- Home
- Chhattisgarh
- विशेष : लोककला के लिए समर्पित कलाकार- पूनम तिवारी विराट
विशेष : लोककला के लिए समर्पित कलाकार- पूनम तिवारी विराट

साहित्य,कला, संस्कृति में राजनांदगांव की एक विशिष्ट पहचान है। जहां यह शहर साहित्य मनीषी डॉ पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी, गजानन माधव मुक्तिबोध,डा. बल्देव प्रसाद मिश्र, विनोद शुक्ल,कुंज बिहारी चौबे, शरद कोठारी, डा. नंदू लाल चोटिया , रमेश याज्ञिक, डा. गणेश खरे, मेघनाथ कन्नौजे, कनक तिवारी, प्रो. जय प्रकाश साव,आचार्य सरोज द्विवेदी, गणेश शंकर शर्मा, नूतन प्रसाद शर्मा, डा. दादू लाल जोशी, कुबेर सिंह साहू जैसे साहित्यकारों की जन्मभूमि/ कर्मभूमि रही है। वहीं इस शहर और जिले से दाऊ दुलार सिंह साव मंदराजी, स्वर्ण कुमार साहू,मदन निषाद , पद्मश्री गोविंद राम निर्मलकर, खुमान साव, फिदाबाई मरकाम,माला बाई मरकाम, नत्थू दादा, केशरी प्रसाद बाजपेयी बरसाती भैया, भैया लाल हेड़ाऊ,दीपक तिवारी विराट , पूनम तिवारी विराट, उदे राम श्रीवास,गिरिजा सिन्हा, देवी लाल नाग,कविता वासनिक, केशव सूर्यवानी, पंच राम देव दास,हर्ष कुमार बिंदु,लता खापर्डे, आत्मा राम कोशा अमात्य, शैल किरण, गोविंद साव,महादेव हिरवानी, विक्रम यादव,कांति कार्तिक यादव जैसे लोक कलाकार हुए हैं जिन्होंने इस माटी की महक को न सिर्फ छत्तीसगढ़ अपितु राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर महकाया है। स्वतंत्रता संग्राम में अमूल्य योगदान इस शहर और जिले ने दिए हैं वहीं यहां के राजाओं की दानशीलता भी बहुत प्रसिद्ध रही है।
संस्कारधानी राजनांदगांव की लोक कलाकार , लोक कलामंच” रंग छत्तीसा” की संचालिका और छत्तीसगढ़ की बेटी पूनम तिवारी विराट को राष्ट्रपति श्रीमती द्रोपदी मूर्मू ने लोक कला के क्षेत्र में उनके अप्रतिम योगदान हेतु भारत सरकार के संस्कृति विभाग द्वारा प्रदान किये जाने वाले”संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार ” से सम्मानित की है।यह लोक कला में साधनारत एक लोक कलाकार का सम्मान है।उन्हें 2015 में छत्तीसगढ़ शासन द्वारा दाऊ दुलार सिंह साव मंदराजी सम्मान और 2014 में इप्टा रायपुर द्वारा पांचवां स्व. कुमुदद देवरस सम्मान, इप्टा रायगढ़ द्वारा शरदचंद्र वैरागर स्मृति रंगकर्मी सम्मान प्रदान किया जा चुका है।और हम साकेत साहित्य परिषद सुरगी राजनांदगांव वाले भी सौभाग्यशाली है कि संस्था के नवम् स्थापना वर्ष 2008 में उनकी सतत कला साधना हेतु साकेत सम्मान -2008 से सम्मानित किए थे।पूनम तिवारी विराट ने अपने जीवन साथी एवं प्रख्यात रंगकर्मी दीपक विराट के साथ लोक मंच” रंग छत्तीसा” के माध्यम से छत्तीसगढ़ी लोककला और संस्कृति को राष्ट्रीय एवं अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर फैलाया।
पूनम तिवारी विराट मात्र 9 वर्ष की उम्र से ही लोककला के क्षेत्र से जुड़ गई थी। उनकी पिता जी का नाम नारायण राव और माता का नाम श्रीमती राधा सोनवानी था। उनकी मां राधा सोनवानी विभिन्न नाटकों में अभिनय करती थी। उनके पिता प्रसिद्ध शहनाई वादक थे।गरीब परिवार से ताल्लुक रखने वाली पूनम तिवारी दाऊ मंदरा जी नाचा पार्टी ,जालबांधा नाचा पार्टी तथा मदन निषाद नाचा पार्टी में नृत्य और गायन से जुड गई। मंदरा जी दाऊ ने उन्हें खूब प्रोत्साहित किया।
संस्कारधानी राजनांदगांव के लोक कलाकार और नया थियेटर दिल्ली के चर्चित अभिनेता दीपक तिवारी विराट से संपर्क में आने के बाद उनकी कला में और निखार आया।धीरे से दोनों ने जीवन साथी के रूप में भी सफर शुरू किया। वे सुप्रसिद्ध रंगकर्मी एवं निर्देशक हबीब तनवीर के “नया थियेटर”में सन 1984 से 2005 तक मुख्य अभिनेत्री रही। तनवीर के नया थियेटर के माध्यम से चोर चरन दास,माटी के गाड़ी,साजापुर की शांति,लाल शोहरत राय, मुद्दा राक्षस, माता बहादुर कलारिन,हिरमा की अमर कहानी,मोर नांव दमाद अउ गांव के नांव ससुरार,नंद राजा मस्त है,आगरा बाजार, देख रहे हैं नैन,सोन सागर,काम देव का अपना बसंत ऋतु का सपना, जमादारिन जैसे प्रसिद्ध नाटकों में अपनी अभिनय और गायन से अपनी अमिट छाप छोड़ी। उन्होंने प्रख्यात रंगकर्मी विभा मिश्रा की टेली फिल्म घर,सफदर हाशमी की टेली फिल्म साक्षरता, इंडो कनाडा फिल्म द बर्न इन के साथ ही लाटरी,सड़क,मंगलू , दीदी,राजिम भक्तिन,चरन के परन आदि नाटकों में बेहतर प्रदर्शन किया।
रंग कर्म के क्षेत्र में परचम लहराने वाली पूनम तिवारी विराट सांस्कृतिक सफर कांटो भरा भी रहा है। बचपन बहुत संघर्षमय रहा।उनके रंग कर्मी पति दीपक तिवारी विराट बीमारी के दौर से गुजरे।इस दौर में वे बेहतर जीवन संगिनी साबित हुई। सन 2019 में एक कार्यक्रम के दौरान उनके कलाकार पुत्र सूरज तिवारी का आकस्मिक निधन हो गया। यह पूनम तिवारी विराट के लिए कोई वज्रपात से कम नहीं था। अपने जवन बेटे को खोकर भी जब उनकी अर्थी और अंतिम मुलाकात पर पूनम तिवारी विराट ने ” एखर का भरोसा, चोला माटी के राम को रूंधे गले में सुना कर एक लोक कलाकार बेटे को श्रद्धांजलि अर्पित की तो हर कोई की आंखों से अश्रु धारा फूट पड़ी।इस विपदा ने उन्हें अपनी कला साधना के और करीब ला दिया। इसके ठीक दो वर्ष बाद ही उनके पति दीपक तिवारी विराट ने इस दुनिया को अलविदा कह दिया। इन सब परिस्थितियों से जूझती हुई वे कला साधना में रत है। उन्हें लोक कला के क्षेत्र में दिये जाने वाला सर्वोच्च सम्मान संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार हेतु चयनित किए जाना लोक कला में साधनारत एक लोकाकार का उचित सम्मान है और हम आशा करते हैं कि उन्हें एक दिन उन्हें पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया जाएगा। पूनम तिवारी को संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित होने पर पुनः बहुत-बहुत बधाई एवं ढेर सारी हार्दिक शुभकामनाएं है।
• लेख, ओमप्रकाश साहू ‘अंकुर’
•संपर्क- 79746 66840
🟥🟥🟥🟥🟥🟥
chhattisgarhaaspaas
विज्ञापन (Advertisement)