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रामलला की प्राण प्रतिष्ठा पर विशेष : शरद कोकास
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तुलसी की कविता
[ अगर तुलसी की कविता में राम ना होते तो राम का यह स्वरूप जनमानस में व्याप्त नहीं होता । तुलसी पर अनेक आक्षेप लगाए गए, ब्राह्मणवाद का आरोप लगाया गया लेकिन व्यावहारिक सत्य यह है कि उनकी रचना लोक में स्थापित हुई । तुलसी का बचपन का नाम राम बोला था और उनके गुरु बाबा नरहरि थे । मैंने वर्षों पूर्व तुलसी पर कुछ कविताएं लिखने का प्रयास किया था आज इन्हें प्रस्तुत कर रहा हूं- शरद कोकास ]
।। रामनिवास ।।
बाबा नरहरि बोले
अयोध्या में टूट रहा है
रामजी का पुराना महल
बन रहा उसकी जगह नया महल
भोला रामबोला बोला
तो आजकल रामजी कहाँ रहते हैं ?
बालक का प्रश्न सुन बाबा कहते हैं
जिसके हृदय में भक्ति की आस है
समझो वहीं रामजी का निवास है ।
||रामहठ ||
इससे पहले कि युवा तुलसी
रत्नावली की आँखों में डूब जाते
उन्होंने राम को पलकों में बसा लिया
इससे पहले कि वे
रत्नावली के केशपाश में बंध जाते
भक्ति में उन्होंने खुद को जकड़ लिया
दुर्बलता का वह क्षण अचानक रीत गया
कामहठ हार गया रामहठ जीत गया ।
|| राममत ||
तुलसी से कहने लगे
वैदेही वल्लभ चरण कमल रज धूलिदास
किस मत के हो तुम
हो किस सम्प्रदाय के
किसका खाते हो
किसका गाते हो
रहते हो किसके पास
बाबा तुलसी बोले
राम मत का हूँ
हूँ राम सम्प्रदाय का
राम का खाता हूँ
राम का गाता हूँ
रहता हूँ रामजी के पास ।
|| राम मय ||
तुलसी ने लिखी राम पर कविता
तुलसी राम मय हो गए
कवियों ने लिखी तुलसी पर कविता
कवि भी तुलसी मय हो गए
कवियों के लिये
फिलहाल यह जानना ज़रुरी है
कि तुलसी
राम पर कविता लिखने से पहले ही
राममय थे ।
|| राम विचार ||
कवि के लिये
आसान नहीं होता
कविता लिखना
कवि और कविता के बीच
हजार रोड़े होते हैं
जिनसे जूझते हुए
अक्सर कवि टूट जाता है
भाषा रह जाती है
शिल्प रह जाता है
विचार छूट जाता है
तुलसी के लिये कविता
भक्ति थी , पूजा थी
परम्परा और सदाचार था
राम ही भाषा थी
राम ही शिल्प था
राम ही विचार था ।

▪️ शरद कोकास
[ प्रगतिशील चर्चित कवि, दुर्ग, छत्तीसगढ़ ]
▪️ संपर्क-88716 65060
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chhattisgarhaaspaas
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