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लघुकथा :- दीप्ति श्रीवास्तव [ भिलाई छत्तीसगढ़ ]
चुनावी सूरज
शहर अटा पड़ा है पोस्टरों से जनमानस में बातचीत का केवल और केवल वार्तालाप का एक ही विषय है । जोर-जोर से लाउडस्पीकर पर प्रचार हो रहा था फलांने फलांने को अपना स्नेह दीजिए । हमारे साथी ने कमेंट किया स्नेह देंगे तो क्या ? अरे भैया तनिक आगे तो सुनो हम सभी के प्रिय प्रत्याशी को अपना अमूल्य वोट देकर विजयश्री दिलवाये । अब बताइए हम उनको न जानते न पहचानते फिर हमारा प्रिय कैसे हो गया । हमने तो अभी अभी उनका नाम सुना है बल्कि उनके कारण जो पूर्व से अपनी उम्मीदवारी की आस लगाए बैठे थे जनता को चूना लगाते हुए फिर रहे थे मिलने पर पूछते थे ,और भैया सब बढ़िया है ना ; हम भी चरण स्पर्श कर हां भैया बढ़िया है और कुछ काम होता किसी बंदे का तो उनसे कहते ।आप ही बतायें कि नया प्रत्याशी हमारा प्रिय कैसे होगा ।जमी जमाई बिसात को उलट दिया तब उम्मीदों पर घड़ों पानी पड़ गया कि नहीं । कितनी उम्मीदों की आस से जी जुड़ा गया था ।
अरे भैया यह सब सोचने का नहीं चुनाव और मतदाता के रिश्ते की डोर गणतंत्र देश में मजबूत लोकतंत्र दर्शाता है वर्ना आप पड़ोसी देशों की हालत तो देख रहे हैं । हमारी मतदान के प्रति निष्ठा ही हमारी अमूल्य निधि है इसे सहेजकर रखना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है फिर भैया भाग्य विधाता के खेल को हम आप आम आदमी कैसे समझ सकते हैं । अभी हम जैसे आम आदमी के पास एक भयंकर हथियार है “वोट” इस हथियार की ताकत का जनता जनार्दन को अहसास कर बताना है यह समय मतदाता का है । हम तो भैया मतदाता बन कर अपने आप को भाग्यशाली समझते हैं अपने इस हथियार यानि वोट का प्रयोग सोच समझ कर पूरे होशोहवास में जागरूक मतदाता बन करें।
मोह-माया के जाल से निकलो भैया जिसके पास लाठी उसकी ही भैंस समझे कि नहीं इतने समझदार तो हो ही बात का मतलब ना समझो ।
बहुत काम किये तुमने उनके लिए अब नया ठौर तलाशना है शतरंज की नई बिसात में मोहरे मनुज है अभी हमको चाल चलकर खेल खेलना है । माना आम मनुज इस खेल में कच्चा है पारंगत नहीं है इसलिए तो जीवन के सीधे सरल रास्ते पसंद करता है । निपूर्ण तो मुट्ठी भर मनुज होते हैं । यह धूत खेल ही ऐसा है इसी से महाभारत हो गई जो अंनत बरसों के लिए मिसाल बन गई जो इसकी चपेट में आया उसका मंगल अमंगल सब धूत पर बिछी बिसात के हवाले होता है । शह-मात का खेल होता है खेल के खिलाड़ियों की बैचैनी काबिले-तारीफ होती है आखिर तक ताल ठोंक कर स्वयं की विजय पताका फहराने का दावा करते थकते नहीं । काउंटिग के समय पता चलता है हमें अपने खेल पर ही ध्यान देना था ध्यान भटकाने बहुतेरे है ना चहुंओर । ध्यान बिचकने से मोहरा गलत घर चल जाता है । यह कोई शब्द तो नहीं मोबाइल पर की न पसंद हो तो डिलीट करो और नया मनमर्जी का टाइप कर लो । भैया तुम तो अभी सिंहासन पर बैठे मतदाता हो । तुम को लुभाने मक्खियों की तरह लोग चिपकेंगे, तुम गुड़ हो लोग तुम्हारे चारों ओर झूमेंगे । शक्कर को जैसे हड्डी के चूरे से सफेद बनाया जाता है वैसे ही सफेद पारदर्शी पर्दे को पहचानना मतदाता तुम्हारा काम है। चुनावी सूरज मतदाता को रंगीन सुनहरे सपने की दुनिया में सैर करता है ।
अभी दौर ही यही है । गुलाबी वादों की डोर मतदाता के अंतर्मन को छू कर दिल का हाल जानने की कोशिश कर रही है।
•संपर्क-
•94062 41497
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chhattisgarhaaspaas
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