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कवि और कविता : हिमांशु पाठक [जिला – गढ़वा झारखंड]
🌸 मेरे कदम
बढ़ चले हैं ये कदम,कांटो से सजे मंजिल के राहों पर,
मौत का कफन सिर बांधे और बुझा कर डर का दिया,
लो चल पड़े हम उन राहों पर जिसे हमने अपना जीवन दिया
बोरियत का कत्ल करके फल की इच्छा रोककर,
बढ़ चले हैं ये कदम कांटो से सजे इन राहों पर
चाहो जो तुम रोक लो,जो रोक सको मेरे कदम
तुम रास्तों में अड़चनों का मखमली बिस्तर बिछा कर देख लो,
पर संघर्ष के इस काल को दिल में यूं ही कहीं पर दफन किए,
ना रुकेंगे ये कदम जो बढ़ चुके हैं मंजिल के इन राहों पर,
यदि आये इन राहों में सैलाब अपनों के याद की,
बोल देंगे हम उन्हें कि तू ठहर जा उधर ही अभी,
सिर्फ मंजिल की चाह को अपने हृदय में प्रज्वलित किए,
ना रुकेंगे यह कदम राहों की अड़चन देखकर,
जो रुके मेरे कदम इन अड़चनों को देख कर,
पूछ उठेगा दिल मेरा क्यों देखा था तूने उन ख्वाबों को,
उन ख्वाबों को जो तूने देखा था दिन में ना की चांदनी रात में,
खुद से ना नजरे मिला पाना होगा नहीं मेरे लिए मौत से कम,
इसी डर के खौफ से और मंजिल की तमन्ना साथ रख और सफलता के मंजर को याद कर,
बढ़ चले हैं ये कदम कांटो से भरे इन राहों पर
🌸 तुम यदि तनिक खुद पर विश्वास करो
यह जग तुम्हारी मुट्ठी में हो जाए ,
तुम यदि तनिक खुद पर विश्वास करो ,
भय के ऊंचे किले ढह जाएँ,तुम पर्वत शिखर पर चढ़ जाओ ,
गगन पुष्प वर्षा करे जहां, और तुम बन सितारा चमक जाओ ,
यह जग तुम्हारे मुट्ठी में हो जाएँ,
तुम तनिक खुद पर विश्वास करो ,
प्रलय के काल भी तुमको पथ से ना डगमगा पाए ,
धुआंधार अम्ल वर्षा भी तुम्हारे बदन को ना झुलसा पाए ,
यह क्षितिज तुम्हारा गुण गाए , सफलता पर तुम अपना अधिकार करो ,
उस पथ को भी गर्व की अनुभूति हो जिस पर तुम्हारे पांव पड़े ,
उस कंकड़ को भी उद्धार मिले जो तुम्हारे राहों का अड़चन बने ,
हर चीज तुम्हारी हो जाए जिसकी तुम कल्पना करो ,
यह जग तुम्हारी मुट्ठी में हो जाए,
तुम यदि तनिक खुद पर विश्वास करो ,
हंसने वाले तुम पर हरमुख पर ताले लग जाएंगे ,
तुम्हें अपमानित करने वाले तुम्हें छूने को तरस जाएंगे ,
बुझ जाएगा अंधकार युगो युगो का ,
तुम जरा मसालों पर विश्वास करो ,
यह जग तुम्हारी मुट्ठी में हो जाए ,
तुम यदि तनिक खुद पर विश्वास करो ,
तुम्हारा निज विश्वास अपनों के आंखों में गर्व के आंसू भर जाएगा ,
प्रेरणा रहित बस्तियों में यह नया दीपक जलाएगा ,
तुम्हारे अभी के कांटे तुम्हारा भविष्य बनाएगा ,
नहीं जरूरत होगी तुम्हें नजरें मिलाने की तुच्छ लोगों से ,
तुम्हें तुम्हारा विश्वास ही इतिहास के पन्नों का अमर साथी बनाएगा ,
उतरेगी अंगारों की गर्मी पत्थर पानी बन जाएगा ,
उगलेंगे मोती वह सागर भी जिसने कभी तुम्हें डुबाया था ,
पछताएंगे वह तीर भी जिसने तुम्हारे बदन पर खुद को चुभाया था ,
बन जाएगी आसान ऐसी हर एक चीज असंभव ,
तुम बन कर एक मिसाल मरो ,
यह जग तुम्हारी मुट्ठी में हो जाए ,
यदि तुम तनिक खुद पर विश्वास करो ,,
🌸 मेरे शान
तन पर बसत दयनीय वस्त्र का
स्वर्ण आभूषण सा करते सम्मान ,
खुद के रोटी के टुकड़े को
अपने जाने जिगर को करके निसार ,
हमारे व्यथित मन के घाव पर
अपने प्रेम का मरहम भरकर ,
मुसीबत के अंगारों पर नंगे पांव चल कर
क्रूर अभावों को खुद ही भुगत कर ,
निज अभिलाषाओं का कत्ल करकर
देते हैं अतुलित मुस्कान ,
यह है मेरे पिता की शान जिनमें बसते हैं मेरे प्राण
वर्षा होती ,पड़ती ठंडी
हमें दिलाकर हमारी चाहत
वह झेलते हैं स्वयं ही मंदी ,
कारखाने अब बंद पड़े हैं,
नहीं होती कुछ खास कमाई ,
दिन के सूर्य के ताप को सहकर ,
रात की निद्रा को भी भूल कर,
करते वह जीतोड़ मेहनत
पितृत्व के धर्म को करते पूर्ण ,
खुद पर अटल विश्वास रखकर ,
हम भूल गए हैं अपनी माई
ख्वाबों की आरजू भी यही है होती ,
जिए जनक हमारे बन अमर ज्योति,
पिता है ईश्वर का दूजा नाम ,यह मेरे पिता की शान ,जिनमें बसते हैं मेरे प्राण
आते जब वह नीज पसीनों का सौदा कर ,
संतुष्टि का भाव खरीद कर
बड़ा बनना तुम मेहनत ही कर कर ,
ना की किसी को दर्द देकर ,
देते हमें यह जीवन का ज्ञान ,
एक शाम लाए वह एक नए जोड़े जूते ,
यह कह कर कि यह है तेरे ,
मेरे तो अभी नहीं है फटे ,
भेंट है मेरी यह तुझको ,
जो तु मुझसे कभी ना रूठे ,
उसे पहन जो हम बाहर निकले ,
तो ही हमारे दिल कुछ टूटे ,
कोने में एक पड़ा था जूता ,,
मानो इन्हें मैंने कहीं तो था देखा ,
उसके टूटे हुए खिड़कियों से झांकती थी एक मजबूरी ,
दिल की नवीन उमंगे उस क्षण ही अश्कों में बदल धरातल पर यूं ही टपकने लगी ,
वापस सो गए हम अंदर आकर ,
अपने आंसुओं को आंखों से विदा कर ,
ऐसे लोग होते हैं कितने महान ,
जी करता है, मैं करूं उन पर अति अभिमान ,
यह है मेरे पिता की शान ,जिनमें बसते हैं मेरे प्राण ,
देता है दिल यहीं संदेशा ,
पिता का करना सर्वदा सम्मान ,
भागदौड़ भरी इस क्षणिक जिंदगी में ,
करना नहीं उन्हें नजरअंदाज।
•कवि संपर्क –
•62023 92621
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chhattisgarhaaspaas
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