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छत्तीसगढ़ : रंगकर्म के पुरोधा हबीब तनवीर की जन्मशती पर दो दिवसीय समारोह ‘ रंग हबीब ‘ का समापन
रायपुर [छत्तीसगढ़ आसपास न्यूज़] : कला अकादमी छत्तीसगढ़ संस्कृति परिषद रायपुर द्वारा रजा फाउंडेशन के सहयोग से विख्यात नाटककार और रंग निर्देशक हबीब तनवीर की जन्मशती पर दो दिवसीय शताब्दी समारोह ”रंग हबीब” का समापन शनिवार को राजधानी रायपुर के सिविल लाइन न्यू सर्किट हाउस स्थित कन्वेंशन हॉल में हुआ।
इस दौरान विभिन्न सत्रों में रंगमंच के पुरोधा हबीब तनवीर को याद करते हुए वक्ताओं ने मौजूदा दौर में उनकी प्रासंगिकता पर बात की। समापन दिवस पर ”भारत की खोज वाया हबीब”, ”हबीब की कला” और ”हबीब का जीवन दर्शन” विषय पर हुए अलग-अलग सत्रों में वक्ताओं ने हबीब तनवीर के साथ जुड़े अपने संस्मरण भी बताए।
शुरूआत में स्वागत उद्बोधन देते हुए छत्तीसगढ़ संस्कृति परिषद संस्कृति विभाग छत्तीसगढ़ शासन कला अकादमी के अध्यक्ष योगेंद्र त्रिपाठी ने दो दिवसीय आयोजन की सार्थकता पर बात की। वरिष्ठ पत्रकार ओम थानवी ने हबीब तनवीर के लेखन पक्ष पर अपनी बात रखते हुए कहा कि एक लेखक होने की संभावनाएं उनमें बहुत थी। छोटे-छोटे वाक्यों में बड़े प्रवाह के साथ लिखते थे। उनकी पूरी आत्मकथा में लोक की प्रतिष्ठा है। उनमें समाजवादी सोच किस तरह से विकसित हो रही थी यह उनकी आत्मकथा में देख सकते हैं।
वरिष्ठ साहित्यकार अशोक बाजपेयी ने कहा कि यह बहुत जरूरी है कि ऐसे समय में हबीब तनवीर को याद किया जा रहा है, जहां सच को अपनी मुट्ठी में लिये हुए बहुत से लोग हैं। अगले साल लालकिले में क्या होगा इसका सच भी लोग अभी से बता रहे हों ऐसे समय में यह याद रखना जरूरी है कि कलाएं पहले से तय सच का प्रतिरोध करती है। वो अपने को ऐसे सच से अलग रखती है।

हबीब तनवीर पर किताब लिख रहे आशीष पाठक ने कहा कि हबीब हजार तरह के काम करते हुए आगे बढ़ते रहे। हबीब जानते थे कि सफलता तुलनात्मक है और सार्थकता मुक्ति। मुक्ति के लिए सच बोलेने की भारतीयता उनमें थी।
वरिष्ठ समीक्षक उदयन बाजपेयी ने कहा कि हबीब तनवीर ने जो जीवन रायपुर में जिया और जो जीवन आगे जाकर होने वाला था उसमें काफी फर्क रहा। इसलिए हबीब क्या करना चाहते थे, क्यों करना चाहते थे और किस तरह करना चाहते थे इसकी खबर हबीब तनवीर को होते-होते हुई।
सुबह के सत्र में शुरुआत करते हुए राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय के पूर्व निदेशक देवेंद्र राज अंकुर ने कहा कि मुझे हबीब तनवीर का रंगकर्म बेहद निकट से देखने का मौका मिला। अंकुर ने कहा कि ”आगरा बाजार” के करीब 20 प्रदर्शनों में उन्हें अभिनय करते हुए हबीब तनवीर का रंगकर्म बेहद करीब से देखने-समझने का मौका मिला।
लेखक महावीर अग्रवाल ने कहा कि सितंबर 1964 में पहली बार दुर्गा कॉलेज में बतौर स्टूडेंट उन्होंने हबीब तनवीर को करीब से देखा। तब उन्होंने अंग्रेजी में अपनी बात रखी थी और उस दिन जो हबीब ने कहा था उनकी आवाज की रवानगी आज भी महसूस कर सकता हूं।
रंग विदूषक भोपाल से जुड़ी रंगकर्मी व संगीतज्ञ अंजना पुरी ने कहा कि आम छत्तीसगढी की वेशभूषा, गायन, आंतरिक सहजता और सादगी जो यहां की आम जिंदगी का हिस्सा है, वह हबीब तनवीर के नाटकों का आधार है। उनके नाटकों की विषयवस्तु से लेकर भाषा तक यहां की आम जिंदगी का हिस्सा है। उन्होंने कहा कि हबीब मानते थे कि रोजमर्रा की जिंदगी में हर इंसान एक अभिनेता है। हर जगह वो रंगमंच है, जहां जिंदगी का नाटक खेला जाता है। उन्होंने एक ऐसी शैली की इजाद की, जो सहज थी। उन्होंने अपने रंगमंच को परंपराओं का आधार दिया।

वरिष्ठ पत्रकार और रंगकर्मी परवेज अख्तर ने कहा कि हबीब तनवीर का थियेटर जनसामान्य की आशाओं व आकांक्षाओं की अभिव्यक्ति था। चेन्नई से पहुंचे समीक्षक सदानंद मेनन ने कहा कि हबीब को एक देश के नक्शे पर सीमित नहीं किया जा सकता, वह विश्व भर के हैं और उनकी समझ वैश्विक थी। मेनन ने कहा कि हबीब ने विश्व रंगमंच पर छत्तीसगढ़ी बोली को उतारकर यह सिद्ध किया कि संभ्रांत लोग जो मानते हैं, बस उतना नहीं है बल्कि बहुत कुछ लोक में है। रंगकर्म से जुड़े भारत रत्न भार्गव ने कहा कि रंगकर्म हबीब के लिए जीवन था और नित नए प्रयोग करना उनकी आदत थी। वह बने बनाए ढर्रे पर चलने वालों में से नहीं थे। प्रोफेसर अमितेश कुमार ने कहा कि हबीब के नाटकों में भारतीय लोकरंग के दर्शन होते हैं। रजा फाउंडेशन के अध्यक्ष और वरिष्ठ साहित्यकार अशोक वाजपेयी के आभार प्रदर्शन के साथ दो दिवसीय आयोजन का समापन हुआ।

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