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संस्मरण : विद्या की पत्ती :सुधा वर्मा [रायपुर छत्तीसगढ़]
हम लोग स्कूल में पढ़ते थे। कुछ लोग साथ जे आर.दानी स्कूल जाते थे। छैमाही परीक्षा के समय मेरी सहेली विज्ञान के एक सवाल का जवाब पूछ रही थी। उसने अपनी कापी निकाली तो उसकु कापी हे विद्या की पत्ती बाहर गिर गई। मैं उसे उठाकर सहेली को दी। मैने पूछा कि तुम भी पत्ती और फूल कापी पुस्तक में दबा कर रखती हो? मुझे भी बहुत शौक है। मैं पुरानी पत्रिकाओं में बहुत तरह की फत्तियाँ और फूल दबा कर रखी हूँ। इससे ग्रिटिंग भी बनाती हूँ, पर यह विद्या मेरे पास नहीं है। इसका छोटा सा भाग मुझे भी देना।
उसने पहले अपने सवाल का जवाब मांगा । मैं उसे उसके सवाल.का जवाब दी। उसके बाद उसने बताया कि मैं इसको तोड़ कर नहीं दूंगी।
मैं पूछी – “क्यों ”
सहेली ने कहा – ” इसे बुद्धी बढ़ने के लिये रखा जाता है। इसका नाम विद्या है यह हमें विद्या देती है। परीक्षा के समय तो मैं इसे अपने कम्पास में रख लेती हूँ।”
मैनें कहा – “अच्छा मैं तो यह पहिली बाल.सुन रही हूँ। मेरे लिये भी लाना।”
घंटी बज गई और हम लोग परीक्षा देने अपने कमरे की ओर चले गये। पेपर देकर.निकले तब सहेली मिली। परपर कैसा बना इस पर दोनों बात किये। लह बोली देखो मेरा पेपर अच्छा बना क्योंकि मेरे पास विद्या की पत्ती थी। मैं उसे देखती रही और अपने घर आने के लिये निकल गई। उसने भी दूसरे दिन मेरे लिये भी पत्ती लाने का वायदा करके चली गई। मैं सोचती रही कि एक पत्ती को रखने से बुद्धी बढ़ जाती है। गधे लोग भी होशियार बन जाते हैं तो फिर सालभर पढ़ने की क्या जरुरत है। सहेली ने.दूसरे दिन पत्ती लाकर दी। मैने बहुत ही श्रद्धा के साथ उसे अपनी किताब में रख लिया। साल गुजर गया। मेरे.लिये तो वह बस पत्ती ही थी जैसे मैं और फत्ती फूल को किताबों में दबा कर रखती हूँ उसमें यह भी एक पत्ती जुड़ गई थी। मैं देखी कि विद्यार्थियों में यह पत्ती रखने का शौक बढ़ते जा रहा है। लोग इस पर विश्वास करने लगे थे। मुझे तो कोई फर्क ही नहीं पड़ा। पर आठवीं में आई तो यह पत्ती खो गई। पढ़ाई के धुन में ध्यान भी नहीं गया। अच्छे नम्बरों से पास भी हो गई।
यह बात मैं भूल गई। बी एस सी में आई तो वनस्पत्ती शास्त्र में पौधों के वर्गुकरण के बारे में पढ़ने लगे। तब मुझे विद्या के बारे में पता चला कि यह थुजा कहलाता है। यह 90 फीट तक ऊंचा होता है। इसमें बीज भी होते हैं यह कलम से और बीज दोनों से उगता है। इसका कलम बारीश में ही लगाना चाहिये।
कुछ जानकारी एम एस सी में मिली। इसका वानस्पतिक नाम थूजा है। इसको वास्तु के लिये भी लगाते हैं। इसे जोड़े में लगानि चाहिये। इसे दरवाजे के दोनों तरफ रखना चाहिये। इसखा उपयोग दवाई बनाने मैं भी करते हैं। यह मस्सा को गला देता है। इसे तेल के रूप में लगाना चाहिये। इसकी होमियोपैथी में बहुत दवाई बनी है। जोड़ों के दर्द के लिये थुजा देते हैं।
इस समय मुझे समझ में आया कि असल में यह बुद्धी के लिये नहीं सकारात्मक उर्जा के लिये रखा जाता रहा होगा। परीक्षा के समय में तनाव रहता है तो इससे वह ठीक हो जाता रहा होगा। लोगों ने इसै अंधविश्वास के रुप में ले लिया।
इसे सामान्यभाषा में मयूर पंख भी कहते हैं।यह मयूर पंख की तरह दिखता है बोलते हैं पर ऐसा मुझे नहीं लगता है। मयूर पिच्छ के नाम से एक जड़ी बूटी भी आती है जिसका उपयोग आयुर्वेद में करते हैं। यह बहुत बढ़े हुये पित्त के लिये खाया जाता है। यह मयूर पंख की तरह दिखता है।
थुजा को मयूर पंग बोलते हैं और उसको बुद्धी बढ़ाने के.लिये रखते हैं। इसके मयूर पंख बोलने के कारण बच्चे किताबों में मयूर पंख भी रखने लगे थे।साथ में चिड़ियों के रंगीन पंख भी रखने लगे।
एक दूसरे से जुड़े होने के कारण यह होता रहा पर अब कोई नहीं रखता है। अब तो हर घर में क्यारी या फिर गमले में लगा मिलता है। में इसके पीछे नहीं भागी पर इसके बारे में जानने की कोशिश जरुर की। यह सब एक सोच है। परीक्षा देना और उस दिन विषय पर लिखने के लिये पढ़ाई जरुरी है न कि मयूर पंख , थूजा।
•संपर्क –
•94063 51566
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chhattisgarhaaspaas
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