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- विशेष : सत्ता की चाह कांग्रेस की राह चल पड़े नंद कुमार साय, डिलिस्टिंग कराने वाले अब डिरेल कैसे ❓ नंद कुमार साय के जाने आने जाने का क्या होगा राजनीतिक असर ❓ – संजय कुमार मिश्रा
विशेष : सत्ता की चाह कांग्रेस की राह चल पड़े नंद कुमार साय, डिलिस्टिंग कराने वाले अब डिरेल कैसे ❓ नंद कुमार साय के जाने आने जाने का क्या होगा राजनीतिक असर ❓ – संजय कुमार मिश्रा

राजनीति दिमाग की उपज है दिल की कतई नहीं,जो दिल से लगाई उसकी हुई जग हंसाई. जी हां,यह कथन ठीक उसी तरह सत्य है जैसे तेल और पानी की मित्रता.आजकल ट्रेंड बदल गया है.मंच का ड्रामा कुछ और होता है और घर मे खिचड़ी कुछ और पकती है.छत्तीसगढ़ में आदिवासी चेहरों का नेतृत्व करने वाले पूर्व बीजेपी सांसद नंदकुमार साय का कांग्रेसीकरण हो जाना बोरे बासी की चटनी का स्वाद बयां करता है.कुछ दिन पूर्व ही मंच के यही नेता राज्य के मौजूदा सरकार को आदिवासियों यानि जनजातियों के खिलाफ हो रहे गैर बराबरी और धर्मान्तरण के बीच मिलने वाले जनजाति लाभ का विरोध कर रहे थे.मतलब डिलिस्टिंग के पक्ष में थे और पानी पी पी कर कांग्रेसी सरकार को कोसते थे.और अचानक इनका कथानक बदल गया और वो भी उस दिन जब मजदूरों के संघर्ष का दिन था,यानि 1 मई मजदूर दिवस. इसी दिन को प्रदेश की मौजूदा सरकार गरीबों और दलितों के भोजन बोरे बासी को राज्यव्यापी खाद्य दिवस या भोज दिवस भी कह सकते हैं,लागू किया है.
भूपेश सरकार जो भी कदम उठा रही है वह बड़े ही चालाकी पूर्वक कारगर कदम साबित होते हैं.साय को अपने भोज में शामिल कर लेना भी एक सार्थक कदम माना जा रहा है.यह कदम सार्थक तब और हो जाता है जब राज्य में इस साल चुनाव होने को हैं.नंदकुमार साय जिन्हें बीजेपी ने एक नाम पहचान और पद देकर बड़ा आदिवासी नेता साबित किया,चौथेपन में एकाएक राग सुर बदल कर भगवा से बगावत कर कांग्रेस का हाथ थाम लिया है.इसकी चर्चा जितनी होनी थी उतनी तवज्जो तो नही दी गई लेकिन मसला समझ के बाहर नहीं बल्कि भीतर ही है.नंदकुमार साय के पाला बदल लेने से क्या भाजपा के लिए और खराब दिन आ जाएंगे या फिर नए आदिवासी चेहरे को मौका दुरुस्तीकरण का होगा यह तो बिल्ली के भाग्य से छींका फूटने वाला भी हो सकेगा यह तो महीने भर की हलचल के बाद पता चल पाएगा.राजनीति के केंद्रीय चाणक्य मौजूदा गृहमंत्री अमित शाह और छत्तीसगढ़ के राजनीतिक पहलवान भूपेश बघेल दोनों की चाल 14 मई के बाद समझ आ सकती है.क्योंकि केंद्रीय चाणक्य कर्नाटक चुनाव में हारी बाजी का दांव आजमा रहे हैं तो वहीं भूपेश बघेल भी चुनाव में स्टार की भूमिका में देखे जा सकते हैं.
भाजपा वर्तमान समय मे सबसे ज्यादा ताकतवर पार्टी बन कर उभरी है.गुणा गणित में सबसे ज्यादा निपुण देखी जा रही है.कभी कभी बाहर से दिखने वाली बाजी हारती दिखती जरूर है लेकिन अंत समय मे हार कर भी जीत जाने की कला बीजेपी दिखा देती है.शायद,तूफान के पहले की खामोशी भी इसे कहा जा सकता है.हालांकि छत्तीसगढ़ में भाजपा का अभी कोई ठोस पहलवान दिखाई नही पड़ रहा है जिस पर पार्टी दांव लगाकर पूरा का पूरा खेल अपने पक्ष में कर ले,रमन सिंह आउटडेटेड हो चले हैं भाजपाई खुद उनका नाम लेना अब मुनासिब नही समझते,लेकिन कोई दिख भी तो नही रह है.शायद यही वजह है कि भूपेश सरकार के खिलाफ कोई ठोस मुद्दा विपक्षी दल के पास है नहीं.प्रशासनिक अधिकारी का अनुभव और कुछ राजनीतिक ककहरा की सीख लेने वाले चौधरी भी सुराग करते दिख रहे हैं लेकिन राजनीति के माहिर भूपेश बघेल से उनकी तुलना नही की जा सकती.
ऐसे में नंदकुमार साय की हैसियत कांग्रेस में क्या होगी यह कह पाना अभी मुश्किल है.हालांकि बाहरी तब तक महत्वपूर्ण माना जाता है जब तक वह बाहर से अंदर नही आ जाता,और जब अंदर आ जाता है तब तो उस घर के वसूलों पर ही उसे चलना होता हैअपनी मनमानी नही कर पाता.यही हश्र शायद साय के साथ भी हो सकेगा. कुछ दिन पहले यही नंदकुमार साय राष्ट्रीय स्वाभिमान पार्टी के साथ स्वाभिमान यात्रा निकालने की बात कर रहे थे,सार्वजनिक रूप से प्रेस कांफ्रेंस में भी छत्तीसगढ़ के स्वाभिमान की बात की थी.लेकिन भारतीय जनता पार्टी के दबाव के चलते वह यात्रा नही निकाल सके.लेकिन कांग्रेसी दामन के साथ भगवा का बैरियर काम नही कर पाया या फिर भाजपा ने रोकने की कोई कारगर उपाय ही नही किया.यदि भाजपा इनकी कोई सार्थक जमापूंजी देखती या उसे लगता कि साय पार्टी के लिए हितकर हैं तो शायद साय की शाम कांग्रेस के साथ नहीं बल्कि भाजपा के साथ गुजरती.
एक राजनीतिक विश्लेषक का कहना है कि साय का अब आदिवासियों में उतनी पैठ बची नही है जितनी पहले थी,इसलिए डिलिस्टिंग का जोर सरकार पर नही चल सका.डिलिस्टिंग के एक मजबूत पिलर को ही डिरेल करने में कांग्रेसी सत्ता कामयाब रही.शायद यह डिलिस्टिंग की आवाज उठाने वाले जनजातियों के लिए छलावा है जो नंदकुमार ने किया है.इससे न तो कांग्रेस को कोई लाभ होगा और न ही भाजपा को कोई नुकसान .

•लेखक संजय कुमार मिश्रा ‘ छत्तीसगढ़ आसपास ‘ के पॉलिटिकल एडिटर हैं
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