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■कविता आसपास : महेश राठौर ‘मलय’ [जांजगीर-छत्तीसगढ़]
4 years ago
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♀ मुझे पुरंदर तलाशेगा
लोहे से
बोला पारस-
“आ गले लग जा,
तुझे कंचन कर दूँ।
तुझमें आभा का
अभिसिंचन कर दूँ।
काला-कलूटा,
सस्ता कहीं का।
भाग्य और हाल से
खस्ता कहीं का।”
सोना होगा
तो तेरा मान
हर कोना होगा।
रमणियों की
नासिका, कर्ण, ग्रीवों के
संस्पर्श का
आनंद लेगा।
रूप-रसपान करते
कभी आँखें खोलेगा,
कभी बंद कर देगा।
लोहा बोला-
“ओ पाषाण!
सोच मत मेरा
कल्याण।
मुझे नहीं होना सोना;
रंग, रूप बदलकर
मौलिकता नहीं खोना।
तुझे क्या पता?
जिरह-बख़्तर बनकर
कितने शूरों को मैंने
जंग जितवाया है।
कितनी बड़ी-बड़ी
अट्टालिकाएँ और सेतुओं को
स्कंध पर उठाया है।
फख़्र तो मुझे
तब हुआ था,
मेरे कारण जब किसी
शेर का नाम
“लौह पुरुष” हुआ था।
मैं हूँ धन्य,
नहीं बनूँगा अन्य।
तू ही क्यों
सोना नहीं बन जाता?
सुंदर-सलोना नहीं बन जाता??
खुद को कभी
तराश न सका,
मुझे क्या तरासेगा।
मैं बज्र हूँ
मुझे पुरंदर तलाशेगा।
■कवि संपर्क-
■81094 70546
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chhattisgarhaaspaas
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