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साहित्य : कवि और कला साधक – प्रदीप वर्मा
प्रदीप वर्मा समय के साक्षी हैं। उनका जन्म परतंत्र भारत में 03 जून 1945 में रायपुर जिले के सरफोंगा नामक ग्राम में हुआ। उन्होंने स्वतंत्र भारत के बढ़ते कदम को देखा। वे मैट्रिक, बी-टी-आई की शिक्षा प्राप्त करने के बाद भिलाई स्टील प्लांट में सेवा करते हुए एक योग्य अधिकारी के रूप में सेवानिवृत्त हुए हैं। सेवा में रहते हुए उन्होंने अनेक प्रकल्पों में संपूर्ण सामर्थ्य के साथ अपनी भूमिका निभाई। प्रदीप वर्मा के संबंध में हम यह कह सकते हैं कि सरल, सहज और उदात्त प्रकृति के व्यक्ति के भीतर अनेक संवेदनाएँ विद्यमान थीं, जिन्होंने उन्हें आगे चलकर एक कवि और कला साधक के रूप में पहचान दिलाई।
प्रदीप वर्मा के पिता स्वर्गीय चिंता राम वर्मा एक सम्पन्न कृषक के साथ-साथ कला के साधक भी थे। वे नाचा मंडली चलाया करते थे, साथ ही वाद्ययंत्र बजाने में निपुण थे। पिता के सानिध्य और संस्कारों ने प्रदीप को कला की बारीकियों को जानने और समझने का पर्याप्त अवसर दिया, जो कि वर्मा जी के जीवन में आगे चलकर सुदृढ आधार बनी। और यही कारण है कि प्रदीप जी के भीतर कला और साहित्य के प्रति आस्था और समर्पण का भाव देखा जा सकता है। वे आज भी कला और सहित्य के क्षेत्र में अपनी सक्रिय भूमिका अदा कर रहें हैं।
प्रदीप वर्मा छत्तीसगढ़ के एक सच्चे सपूत हैं। वे छत्तीसगढ़ी भाषा और संस्कृति के प्रति संवेदनशील हैं और छत्तीसगढ़ी भाषा, साहित्य और संस्कृति को समृद्ध करने के लिए अहेतुक कार्य करते रहे हैं और आज भी कर रहे हैं। वे छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण आंदोलन के सशक्त सिपाही रहे हैं। हम उन्हें विकसित छत्तीसगढ़ के स्वप्न द्रष्टा और स्वाभिमानी छत्तीसगढिया भी कह सकते हैं।
प्रदीप वर्मा को एक बहुआयामी व्यक्तित्व के रूप में देखा जा सकता है। वे केवल कवि, लेखक और कला के साधक ही नहीं एक समाजसेवी रूप में भी जाने जाते हैं। उन्होंने समाज के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की है। उनकी रचनात्मक भूमिका प्रेरणास्पद रही है। यही कारण है कि उन्हें अनेक सम्मानों से नवाजा गया है।
प्रदीप वर्मा जी में 78 वर्ष की आयु में एक युवा की तरह उत्साह का भाव देखा जा सकता है। हम यह कह सकते हैं कि उनके भीतर आज भी युवामन का प्रवाह है। वे वीणापाणि साहित्य समिति के अध्यक्ष हैं तो दुर्ग जिला हिंदी साहित्य समिति के कोषाध्यक्ष, जो कि उनकी सक्रिय भूमिका के प्रमाण हैं।
प्रदीप वर्मा ने कला और संस्कृति को स्थायित्व देने के उद्देश्य से ‘दौना पान’ नाम से 50 से अधिक कलाकारों को संगठित कर एक सांस्कृतिक दल का गठन किया। जिसका प्रमुख उद्देश्य जन चेतना पैदा करने के साथ-साथ छत्तीसगढियों के शोषण, अंधविश्वास, भ्रष्टाचार, मद्यपान जैसी अनेक सामाजिक कुरीतियों को उजागर कर एक सभ्य और जागरूक समाज का निर्माण करना था। इस हेतु उन्होंने छत्तीसगढ़ी लोक भाषा में रचित गीत और नाटकों का सहारा लिया।
उन्होंने सन् 1966 छत्तीसगढियों को जागृत करने के ‘छत्तीसगढ़ उत्कर्ष समिति’ का गठन किया। और छत्तीसगढ़ी बोलो, छत्तीसगढ़ी लिखो, छत्तीसगढ़ी पढ़ो का अभियान चलाया। प्रदीप वर्मा जी की कविताओं में राष्ट्रीयता के भाव इस तरह आते हैं-
हे मातृभूमि ! तेरी आन पर
मर मिटेंगे तेरी शान पर।
प्रवंचना शीर्षक की कविता में लिखते हैं-
बचपन की शाश्वत मान्यताएँ
परिधि के अंतराल में
विलुप्त हो, बिखर गईं।
यौवन की उद्दीप्त आकाँक्षाएँ
मूर्तिवान न हो सकीं।
प्रदीप वर्मा की कविताओं में कहीं-कहीं जीवन दर्शन के भाव भी आते हैं। वे कहते है
सृष्टि एक रंग मंच ही तो है
जिसमें प्रत्येक पात्र को निर्धारित
अभिनय पूर्ण करना है
जीवन दृष्टि पटल पर।
वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य को समक्ष रखकर वे कहते हैं-
अरे, कलयुगी अहिरावणों
रावण तो महापंडित था
उसमें गुणों की अपेक्षा
अवगुण कम ही थे
अहंकार ही उसे ले डूबा।
उनके एक छत्तीसगढ़ी रचना में बाल गीत का अस्वाद है-
करिया बादर आ जा रे
टूहू झन देखा जा रे।
यदि हम प्रदीप वर्मा जी का समग्र में मूल्यांकन करते हैं तो सहज, सरल, विनोदप्रिय, हंसमुख व्यक्ति के भीतर एक गहराई लिया व्यक्तित्व उभर कर आता है। हम उनके 78 वें जन्मदिन के अवसर पर उनके कृतित्व को नमन करते हुए उनके शतायु होने की कामना करते हैं।
•प्रस्तुति : बलदाऊ राम साहू
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