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कविता आसपास : सुनीता अग्रवाल ‘ पिंकी ‘ [राँची झारखंड]
🌸 जीना कुछ ऐसे भी
कभी हँसा करते थे अपनों के संग में,
हम भी।
कभी रहा करते थे ख़ुशमिज़ाज बन हम भी।
ज़रूरत हुआ करती थी हमारी ज़रूरी
थे हम भी।
हर फ़र्ज़ निभाया करते थे,जिया करते थे ख़ुशी से
हम भी।
दिन-रात एक कर देते थे पोसने में
हम भी।
आज बेबस,लाचार,असहाय
महसूस करते
फिर भी ख़ामोश है
हम भी।
हर दर्द को महसूस कर के भी
अनजान है
शिकायत,किससे करें ,क्यूँ करें
चुप रहते
हम भी।
ज़िंदगी का यही फ़लसफ़ा है
फलदायी वृक्ष ही पूजा जाता है
पत्ते झड़ जाते है
सूखा ठूंठ पेड़ को पूछता कौन है?
खड़े है हम भी।
झुके कंधे भार उठा नहीं सकते,
झुक गए हम भी।
वक़्त की मार से अशक्त हुए हाथ संग
हम भी
फिर भी कोशिश करते उठाने की
हम भी
फिर भी आशीष देते
दुआओं की बरसात करते दिलसे
हम भी।
🌸 हरदम बहती
ये कलकल बहता पानी
कभी शांत सरोवर
मेरे चितवन सा।
कभी निर्झरिणी सा चंचल
मन में भेद कई छुपाए
कुछ बतलाए
कुछ अश्क़ों में बहाए
सब ख़ुद में
समाहित किए जाए
मुसकाए,हँसाये,
अंतर्मन के द्वन्द से होती
कभी हार कभी जीत,
फिर भी वो सरिता बन
हरदम प्रेम के गीत मधुर
गा गा कर सुनाए।
•संपर्क –
•76774 57423
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chhattisgarhaaspaas
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