल्लेख है कि विभिन्न कालों में शिवरीनारायण नगर का अस्तित्व था और उसे अलग अलग नामों से जाना जाता था। द्वापर युग के अंत में श्रीकृष्ण के महाप्रयाण करने के बाद उनके मृत शरीर को यहीं रखकर एक शबर तंत्र मंत्र की सिद्धियां किया करता था, बाद में उसे संभल नाम की पहाड़ी की गुफा में रखकर तांत्रिक सिद्धियां किये जाने का उल्लेख मिलता है। तब उसे ‘नीलमाधव‘ कहा जाता था। जब उस मूर्ति की देख भाल करने वाला कोई नहीं बचा तो तांत्रिकों ने उसे पुरी के मंदिर में स्थापित कर उसे ‘भगवान जगन्नाथ‘‘ के नाम से प्रचारित किया। भक्त के वशीभूत भगवान शिवरीनारायण में शबरीनारायण के रूप में गुप्त वास किये। ऐसी मान्यता है कि माघ पूर्णिमा को भगवान जगन्नाथ यहां सशरीर विराजते हैं और इस दिन उनका दर्शन मोक्षदायी होता है। कदाचित् भक्तों की भीढ़ आगे चलकर मेला का रूप धारण कर लिया। भगवान शबरीनारायण के चरण कुंड को ‘‘रोहिणी कुंड‘‘ कहा जाता है। माहात्म्य में इस कुंड का दर्शन करने मात्र से पाप मुक्त और मोक्ष होने की बात कही गयी है।
बुटु सिंह चैहान द्वारा लिखित ‘श्री शिवरीनारायण-सुंदरगिरि माहात्म्य और पंचकोशी यात्रा‘ में चित्रोत्पला गंगा-महानदी में अस्थि विसर्जन और पिंडदान की महत्ता का बखान किया गया है। यहां महानदी के तट पर अनेक घाट बने हुए हैं और माखन साव घाट तथा रामघाट में अस्थि विसर्जन कुंड बने हुए हैं। यहां एक प्राचीन वैष्णव मठ हैं। खरौद स्थित शिलालेख में वैष्णव मठ की स्थापना विक्रम संवत 933 में किये जाने का उल्लेख है। इस मठ के महंतों के द्वारा साल में दो बार क्रमशः माघ शुक्ल तेरस और विजयादशमी (दशहरा) को गादी चैरा पूजा किया जाता है जो तांत्रिक पूजा है। उल्लेखनीय है कि प्राचीन काल में जगन्नाथ पुरी के समान शिवरीनारायण का मंदिर भी तांत्रिकों के कब्जे में था जिसे आदि गुरू दयारामदास ने शास्त्रार्थ करके तांत्रिकों से मुक्त कराया था। तब से वे यहां के वैष्ण मठ के पहले महंत बने थे। पंडित हीराराम त्रिपाठी द्वारा लिखित श्री शबरीनारायण माहात्म्य में वैष्णव मठ और उसके महंतों के बारे में विस्तृत विवरण दिया है। उस माहात्म्य को मठ के महंत गौतमदास की प्रेरणा से लिखे जाने का उल्लेख भी है।
शिवरीनारायण में वैष्णव, शिव और शाक्त परंपराओं के मदिरों का अद्भूत समन्वय देखने को मिलता है। प्रमुख देव के रूप में भगवान शबरीनारायण और उसके आश्रयभूत देवों में भगवान चंद्रचूड़ महादेव, महेश्वरनाथ महादेव और माता अन्नपूर्णा का भव्य मंदिर दर्शनीय है। शैव मंदिर वंशधर के रूप में विख्यात् है जबकि माता अन्नपूर्णा की कृपा से समूचा छत्तीसगढ़ ‘‘धान का कटोरा‘‘ के रूप जग विख्यात् है। ग्रंथ के अंत में माहात्म्य के लेखकों के व्यक्तित्व और कृतित्व को रेखांकित करने वाला लेख है। शिवरीनारायण जैसे प्राचीन धार्मिक नगर का यह ग्रंथ लिखित साक्ष्य है। इससे निश्चित रूप से यहां की महत्ता से जन जन परिचित हो सकेगा और प्रदेश के पर्यटन को बढ़ावा मिलेगा। ग्रंथ का कलेवर आकर्षक है। भोगहा जी गाते हैं:-
आठों गण सुर मुनि सदा आश्रय करत सधीर
जानि नारायण क्षेत्र शुभ चित्रोत्पल नदि तीर
देश कलिंगहि आइके धम्र्म रूप थिर पाई
दरसन परसन वास अरू सुमिरन ते दुख जाई।।
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