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■कविता आसपास : तेज़ नारायण राय [दुमका-झारखंड]
4 years ago
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♀ झूठ को तभी मानूंगा सच
झूठ को तभी मानूँगा मै सच उस दिन
जिस दिन सच के लिए झूठ
छोड़ देगा अपनी सीट
और अचानक खड़े हो जायेगा उसे देखते ही
उस दिन झूठ को मानूँगा मैं सच
जब सच को देखकर
हाथ जोड़ अचानक खड़ा हो जायेगा झूठ
और करेगा अभिवादन सिर झूकाकर
उस दिन
जिस दिन सच के खातिर झूठ
बिछा देगा खटिया अपने दरवाजे पर
लगा देगा झाड़ झूड़ कर अपना बिस्तर
थके हारे सच को विश्राम के लिए
और खुद सो जायेगा जमीन पर बिछाकर
अपनी फटी पुरानी चटाई
कभी न आने वाली अपनी
अधूरी नींद को पूरा करने के लिए
और तो और जिस दिन झूठ
सच के प्राण बचाने खातिर
भरी भीड़ को चीरते हुए
आड़ देगा अपनी पीठ
सच के ऊपर बरसने वाली
हजार लाठियों की चोट खाकर।
मेरे गाँव के आदिवासी बच्चे
मेरे गाँव के आदिवासी बच्चे
भरी दुपहरिया में खेल रहे हैं
गाँव के बाहर सड़क किनारे खुले मैदान में
चरा रहे हैं अपनी गाय-बकरियाँ
और बीच-बीच में मुड़कर देख रहे हैं
दूर सड़क पर आती-जाती गाड़ियों को
वे नहीं जानते
उनके गाँव के बगल से गुजरती गाड़ियाँ
कहाँ से आ रही है, कहाँ जा रही हैं
यह भी नहीं जानते कि उन गाड़ियों में बैठे लोग
उन्हें देखकर क्या सोच रहे होंगे उसके बारे में
वे जानते हैं तो बस इतना
कि सड़कों के किनारे चर रहे
अपनी गाय बकरियों को
बचाना है उन तेज रफ्तार गाड़ियों से
और बचना है खुद भी
उन गाड़ियों के अंदर बैठे लोगों से
खुले पथरीले मैदान में दौड़ते भागते खेलते ये बच्चे
खोज रहे हैं सड़क किनारे लगे पेड़ों की छाँव
जिसे सड़कों की चौड़ीकरण ने निगल लिया है।
जैसे-जैसे सड़कें होती गयी चौड़ी
पेड़ तो पेड़ कुएँ तालाब भी होते गये गुम
गुम होते गये गोचर जमीन
सिमटता गया गाँव
खत्म होते गये पेड़ों की छाँव
खत्म होते गये उनके खेल के मैदान
बावजूद मेरे गाँव के आदिवासी बच्चे है
कि खेल रहे हैं भरी दुपहरिया धूप में
अट्ठागोटी, लुकाछुपी, गिल्ली डंडा
कि जब तक उनके तन पर लगी रहेगी गाँव की मिट्टी
तब तक उनका कुछ बिगाड़ नहीं पायेगी
ये दोपहर की चिलचिलाती धूप।
क्योंकि धूप तो धूप
वे सूरज को भी गेंद बनाकर
पैरों से उछाल रहे हैं।
♀ जिस जीत में हित नहीं ?
जिस जीत में हित नहीं
वह जीत नहीं हार है
जिस जीत में जनहित नहीं
वह जीत भी बेकार है
जिस जीत में मेहनत नहीं
वह जीत बस एक किस्मत है
जिस जीत में मेहनत है
वह किस्मत नहीं उन्नत है
जीतना है गर जीवन में
तो मेहनत करना सीखो
किस्मत के भरोसे मत बैठो
जनहित में कुछ करना सीखो
जनहित में जीत ही सच्ची जीत है
वर्ना सब बेकार है
जिस जीत में हित नहीं
वह जीत नहीं हार है।
■कवि संपर्क-
■62075 86995
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chhattisgarhaaspaas
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