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विशेष : स्त्री का अंधकार •अनुराधा बक्शी ‘ अनु ‘ [दुर्ग छत्तीसगढ़]
कितना मुश्किल है
स्त्री होना और उससे भी ज्यादा मुस्किल उसका स्त्री बने रहना। एक स्त्री असीमित शक्ति की स्वामिनी होती है।वैसे तो प्रकृति और स्त्री एक ही है पर प्रकृति ने स्त्री की शारीरिक रचना को जितना जटिल बनाया है उसकी सोच को उससे भी ज्यादा जटिल और शारीरिक क्षमता मे अपेक्षाकृत कुछ कमजोर भी। जब स्त्री एक जीवन को जन्म देकर गहन अंधकार से प्रकाश में लाकर उसे को प्रकृति का हिस्सा बनाती है तब उसकी शारीरिक पीड़ायें इस जटिलता की कहानियां कहती हैं।कितना सुखद और पीड़ादायक है मां बनना।इस पीड़ा को सुखद भी एक स्त्री ही बना सकती है। क्योंकि वो एक शक्ति है।
अक्सर स्त्री जाने-अनजाने बहुत सारे बंधनो में बांधकर स्वयं को संचालित करती रहती है जो या तो समाज, रूढ़ी, परम्पराओं इत्यादि द्वारा दिए हुए होते है और कुछ के आवरण वो स्वयं से ओढ़े रहकर खुदको अपनी सीमाओं में बांधकर रखती है और इन बंधनों के बोझ को ढोते रहती है ।
एक स्त्री असीमित शक्ति की अपनी स्वामिनी होती है ।वो एक तेज प्रकाश पुंज है। जब वह इस प्रकाश पुंज से मिलना चाहती है तब स्वयं से तय की गई सीमाओं और पुरुष प्रधान समाज द्वारा निर्मित रेखाओं में अपनी असीमित शक्ति को सीमित दायरे में समेट लेती है और उन बंधनो से लहूलुहान थकती टूटती हुए गहन अंधकार की तरफ खुदको मोड़ लेती है। ये वही समय होता है जब वो एक इंसान भी नहीं रह जाती। लाचारी और घुटन महसूस करती है।
जरूरी था शिव का सती के पैरों के नीचे लेटना। जरूरी है स्त्री का स्वयं की सीमाओं में बांधना। यदि ऐसा न हो तो समाज की तस्वीर ही कुछ और होती या समाज होता भी ? पर स्त्री होते हुए उसकी की वो घुटन उसे अक्सर परेशान करती है जब उसके त्याग का मूल्यांकन तो दूर उसके बारे में कोई सोचता भी नहीं। उसे एक इंसान होने का अधिकार छीन लिया जाता है। यदि आत्म का संबंध परमात्मा से है तो एक स्त्री सिर्फ कैसे हो सकती है वहां तो वह सिर्फ एक इंसान भी नहीं । यदि डायरी के आखिरी पेज से लेखक का स्वभाव समझने की क्षमता रखने वाला समाज स्त्री के अंदर की उथलपुथल उससे उपजी शारीरिक और मानसिक स्थितियों को नहीं समझ पाता।
नसीब का मोहताज नहीं, मुझे नसीब बनने दो
हर घर में मुझसे शुकून है, मुझमें शुकून बहने दो
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chhattisgarhaaspaas
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