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विशेष [ 6 अक्तूबर पुण्य स्मृति पर ] : कला संस्कृति के विविध आयाम और डॉ. बलदेव का साहित्य – श्रीमती वंदना जायसवाल
भारत का सांस्कृतिक इतिहास अत्यंत प्राचीन है । कला का आविर्भाव तब से ही मानना चाहिए जब से मानव संस्कृति का उद्भव हुआ है । प्राचीन काल में मानव दीवारों पत्थरों पर विविध चिन्ह कलाकृति उकेरा करता था । प्रागैतिहासिक काल के ये चित्र आज भी भग्न रूप में दृष्टव्य हैं । प्रकृति में ही प्रलय और सृजन निमित्त प्रेरक शक्ति विद्यमान होती हैं । मानव निर्मित ये कलात्मक प्रतीकात्मक अंकन संस्कृति जीवन की नींव के ईंट के समकक्ष है । भारतीय संस्कृति ‘ कला और ज्ञान का संगम है । काव्य मानव हृदय के भावों को उत्सर्जित करने का सशक्त माध्यम है । काव्य की श्रेष्टता चित्त के विश्रान्ति में निहित है । समय के साथ इन चौंसठ कलाओं का स्वरूप निखरता गया और इसी के समानांतर हमारी संस्कृति भी उन्नत होती गई है । साहित्य एक ऐसा माध्यम है , जो संस्कृति को जीवट बनाती है । हमारे देश में कई ऐसे प्रतिभा सम्पन्न कलाकार , साहित्यकार हुए हैं , जो अपनी लेखनी के माध्यम से संस्कृति की नींव को मजबूत बनाने में सक्षम हुए । हिन्दी और छत्तीसगढ़ी में बेबाक अंदाज से लिखने वाले डॉ . बलदेव उन साहित्यकारों के अंतर्गत आते हैं , जो जीवन पर्यन्त लोक कला और संस्कृति के पुजारी रहे । छत्तीसगढ़ के न्यायधानी बिलासपुर के दक्षिण में लगभग 35 किलोमीटर दूर ऐतिहासिक ग्राम नरियरा , अकलतरा , जिला जांजगीर – चांपा में 27 मई को वट सावित्री व्रत के दिन साहित्यकार डॉ . बलदेव का आविर्भाव श्री हरालाल और बिसाहिन साव के पावन गृह में होना बताया जाता है । ग्राम नरियरा धार्मिक और सांस्कृतिक वैभव से परिपूर्ण है । यहाँ मानस प्रेमी डॉ . बलदेव के मन में प्रारंभ से ही साहित्य के बीज पड़ चुके थे कृषक पुत्र डॉ . बलदेव सन् 1958 में माध्यमिक शाला के तनौद में अध्यापक हो गए । विकासखण्ड शिक्षा अधिकारी के पद को भी आपने सुशोभित किया । आगे चलकर स्वाध्याय से पी – एच.डी . तक की पढ़ाई निर्बाध रूप से की , जिसमें सहधर्मिणी सत्या साव जी विशेष रूप से सहयोगी रहीं । सन् 1970 से 1980 में हिन्दी काव्य में आख्यानक प्रगीतों के अनुशीलन विषय पर शोध कार्य के दौरान प्रतिष्ठित तात्कालीन साहित्यकारों से उनकी भेंट हुई , जैसे नागार्जुन , अज्ञेय , रामविलास शर्मा आदि हिन्दी , छत्तीसगढ़ी , संस्कृत के अतिरिक्त असमिया में विशेष दक्षता उन्होंने हासिल की थी । फरवरी सन् 1991 में नया तूफान बिलासपुर में उनकी पहली कविता छपी – मन का विहंगम …. और सिलसिला चलता ही गया देश – प्रदेश के अखबारों में यदा – कदा हिन्दी और छत्तीसगढ़ी के लेख और कवितायें लगातार छपने लगे थे । सांस्कृतिक नगरी रायगढ़ में पद्म श्री पं . मुकुटधर पाण्डेय का सानिध्य इनको प्राप्त हुआ पं . मुकुटधर पाण्डेय के द्विवेदी युगीन एवं छायावादी कविताओं , निबंधों के दुर्लभ संग्रह , जो यत्र – तत्र पूरे भारत में बिखरे पड़े थे , उन्हें अपने भगीरथ प्रयास से डॉ . बलदेव ने संपादित कराया । वे पाण्डेय जी के मानस पुत्र के समान थे । ऐतिहासिक धराहरों और सांस्कृति उपलब्धियों पर केन्द्रित उनकी किताब ‘ रायगढ़ का सांस्कृति वैभव वर्ष 2008 में प्रकाशित हुआ । रायगढ़ में कत्थक , रायगढ़ में संगीत की परम्परा और रायगढ़ दरबार पुस्तकों में डॉ . बलदेव के आलेख छपे । नवीन कलेवर लिया हुआ चक्रधर समारोह उनके श्रम से रंजित है । सन् 1936 में अखिल भारतीय संगीत सम्मेलन इलाहाबाद के अध्यक्षीय भाषण में राजा चक्रधर सिंह के द्वारा जो बातें रखी गई , उन ऐतिहासिक महत्व दुर्लभ सामग्री को इस किताब में प्रथम बार समाहित किया गया है । राजा चक्रधर का कत्थक विश्व रंगमंच पर अग्रिम पंक्ति में सम्मिलित है । डॉ . बलदेव ने रायगढ़ के शैलचित्र , जो कि पाषाण काल के और विश्व प्रसिद्ध हैं , पर प्रकाश डाला है । रायगढ़ रियासत के इतिहास ,साहित्य परिदृश्य , राजा चक्रधर सिंह के अवदानों पर डॉ . बलदेव ने विस्तृत वर्णन करके छत्तीसगढ़ की संस्कृति को पुष्ट किया है । राजा चक्रघर सिंह के दुर्लभ पाँच अनूठे संगीत ग्रंथ- नर्तन सर्वस्व , तालतोयनिधि , रागरत्नमंजूषा आदि का प्रणयन उन्होंने किया । सन् 1978 से 2008 तक के डॉ . बलदेव के शोधपरक आलेख इसमें समाहित है , जो कि छत्तीसगढ़ की कला संस्कृति के धारन खंभा को सुदृढ़ करती है । विगत् विकट कोरोनाकाल के दौर में भी 37 वाँ चक्रधर समारोह दिनांक 10 से 19 सितम्बर 2021 तक डिजिटल मंच पर आयोजित करके हिताकांक्षियों ने इसके क्रम को टूटने नहीं दिया । यह हम सबके लिए गौरव का विषय है । • ललितकला की उर्वर भूमि रायगढ़ की संस्कृति का महिमागान करती हुई उनकी रचनायें बेमिसाल है । डॉ . नगेन्द्र मानते हैं कि ” घराना संगीत का अस्तित्व 19 वीं शती की औपनिवेशिक सत्ता के पहले ही था , किन्तु इसका प्रसार औपनिवेशिक युग में ही हुआ । प्रत्येक घराना स्वर – लय का मिश्रण अपने ढंग से करता था । उसके अपने श्रोता थे । हर घराना अपने क्षेत्र तक सीमित था उस पर स्थानियता का रंग था ।
. रायगढ़ कत्थक घराना का अस्तित्व भारत के अन्य घरानों से अपेक्षाकृत नवीनतम है । बैरागढ़िया राजकुमार मदनसिंह ( सन् 1650 ) से डॉ . बलदेव ने इस घराने की नींव मानी है । यहाँ की कलाकृतियाँ अमूल्य विरासत , सामाजिक समन्वय और सांस्कृतिक उत्कृष्टता सर्वोत्तम है । डॉ . बलदेव का औद्योगिक नगर रायगढ़ के कला संस्कृति , साहित्य , नृत्य संगीत , चित्रकला , रंगचेतना , गणेशोत्सव कत्थक के महान विभूतियों , चक्रघर समारोह और इतिहास पर केन्द्रित यह अध्यावसाय रायगढ़ का सांस्कृतिक वैभव अद्वितीय अनुपम है । छत्तीसगढ़ी की सबके बड़ी जनजाति गोड़ों के उद्भव , इतिहास और विकास पर डॉ . बलदेव ने लेख लिखे हैं । उनकी कविताओं में भी आदिवासी जनजीवन और उनकी कला संस्कृति का उल्लेख है जंगलों में निवासरत् कम पढ़ी – लिखी होकर भी उनकी बेटियाँ अपने अस्मत के प्रति सचेत रहती हैं ।
यदि कहीं दोगे धोखा
चूड़ियाँ तोड़कर मर्दाना कलाईयाँ
इसकी बेधड़क गंडासा गर्दन पर ले जायेगी ,
जरा चूको हजारों फीट गहरी दलदली खाइयों में
बेहिचक धकेल देंगी
छत्तीसगढ़ में विविध प्रकार की लगभग 42 जनजातियों निवासरत हैं । इनकी विविध संस्कृति मन मोह लेती हैं । इनके लोकनृत्य त्यौहार , पारम्परिक वेशभूषा इत्यादि प्रकृति से संबद्ध होते हैं । ये सूर्य , चन्द्रमा , नदी , वृक्षों को देवतुल्य महत्व देते हैं । इसी प्रकार डॉ . बलदेव की किताब ‘ तपश्चर्या एवं आत्मचिंतन गुरुघासीदास ‘ छत्तीसगढ़ में सतनाम पंथ के इतिहास को दर्शाता है । वे सतनामी समाज के सादा जीवन उच्च विचार , खान – पान , संस्कृति , गुरु द्वारा प्रदत्त आदर्श वाक्य आदि का विस्तृत वर्णन कर शोधपरक कृति हमें प्रदान कर गये हैं । डॉ . बलदेव लिखते हैं व्यक्ति जन्मजात शूद्र ही होता है । संस्कारिक होकर वह ब्राह्मण बनता है , अस्तु जन्मना कोई छोटा बड़ा नहीं होता , वह कर्म से बड़ा होता है । यह भी विधान है कि कर्म के द्वारा वर्ण बदला जा सकता है । ” डॉ . बलदेव सतनाम पंथ को एक विचारधारा की संज्ञा देते हैं , जो कि उपनिषद् के एकेश्वरवाद और भगवान बुद्ध की करूणा से प्रेरित है । प्राणीमात्र के प्रति करूणा और प्रेम ही इसका मूत्र मंत्र है । ये स्वतंत्रता और स्वावलम्बन की शिक्षा देते हैं । कबीर के समान इन्होंने भी गुरू को सर्वोपरि स्थान दिया है । डॉ . बलदेव ठेठ गंवईया कृषकपूत थे । छत्तीसगढ़ के पारम्परिक त्यौहारों के धूम से पगी कविताओं से मनमयूरी झूम उठता है । हरेली , पोरा , छेरछेरा जैसे स्थानीय त्यौहारों , पकवानों , रिवाजों की सुगंध जहाँ विद्यमान है , वहीं उनकी कवितायें होली के रंग से रंगीन हो चली हैं । करमा , जवारा ददरिया , साल्हो आदि नृत्यों के झाँझ – मंजीरे की थाप उनके गीतों में गूंजते हैं । गौनाही बेटी और माँ – बाप से उसकी बिदाई की पीड़ा से तप्त है उनकी कवितायें केलो की लहरें जहाँ बाहों में लेने का उतावली होती हैं , वहीं अपनी गर्विली रूठी प्रेमिका को मनाकर मायके से लाने के प्रयास में उनका प्रेमी व्यस्त दिखाई देता है ।
मोंगरा मम्हावे पुन्नी के चंदा
अउ मउहारी जाड़
अधिरतिया नींद उचट गैं ,
जिनगी लगे उजाड़
कोयली कुहके पिछवाड़ा म
मोर मोंगरा घर आ .
गरबैतिन घर आ
ग्राम्य परिदृश्यों को अंकित करते हुए व्यावहारिक ग्राम्य शब्दों से उन्हें कतई गुरेज नहीं है । यह डॉ . बलदेव की रचनाओं को यथार्थ स्वरूप देते हैं । हिन्दी और छत्तीसगढ़ी साहित्य में जाज्वल्यमान् सितारे के रूप में डॉ . बलदेव का योगदान सदैव स्मरणीय रहेगा उनके कालकल्वित होने के पश्चात् उनकी अप्रकाशित कृतियाँ सम्पादन की प्रतिक्षा में राह ताक रही हैं।
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संदर्भ ग्रंथ –
01. हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास , डॉ . बच्चन सिंह , राधाकृष्ण प्रकाशन , चौदहवाँ संस्करण 2021 , पृष्ठ- 284 , 285
02. वृक्ष में तब्दील हो गई औरत , डॉ . बलदेव , शैवाल प्रकाशन गोरखपुर 2006 , पृष्ठ 76
03. ‘ तपश्चर्या एवं आत्मचिंतन गुरुघासीदास ‘ , डॉ . बलदेव मानस जयप्रकाश टण्डन रामशरण , राधाकृष्ण प्रकाशन नई दिल्ली , पृष्ठ- 49
04. धरती सबके महतारी , डॉ . बलदेव , लोकाक्षर प्रकाशन बिलासपुर , वर्ष 2002 , पृष्ठ- 15
[ लेखिका श्रीमती वंदना जायसवाल डॉ. सी. वी. रमण विश्वविद्यालय कोटा बिलासपुर छत्तीसगढ़ में पीएचडी हिंदी की शोधार्थी हैं ]
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chhattisgarhaaspaas
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