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कुछ जमीन से कुछ हवा से : प्रमोद वर्मा स्मृति व्याख्यान माला – विनोद साव

•व्याख़्यान देते हुए आलोचक प्रो. जयप्रकाश
यह एक अच्छी शुरुआत हुई कि बख्शी सृजन पीठ, भिलाई ने ‘प्रमोद वर्मा स्मृति व्याख्यान माला’ का शुभारम्भ कर दिया है. इससे पीठ में होते रहने वाले साहित्यिक कार्यक्रमों को न केवल गति मिलेगी बल्कि विचारों और विचारकों का दिशावर्द्धन भी होगा और सृजनपीठ के माध्यम से एक बौद्धिक माहौल बना रहेगा. आज लिखने से कहीं अधिक लिखे जा रहे पर चर्चा साथ ही साहित्यिक आयोजनों के केंद्र में ‘विमर्श’ को महत्ता के साथ रखना जरुरी है.
साहित्य अकादमी, संस्कृति परिषद् और सृजन पीठों को ये देखना होगा कि वे अपने आयोजनों में किस तरह और कितना साहित्य के वांछित क्षेत्रों और अनछुए प्रसंगों व लेखकों की ओर उन्मुख हो रहे हैं. निराला, मुक्तिबोध और कविताओं के भंवरजाल से निकलकर इतर विधाओं के अन्यान्य लेखकों की ओर भी वे अपने सैद्धांतिक सोच से थोडा हटकर व्यावहारिक नजर दौडाएं. पाठकों का संकट, किताबों की कम बिक्री, साहित्य में व्याप्त होती नीरसता को साहित्यिक संस्थाएं दूर नहीं भी कर सकती हैं, तो उसे कम तो कर ही सकती हैं. जिस तरह लेखन के लिए एक दृष्टि विशेष आवश्यक है वैसा ही आयोजन के लिए भी वृहद् दृष्टि का होना आवश्यक है. आयोजन, कौशल से बढ़कर व्यापकता की मांग करता है ताकि साहित्य से विरक्त हो रहे पाठकों को साहित्य की ओर लौटाया जा सके.
इस दृष्टि से देखें तो बख्शी सृजन पीठ ने अपने अल्प-समय के आयोजनों में कुछ पहल की है… और सृजनपीठ ने सप्रे, बख्शी, लतीफ़ घोंघी, प्रमोद वर्मा जैसे साहित्य के श्रेष्ठ मगर अपेक्षाकृत अनछुए लेखकों को अपना बैनर बनाकर आयोजन किया है और कर रहे हैं. पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जिनसे छत्तीसगढ़ की साहित्यिक आत्मा की पहचान पूरे देश में हुई, उन बख्शी पर निरंतर महत्वपूर्ण आयोजन हो रहे हैं. उनके व्यक्तित्व कृतित्व पर प्रबुद्ध लेखकों के आलेखों को संग्रहित आमंत्रित कर ग्रंथ प्रकाशन करने के विषय में भी सोचा जा रहा है.
व्यंग्य विधा पर एक उल्लेखनीय कार्यक्रम कर उसे लतीफ़ घोंघी जैसे जनधर्मी व्यंग्यकार को समर्पित किया गया. पीठ की यह सर्वथा नयी पहल थी अन्यथा आलोचकों ने व्यंग्य साहित्य को अपनी पीठ से उतार फेंका है और उसे अस्पृश्य मान लिया है. जबकि बख्शी सृजनपीठ के प्रथम अध्यक्ष प्रख्यात आलोचक प्रमोद वर्मा ने भिलाई में परसाई को समर्पित एक अखिल भारतीय व्यंग्य संगोष्ठी का सफल आयोजन रखा था.
अपनी व्यापक आलोचना दृष्टि में प्रमोद वर्मा ने डायरी में बख्शी जी के स्थानीयपन को उजागर करते हुए यह विचारने योग्य टिपण्णी की थी कि “स्थान और क्षेत्र से जुड़ी समस्याओं को रेखांकित करने ओर मांगों की पूर्ति के लिए संगठित होने और आंदोलन करने के लिए तो हम आज झट से तैयार हो जाते हैं लेकिन स्थानीयता और क्षेत्रीयता की अपनी विशिष्ट पहचान को कायम रखने की भला कितनी चिन्ता करते हैं? मध्यप्रदेश और उड़ीसा के सिवान पर स्थित बालपुर के लोचनप्रसाद और मुकुटधर पांडेय तथा खैरागढ़ के पुदमलाल पुन्नालाल बख्शी पूरी तरह अपने गांव घर के होने के कारण ही सम्पूर्ण हिन्दी भाषी क्षेत्र के हो सके थे। वे अपनी स्थानीयता और क्षेत्रीयता के प्रति बेहद सजग और क्षेत्रीय संस्कृति को लेकर बेहद गर्वित थे। अपनी क्षेत्रीयता और स्थानीयता को उन्होंने दुशाले की तरह नहीं वरन देह की तरह धारण करते हुए वे वस्तुतः सम्पूर्ण समाज और देश के थे। भाषा-भूषा और रहन-सहन इत्यादि से खांटी देसी बल्कि देहाती लगते थे लेकिन सोच का क्षितिज उनका निश्चित रुप से हमसे बड़ा था। एकदम सार्वदेशिक और सार्वकालिक.’
सृजनपीठ ने ‘प्रमोद वर्मा स्मृति व्याख्यान माला’ का आरंभ कर एक और पहल की है. इस श्रृंखला के पहले व्याख्यान का विषय था ‘निबंध की परम्परा और पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी’- इसके मुख्य वक्ता थे हमारे दौर के प्रखर आलोचक जयप्रकाश. अमूमन साहित्य प्रेमियों ने जयप्रकाश को मुक्तिबोध पर अधिक सुना और प्रेमचंद, रेणु पर सुना है. संभवतः पहली बार उन्हें बख्शी जी पर बोलते सुना व देखा गया. नामवरसिंह एक घंटे बोलते थे पर जयप्रकाश अब सवा घंटे या कभी ज्यादा भी बोल जाते हैं. उस दिन भी हिंदी निबंध संसार पर ‘भाषाई छल और वाग्जाल से परे हैं बख्शीजी’ विषय पर केन्द्रित उनका लम्बा धारधार वक्तव्य सुना गया.
जयप्रकाश न केवल एक गंभीर वक्ता, आलोचक हैं बल्कि निबंधकार भी हैं. उन्होंने अनेक विधाओं के लेखक बख्शी जी की श्रेष्ठतम प्रस्तुति उनकी निबंध विधा पर कई महत्वपूर्ण ध्यानाकर्षण करते हुए कहा कि “बख्शी जी की तरलता, सरलता ने उन्हें बौद्धिकता के बोझ से मुक्त रखा. ये विशेषताएं उनके लेखन में भी दिखती हैं. उनके लेखन में रम्यता और रंजकता का समावेश है. उनका साहित्य उन्मुक्त और आत्म-परक होने के साथ साथ भाषाई छल एवं वाग्जाल से परे है. हिंदी साहित्य में भारतेंदु युग के बाद बख्शी जैसे रचनाकारों ने लेखन में शाब्दिक बोझ से परहेज किया. द्विवेदी युगीन निबंधकारों में पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी का महत्वपूर्ण स्थान है. नई पीढ़ी में निबंध लेखन को लेकर कोई उत्साह या जागरूकता नहीं बल्कि शून्यता का वातावरण है. उन्होंने ललित निबंधों पर भी विस्तार पूर्वक जानकारी दी साथ ही निबंध परंपरा पर विभिन्न उदाहरणों के माध्यम से अपनी जानकारी की पुष्टि की.

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