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विशेष : कर्नाटक का फैसला 2024 के आम चुनाव में मोदी सरकार के वाटरलू का सूचक होना चाहिए – पीजे जेम्स, महासचिव, भाकपा [माले] रेड स्टार

भाकपा [माले] रेड स्टार ने कर्नाटक की जनता को तहे दिल से बधाई दी है और राज्य में फासीवादी “डबल इंजन सरकार” (केंद्र और राज्य दोनों में भाजपा शासन की संघी रूपरेखा) को पटरी से उतारने के लिए उनके साथ एकजुटता की घोषणा की है। 224 सदस्यीय विधानसभा में कांग्रेस के 136 सीटें जीतने के साथ, यह पिछले साढ़े तीन दशकों में कर्नाटक में किसी एक पार्टी के लिए सबसे बड़ी बढ़त है, जबकि मौजूदा कमल छाप पार्टी की कुल सीटें 65 तक गिर गई हैं। ईवीएम, कॉर्पोरेट पूंजी और मीडिया की शक्ति सहित पूरे केंद्रीय और राज्य प्रशासन को झोंकने के बावजूद उन्हें राज्य की जनता ने नकार दिया है। जनता द्वारा फासिस्ट संघ परिवार को नकारने और इसे इतना गंभीर झटका लगने के कारण, इस मोड़ पर संघी प्रबंधकों के लिए खरीद-फरोख्त के जरिए लोगों के फैसले को तोड़ना या मोड़ना असंभव हो गया है, बावजूद इसके कि 2018 के कर्नाटक विधानसभा चुनाव की तुलना में इस बार के चुनाव की पूर्व संध्या पर एसबीआई द्वारा चुनावी बांड की बिक्री में लगभग 9 गुना बढ़त दर्ज गई है। इस चुनावी हार के साथ, आरएसएस/बीजेपी ने एकमात्र दक्षिणी प्रवेश द्वार खो दिया है जिस पर उसने अब तक शासन किया है।
मोदी-शाह-योगी की तिकड़ी के नेतृत्व में अपने धुर दक्षिणपंथी, सबसे भ्रष्ट, कॉर्पोरेट-परस्त, मनुवादी-ब्राह्मणवादी एजेंडे के साथ, आरएसएस/बीजेपी द्वारा कर्नाटक में अभूतपूर्व, अल्पसंख्यक विरोधी (विशेष रूप से मुसलमानों को लक्षित करने वाला), दलित विरोधी और महिला विरोधी दुर्भावनापूर्ण व दुष्टतापूर्ण चुनाव अभियान संचालित किया गया। मोदी ने स्वयं 19 रैलियों और 6 रोड शो का नेतृत्व करके इस नफरती मुहिम का नेतृत्व किया, इसके बाद अमित शाह ने 16 रैलियों और 15 रोड शो में भाग लिया और योगी भी कई जगहों पर ऐसा ही कर चुके हैं। अधिकांश केंद्रीय मंत्रियों और भाजपा नेताओं के जमावड़े के जरिए संघी मनुवादी फासिस्ट ताकतों ने अपनी पूरी ताकत लगा दी थी।
सामान्य अल्पसंख्यक विरोधी संकल्पों और हथकंडों जैसे कर्नाटक में एनआरसी का विस्तार, समान नागरिक संहिता का कार्यान्वयन, ‘मुस्लिम कट्टरवाद के खिलाफ विशेष पुलिस विंग’ का आरोपण, गौ संरक्षण और धर्मांतरण विरोधी बिल, 4% मुस्लिम आरक्षण कोटा समाप्त करना , मुस्लिम और ईसाई पूजा स्थलों और प्रार्थना सभाओं में तोड़फोड़, हिजाब के नाम पर मुस्लिम लड़कियों का लगातार उत्पीड़न, उन्हें पढ़ाई छोड़ने के लिए मजबूर करना, गौ रक्षकों के हमले और मुस्लिम व्यापारियों का बहिष्कार, और इसी तरह, अपने गुरु गोलवलकर के विचार पुंज ( बंच ऑफ थॉट्स) द्वारा दुश्मन नंबर एक का दर्जा दिए गए मुसलमानों के बारे में घोर उपेक्षा का भाव प्रदर्शित किया गया। इस बार आरएसएस/बीजेपी नेताओं ने एक और कदम आगे बढ़कर खुले तौर पर मुस्लिम वोटों की आवश्यकता को नकारते हुए, एक हिंदूराष्ट्र की स्थापना की दिशा में अपनी गति का परीक्षण पूर्वाभ्यास के रूप में किया।
चुनाव के अंतिम चरण में मोदी ने आरएसएस थिंक-टैंक द्वारा निर्मित ‘केरल स्टोरी’ का प्रभावी ढंग से उपयोग करके ‘लव जिहाद’ और आतंकवाद’ के रूप में मुसलमानों के खिलाफ इस घृणा अभियान का नेतृत्व संभाला, जो कि पहले ही जांच एजेंसियों और अदालत द्वारा निराधार साबित किया जा चुका है। इस्लामोफोबिया के साथ-साथ ईसाई चर्चों पर सुनियोजित हमले और एससी आंतरिक आरक्षण के साथ छेड़छाड़ करके दलित समुदाय के विघटन के साथ-साथ उत्पीड़ितों के एक वर्ग को दूसरे के खिलाफ खड़ा करना, और उन्हें बांटो और राज करो की नीति के आधार पर हिंदुत्व की तह में घसीटना घृणित फासीवादी कदम थे। लोगों के जीवन, विशेष रूप से मेहनतकशों और दबे-कुचले लोगों के जीवन पर भाजपा सरकार की घोर जन विरोधी नीतियों के चलते उन पर पड़ने वाले भयानक आर्थिक प्रभाव और उनका ध्यान सबसे आवश्यक वस्तुओं की आसमान छूती मंहगाई से और
साथ ही शासन-प्रायोजित भ्रष्टाचार जो कर्नाटक में पहले कभी नहीं देखा गया है से जनता का ध्यान हटाने के लिए संघ परिवार ने ये नफ़रत का जहर फैलाया था । भाजपा शासन के पिछले पांच वर्षों के दौरान, असंख्य भ्रष्टाचार घोटाले समाचार में थे जिसने इसे “40% कमीशन सरकार” का तमगा हासिल हुआ था। सरकारी ठेकों में प्रचलित ‘कमीशन दर’ अधिक बताई जाती है और बच्चों की मध्याह्न भोजन योजना भी लूट का जरिया बन गई है। इन सबसे ऊपर, कारपोरेट-भगवा फासीवाद की एक अति-दक्षिणपंथी प्रयोगशाला होने के नाते, कर्नाटक शासन सभी नवउदारवादी नीतियों को लागू करने में सबसे आगे रहा है, जिसमें निरंकुश कृषि कानून भी शामिल हैं, हालांकि केंद्र द्वारा फिलहाल इसे ठंडे बस्ते में रखा गया है।
हालाँकि, जैसा कि चुनाव परिणाम दिखाते हैं, अराजनीतिक शहरी अभिजात वर्ग को छोड़कर, मोदी के नेतृत्व में व्यस्त अभियान का अधिकांश जनता पर बहुत कम प्रभाव पड़ा। केंद्रीय और राज्य प्रशासन दोनों के नियंत्रण में भाजपा द्वारा आयोजित रैलियों और रोड शो का केवल नकारात्मक प्रभाव पड़ा। उदाहरण के लिए, जिन 17 स्थानों पर मोदी ने हाई-प्रोफाइल रैलियां और रोड शो किए, उनमें बीजेपी केवल 5 सीटें जीत सकी, जबकि एससी के लिए आरक्षित 36 सीटों में से उसे 22 सीटों का भारी नुकसान हुआ। कर्नाटक चुनाव परिणाम ने प्रभावी रूप से अजेय व्यक्तित्व और मोदी के करिश्माई भाषण की छवि की धज्जियां उड़ा कर दिया, जिसे आमतौर पर “गोदी मीडिया” द्वारा प्रचारित किया जाता है। घटते “मोदी प्रभाव” को देखते हुए, आरएसएस जो कि दुनिया का सबसे बड़ा और सबसे पुराना फासीवादी संगठन है और जिसके लिए बीजेपी केवल एक राजनीतिक उपकरण है, आने वाले दिनों में अन्य विकल्पों का सहारा ले सकता है।
कर्नाटक चुनाव ,मेहनतकश जनता, दलितों, मुस्लिम ओबीसी सहित उत्पीड़ितों की ओर से वोटों के एक स्पष्ट फासीवाद-विरोधी रुझान को दर्शाता है। जैसा कि पहले ही उल्लेख किया गया है,यह रुझान साफ तौर पर, ब्राह्मणवादी उच्च-जाति की धन्ना सेठ पार्टी भाजपा के खिलाफ है। अतीत के विपरीत, कर्नाटक चुनाव में ऐसा लगता है कि कांग्रेस ने एक तरफ बजरंग दल जैसे आरएसएस के आनुषंगिक संगठनों के खिलाफ खुला रुख अपनाते हुए और मुस्लिमों को 4% आरक्षण कोटा वापस लाने का वादा करके मनुवाद का कड़ा विरोध करते हुए अपने नरम-हिंदुत्व उन्मुखीकरण को छोड़ दिया है। कांग्रेस ने विशेष रूप से मुसलमानों और दलितों को लक्षित करने वाले घृणा अभियान का विरोध किया। व्यापक वामपंथी, लोकतांत्रिक ताकतों के कई वर्ग और बुद्धिजीवियों, सांस्कृतिक कार्यकर्ताओं और संबंधित नागरिकों का एक व्यापक स्पेक्ट्रम आरएसएस के नव-फासीवाद के खिलाफ खुले तौर पर लोगों के बीच अभियान चलाने के लिए आगे आया। इसने लोगों, मुख्य रूप से ग्रामीण जनता को एकजुट करने और आरएसएस विरोधी वोटों में विभाजन से बचने के लिए उनका अत्यधिक राजनीतिकरण किया।
इस सन्दर्भ में, नवउदारवादी-निगमीकरण के खिलाफ एक वाम-जनवादी विकल्प तैयार करते हुए, फासीवादी ताकतों को तगड़ा झटका देने वाले कर्नाटक चुनाव से सीख लेते हुए, आगामी विधानसभा चुनावों में क्रांतिकारी वामपंथी और प्रगतिशील ताकतों को आगे आना होगा। आरएसएस फासीवाद को हराने के लिए सभी फासीवाद-विरोधी ताकतों के साथ एकजुट होना होगा। यह पहल, कर्नाटक में भाजपा शासन के पतन की निरंतरता में, 2024 के आम चुनाव में मोदी शासन को हराने के लिए फासीवाद पर चौतरफा आक्रमण के लिए लॉन्चिंग पैड का निर्माण करेगी। इसमें कोई संदेह नहीं है कि कर्नाटक की पराजय को देखते हुए, फासीवादी शासन, सत्ता पर बने रहने के लिए अपने शस्त्रागार में सभी हथियारों का सहारा लेगा, और यह देश की सभी फासीवाद-विरोधी ताकतों पर निर्भर है कि वे यथासंभव व्यापक एकता के साथ इस लड़ाई में खड़े हों।
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chhattisgarhaaspaas
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