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लघुकथा : डॉ. दीक्षा चौबे [ दुर्ग छत्तीसगढ़ ]
मिट्टी की खुशबू
काम माँगने आये उस लड़के को देखकर संदीप को अपना गाँव , अपना बचपन और उनसे जुड़ी हर वो बात याद आ गई थी जो जीवन की आपाधापी में वे भुला बैठे थे । साधारण से कपड़े और चेहरे में मासूमियत , वह बातचीत में भी सीधा सा लगा था …संदीप ने तुरंत उसे काम पर रख लिया था । वह भी तो एक दिन ऐसे ही चला आया था गाँव से.. काम तलाशने । एक अदद डिग्री , निश्छल मन और परिश्रम करने की जिजीविषा बस यही साथ लेकर निकला था घर से । किसी ने उसके भीतर अपने आप को ढूँढा था और उसे मौका दिया । अब उसकी बारी है …शायद माली दिन भर के सूखे पौधों में पानी दे रहा था… मिट्टी की सोंधी महक उसके तन – मन को सुवासित कर गई थी।
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अनपढ़
अस्पताल के बिस्तर पर लेटे हुए राज के आँसू अनवरत बह रहे थे… उच्च अधिकारी होने का दंभ उन आँसुओं में तिरोहित हो गया था । आज रेणु ने अपनी एक किडनी देकर उसकी जान बचा ली थी जिसे अनपढ़ समझकर उसने जिंदगी भर उपेक्षित किया था । माता – पिता के दबाव के कारण उसने रेणु से शादी तो की थी लेकिन कभी दिल से उसे अपनाया नहीं
। रेणु बिना किसी शिकायत के अपने दायित्व निभाती रही , आज उसने साबित कर दिया था निःस्वार्थ प्रेम और त्याग किसी डिग्री का मोहताज नहीं होता , साथ ही अपने पति के हृदय में वो स्थान बना चुकी थी जिसकी वह हकदार थी।
•संपर्क –
•94241 32359
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chhattisgarhaaspaas
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