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दुर्ग : प्रभा सरस की कहानी संग्रह ‘ यात्रा से पहले ‘ का विमोचन : स्त्री – जीवन के त्रासद प्रसंगों के आख्यान है प्रभा सरस की कृति ‘ यात्रा से पहले…’

दुर्ग [छत्तीसगढ़ आसपास] : विगत दिनों प्रभा सरस की कृति यात्रा से पहले…‘ का विमोचन समारोह दुर्ग विधायक अरुण वोरा के मुख्यआथिथ्य में ‘ इंडियन मेडिकल एसोसियेशन भवन ‘ में आयोजित किया गया. मुख्य वक्ता जयप्रकाश साव, विनोद साव और विद्या गुप्ता थे. अध्यक्षता रवि श्रीवास्तव ने किया.

•स्व.प्रभा सरस
•कृतिकारा प्रभा सरस
यात्रा से पहले… विमोचन के पहले प्रभा सरस की बेटी राजुल गोमस्ता ने माँ को भावपूर्ण विनम्र श्रद्धांजलि देते हुए कही कि ‘ यात्रा से पहले ‘ नाम सार्थक हुआ क्योंकि माँ के जाने के बाद ही यह संग्रह प्रकाशित हुई है. कभी सोची नही थी कि मुझे माँ की पुस्तक के लिए कुछ लिखना होगा, समझ में नही आ रहा है, क्या लिखूँ, कैसे लिखूँ, शुरूआत कैसे करूँ. हमेशा माँ के लिखे को पढ़ा है, पर उन पर भी कभी मुझे लिखना पड़ेगा, यह कभी कल्पना नही की थी, ये कहते हुए राजुल रो पड़ी…
अरुण वोरा ने प्रभा सरस के साहित्यिक अवदानों का स्मरण किया और उनके पारिवारिक संबंधों को जिक्र करते हुए उन्हें एक सफल लेखिका बताया.

•’ यात्रा से पहले ‘ का विमोचन करते हुए अतिथि

•उद्बोधन देते हुए अरुण वोरा
विनोद साव ने कहा –
‘ यात्रा से पहले ‘ संग्रह में स्त्री की रचनात्मकता को बांध दिया गया है. वस्तुत: ये मन के अंदर झरती कविता ही है जो कहानी बनकर पाठक के हाथों में यात्रा से पहले नाम से पहुंची है. ‘ मेरा गाँधी मन लौटा दो ‘ नया प्रयोग है.
विद्या गुप्ता ने कहा –
प्रभा सरस की कहानियों में स्त्री मन की पीड़ा का, संघर्षों के दोहराव का सफल चित्रण देखा गया है. संकलित कहानियों में ‘ डेथ! आईसीयू ‘, ‘ मेरा गाँधी मन लौटा दो ‘ अच्छी कहानी है. स्त्री यदि दोबारा लौटती है तो माँ बनकर लौटे, पत्नी बनकर नहीं ताकि पत्नी की गरिमा कुंठित, अवहेलित न हो पाए.

•मुख्य वक्ता प्रो. जयप्रकाश
मुख्यवक्ता एवं आलोचक प्रो. जयप्रकाश साव ने कहा –
प्रभा सरस की इस कहानी संग्रह ‘ यात्रा से पहले ‘ में अनुभवों की एकाग्रता बनी हुई है जो पाठक को उद्वेलित करती है. पिछले 30 वर्षों में कहानी के शिल्प विधान में बहुत परिवर्तन आया है किंतु प्रभा जी की कहानियां समीक्षक की दृष्टि से इस कसौटी पर खरी नहीं उतरती. बुनियादी पर पर ये कहानियां मार्मिक हैं किंतु अनूठा अनुभव नहीं है.
प्रो जयप्रकाश ने संग्रह ‘ यात्रा से पहले ‘ में अपनी बात में लिखा – प्रभा सरस की कहानियों से गुजरते हुए इस वास्तविकता को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है. उनकी कहानियों में स्त्री के संघर्ष और उसकी निरुपायता के अनेक साक्षय हैं. इन कहानियों को पढ़ते हुए अचरज हो सकता है कि लेखिका स्त्रियों के जीवन और उनके मनोविज्ञान के सूक्षमतर पहलूओं को कितनी कुशलता और बारीकी से बुना है और भारतीय समाज में स्त्री के मन को उन्होंने कितनी गहराई से पढ़ा – गुना है.
रवि श्रीवास्तव ने कहा –
प्रभा सरस की कहानियां पितृ सत्तात्मक परिवारों में जीती सामान्य स्त्रियों के मन की व्यथा – कथा है, कह सकते हैं घर घर की कहानी है. सहज, सरल, बोधगम्य भाषा है जो हिंदी के पाठकों के बीच अपना स्थान बना लेंगी.
संचालन अजय साहू और आभार व्यक्त प्रभा सरस के पुत्र श्यामल सरस ने किया.

•उपस्थित अतिथियों के साथ प्रभा सरस के परिवारजन और अन्य सुधिजन
मौके पर उपस्थित हुए –
सरला शर्मा, प्रदीप वर्मा, डॉ. संजय दानी, राजीव अग्रवाल, पत्रकार प्रशांत कानस्कर, ‘ छत्तीसगढ़ आसपास ‘ के संपादक प्रदीप भट्टाचार्य और प्रभा सरस के परिवारजन राजुल गोमास्ता बेटी, आलोक गोमास्ता दामाद, महिमा उज्ज्वल सरस बेटा – बहू, श्यामल सरस छोटा बेटा सहित पोते – पोती, नाती – नातिन इशा, व्याख्या, विख्यात, वात्सल्य, मंजुल, उन्नति, शिवि.
•प्रभा सरस की बेटी राजुल गोमास्ता सरस ने ‘ छत्तीसगढ़ आसपास ‘ के संपादक प्रदीप भट्टाचार्य को ‘ यात्रा से पहले ‘ कहानी संग्रह की एक प्रति भेंट में दी.
[ •रिपोर्ट सरला शर्मा के साथ प्रदीप भट्टाचार्य ]
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