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महाशिवरात्रि विशेष : शिवजी का जन्मदिन शिवरात्रि क्यों? – डॉ. नीलकंठ देवांगन

विश्व की सभी महान विभूतियों के जन्मोत्सव जन्म दिन के रूप में मनाये जाते हैं | देवताओं की भी जयंतियां जन्म दिन के रूप में ही मनाई जाती हैं , लेकिन परमात्मा शिव की जयंती, जिसे जन्म दिन न कहकर शिवरात्रि कहा जाता है | शिव के साथ क्यों जुड़ी रात्रि? अन्य देवताओं के जन्म दिवस क्यों?
यहां रात्रि शब्द कलियुग में फैले तमोगुण एवं अंधकार का सूचक है, जिसमें अवतरित होकर परमात्मा सर्व आत्माओं की ज्योति जगाकर कलियुग रूपी रात्रि को सतयुग रूपी दिन में परिवर्तित करते हैं | काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार आदि मनोविकारों के वशीभूत आत्माओं को ईश्वरीय ज्ञान और राजयोग की शिक्षा द्वारा आध्यात्मिक जागृति लाकर निर्विकारी, पवित्र बनाते हैं |
शिवरात्रि परमात्मा के दिव्य अवतरण की स्मृति – महाशिवरात्रि त्यौहार परमात्मा शिव के दिव्य अवतरण का ही यादगार है | कल्याणकारी विश्व पिता शिव तो अलौकिक अथवा दिव्य जन्म लेकर अवतरित होते हैं | उनकी जयंती संज्ञा वाचक नहीं, बल्कि कर्तव्य वाचक रूप से मनाई जाती है |
दिव्य जन्म लेते परमात्मा
दिव्य कर्तव्य हैं करते
दिव्य रूप अविनाशी चेतन
परम धाम में रहते
उनका जन्म मनुष्यत्माओं की भांति नहीं होता | शिव परमात्मा का दिव्य अवतरण विषय विकारों की कालिमा से लिप्त अज्ञान निद्रा में सोये मनुष्य को जगाने के लिए होता है | महाशिवरात्रि फाल्गुन मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को अमावस्या के एक दिन पहले मनाई जाती है | जब इस सृष्टि पर पाप की अति, धर्म की ग्लानि और पूरी दुनिया दुखों से घिर जाती है तो गीता में किये अपने वायदे के अनुसार परमात्मा परकाया प्रवेश कर अशरीरी होते भी अपना दिव्य कार्य करने इस धरा पर अवतरित होते हैं और पुनः सत्धर्म की स्थापना, सच्चा गीता ज्ञान एवं मनुष्यत्माओं को पतित से पावन बनाने के लिए सहज राजयोग की शिक्षा देते हैं |
सभी देवों के देव हैं महादेव परमात्मा शिव –
कोई इंसान या देवता किसी की पूजा तभी करता है, जब वह उससे गुणों और विशेषताओं में श्रेष्ठ और बड़ा होता है | परम पिता परमात्मा शिव सभी देवों के भी देव महादेव हैं | उनकी पूजा और आराधना किसी न किसी रूप में देवी देताओं ने की है | वे सर्व शक्तिमान हैं, आराध्य हैं | विश्व के सभी धर्मों में किसी न किसी रूप में उनकी पूजा आराधना की जाती है | सभी धर्मों ने परमात्मा की सत्ता को स्वीकार किया है | किसी ने उसे निराकार ज्योति कहा तो किसी ने नूर, तेज, तेजोमय, एक ओंकार निराकार, ज्योति, लाईट आदि नामों से पुकारा है |
परमात्मा सर्व आत्माओं के परम पिता –
परमात्मा शिव सर्व आत्माओं के परम पिता हैं जिसे कोई अल्लाह, कोई गॉड कहता है | जहां हिंदू धर्म में निराकार परमात्मा को ज्योतिर्लिङ्ग के रूप में पूजा जाता है, वहीं अन्य धर्मों में भी परमात्मा को निराकार ज्योति स्वरूप माना जाता है |
उस तेजोमय स्वरूप को जिसे हिंदू धर्म में ज्योतिर्लिङ्गम् कहा गया है, जो ज्योति का प्रतीक है | ज्योति माना ही तेज | मुस्लिम धर्म में मुसलमानों ने उसे अल्लाह, नूर- ए- इलाही, खुदा कहकर उस निराकार परम सत्ता को ही याद किया है | मक्का मदीना में एक पवित्र पत्थर है जिसका दर्शन कर वे मानते हैं कि खुदा उन्हें जन्नत में स्थान देगा | उस पत्थर की कोई साकार आकृति नहीं है जिसे ‘संग- ए- असवद’ कहा जाता है | वही उनके अल्लाह, नूर, खुदा हैं |
सिक्ख धर्म में उसी ज्योतिर्लिङ्गम् को गुरु नानक देव ने ‘एको ओंकार निराकार’ कहा | परमात्मा के सत्य स्वरूप का वर्णन करते हुए उन्होंने कहा – वे निराकार हैं, निर्वैर हैं, सतनाम हैं जिसको काल कभी खा नहीं सकता | उनकी तस्वीर में एक उंगली हमेशा ऊपर की ओर दिखाई देती है जो परमात्मा की ओर ही इशारा करती है | अल्लाह, खुदा, गॉड, भगवान वास्तव में एक ही हैं |
ईसाई धर्म में जीसस क्राईस्ट ने ‘गॉड इज लाईट’ कहा | उन्होंने लाईट को परमात्मा का स्वरूप बताया | बौद्ध धर्म में भी उस ज्योतिर्लिङ्गम् को ‘धम्ब’ (प्रकाश) कहते हैं | हजरत मूसा ने उस प्रकाश को ‘जिहोवा’ कहा | जापान में उसे ‘चिंकोन सेंकी’ अर्थात् शांतिदाता कहते हैं | रोम में ‘प्रियपस’ कहते तो यूनान में ‘फल्लुस’ नाम से पुकारते हैं |
श्री राम ने की शिव की पूजा –
‘रामेश्वर के रूप में स्वयं श्री राम ने उस देवों के देव महादेव ‘शिव’ की पूजा की | वे जानते थे कि रावण को जिस शक्ति का अभिमान है, उसे उसने शिव की पूजा आराधना से प्राप्त की थी | उस शक्ति से मुकाबला करने उसे भी शिव की शक्ति की आवश्यकता पड़ी | इसलिए उन्होंने शिव की स्थापना आराधना की |
श्री कृष्ण ने की शिव की पूजा –
महाभारत युद्ध के पहले कुरुक्षेत्र के मैदान में स्वयं श्री कृष्ण ने भी ‘थानेश्वर- सर्वेश्वर’ की स्थापना कर परम पिता शिव की पूजा अर्चना की और पांडवों से भी करवाई | शिव से शक्ति प्राप्त कर युद्ध के मैदान में उतरे | पांडवों की संख्या कम होने पर भी उन्हें कौरवों से विजय मिली |
ज्योति बिंदु स्वरूप हैं परमात्मा –
परम पिता परमात्मा शिव निराकार हैं | निराकार का अर्थ यह नहीं कि उनका कोई आकार नहीं है | हां, उनका कोई शारीरिक आकार नहीं होता | वे सूक्ष्म ज्योतिर्मय हैं | उनका स्वरूप ज्योति बिंदु है लेकिन गुणों में सिंधु के समान हैं | जैसे हम अपनी आत्मा को इन स्थूल नेत्रों से नहीं देख सकते, वैसे परमात्मा को भी नहीं देखा जा सकता | उनके साथ की, उनके शक्तियों की अनुभूति की जा सकती है |
परमात्मा का स्मरण चिन्ह है शिवलिङ्ग –
शिव का शाब्दिक अर्थ है – ‘कल्याण कारी’ और लिङ्ग का अर्थ है – प्रतिमा, चिन्ह या निशानी | अतः शिव लिङ्ग का अर्थ हुआ – कल्याण कारी परम पिता परमात्मा की प्रतिमा | परमात्मा का रूप ज्योतिर्बिन्दु है जो प्राकृतिक रूप से ही प्रकाशमान होते हैं | सर्वप्रथम सोमनाथ के मंदिर में हीरे कोहिनूर से बने शिवलिङ्ग की स्थापना हुई थी | भारत में विश्व के 12 प्रसिद्ध मठों को ज्योतिर्लिङ्ग मठ कहा जाता है | ये हैं –
1 श्री सोमनाथ , 2 श्री शैल्य मल्लिकार्जुन,
3 श्री महाकालेश्वर, 4 श्रीओंकारममलेश्वर,
5 श्री परली बैजनाथ, 6 श्री भीमाशंकर,
7 श्री रामेश्वर . 8 श्री नागेश्वर ,
9 श्री काशी विश्वनाथ, 10 श्री त्र्यम्बकेश्वर,
11 श्री केदारनाथ, 12 श्री घृष्णेश्वर |
इनमें हिमालय स्थित केदारेश्वर, काशी में विश्वनाथ, सौराष्ट्र प्रदेश में सोमनाथ और मध्य प्रदेश के उज्जैन शहर में स्थित महाकालेश्वर अति प्रसिद्ध हैं |
शिवलिङ्ग पर तीन रेखायें –
शिवलिङ्ग पर सदा तीन रेखायें अंकित की जाती हैं | तीन रेखायें शिव के तीनों लोकों का स्वामी होने का प्रतीक है | इसके बीच में एक आंख भी दिखाई जाती है | रेखाओं के बीच में आंख का होना उनके त्रिनेत्री होने का प्रतीक है | उनमें तीन पत्तों वाला बेलपत्र चढ़ाया जाता है | तीन पत्तों वाला बेलपत्र परमात्मा के ब्रह्मा, विष्णु, शंकर के रचयिता होने का प्रतीक है | उन्हें करन करावनहार कहा जाता है | वे प्रजापिता ब्रह्मा द्वारा सृष्टि की स्थापना, विष्णु द्वारा पालना और शंकर द्वारा कलियुगी आसुरी सृष्टि का विनाश कराते हैं |
शिवलिङ्ग पर ही अक धतूरा क्यों? –
देवी देवताओं पर कमल, गुलाब और अन्य सुगंधित पुष्प चढ़ाते हैं, जबकि शिवलिङ्ग पर अक, धतूरा, कनेर व गंधहीन पुष्प चढ़ाया जाता है | अक धतूरा विकारों एवं बुराइयों का प्रतीक है | मनुष्य के अंदर का दोष दुर्गुण, कषाय कल्मश, विकार – काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार हमारे जीवन को विषैला कर देता है | उसे परमात्मा शिव में अर्पित कर अपने बेशकीमती जीवन को कमल पुष्प समान बनायें व परमात्म- प्यार के अधिकारी बनें | मनुष्य जब दुखी होकर परमात्मा को पुकारते हैं तब वे इस धरा पर अवतरित होकर मानव मात्र को दुखों से छुड़ाते हैं | वे मनुष्य से काम क्रोध आदि विकारों एवं बुराइयों का दान मांगते हैं | जो नर नारी इन विकारों, दुर्गुणों को शिव पर चढ़ा देते हैं वे निर्विकारी बन सतयुगी पावन दुनिया के अधिकारी बनते हैं | इसी की स्मृति में शिवलिङ्ग पर अक धतूरा के फूल चढ़ाये जाते हैं |
श्री शंकर भी लगाते शिव का ध्यान – शंकर को सदा ध्यान की अवस्था में दिखाते हैं | इससे स्पष्ट है कि उनके भी कोई आराध्य हैं | लोग शिव और शंकर को एक होने का भूल करते हैं | दोनों अलग अलग हैं | ज्योति बिंदु परमात्मा निराकार हैं और शंकर हैं साकारी श्रेष्ठ देवता | शंकर निरंतर एकाग्र चित्त होकर शिव का स्मरण करते हैं | उनके संबंध में कहा जाता है कि तीसरा नेत्र खुलते ही विनाश ज्वाला प्रकट होती है | यह तप बल का प्रभाव है | यह तपस्या द्वारा प्राप्त शक्ति का परिणाम है | यह शक्ति उनके नेत्रों से दिखाई देती है |
श्री राम ने की शिव की पूजा | श्री कृष्ण ने भी की शिव की पूजा | श्री शंकर भी शिव के ध्यान में समाधि पर रहते हैं | इससे स्पष्ट है कि परमात्मा शिव ही सभी देवों के देव महादेव हैं | वही सत्यम्, शिवम्, सुंदरम् हैं और पारब्रह्म हैं | वे 33 करोड़ देवताओं के भी पिता हैं |
परमात्मा शिव परम धाम के निवासी हैं –
परमात्मा परम धाम जिसे शांतिधाम, ब्रह्मलोक, निर्वाण धाम, मुक्तिधाम , मोक्षधाम, शिवपुरी कहा जाता है, के निवासी हैं | तीन लोक होते हैं – 1 स्थूल लोक, 2 सूक्ष्म लोक, 3 परम धाम |
स्थूल लोक –
यह साकारी दुनिया या मनुष्य सृष्टि है जिसमें हम निवास करते हैं | यह पांच तत्वों – आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी से बनी है | इसे कर्म क्षेत्र भी कहते हैं क्योंकि यहां मनुष्य जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल भोगता है | इस स्थूल लोक में जन्म मरण है | इसमें संकल्प, वचन और कर्म तीनों हैं | स्थापना, पालना और विनाश परमात्मा के दिव्य कर्तव्य इसी लोक में होते हैं | यह सृष्टि मंच या विशाल नाटक शाला है जहां आत्मायें नियत समय पर अपना पार्ट बजाने आती जाती हैं |
सूक्ष्म लोक –
सूर्य, चांद के भी पार एक अति सूक्ष्म (अव्यक्त) लोक है | इसमें तीन पुरियां हैं – पहले सफेद रंग के प्रकाश तत्व में ब्रह्मा पुरी, उसके ऊपर सुनहले लाल प्रकाश में विष्णु पुरी, और उसके भी पार शंकर पुरी है | इन तीनों देवताओं की पुरियों को संयुक्त रूप से सूक्ष्म लोक कहते हैं क्योंकि इनके शरीर पांच तत्वों के बने नहीं हैं | प्रकाश के शरीर हैं | दिव्य दृष्टि द्वारा ही इनका साक्षात्कार हो सकता है | यहां संकल्प और गति तो है लेकिन वाणी या ध्वनि नहीं है | इसमें मृत्यु, दुख, भय या विकारों का नामोनिशान नहीं होता | धर्मराज पुरी भी इसी लोक में है |
परम धाम (ब्रह्म लोक) –
सूक्ष्म लोक से भी ऊपर एक असीम फैला हुआ तेज सुनहरे लाल प्रकाश है जिसे अखंड ज्योति, ब्रह्म महतत्व कहते हैं | यह ब्रह्म महतत्व पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश से भी अति सूक्ष्म है | इसका साक्षात्कार दिव्य चक्षु द्वारा ही हो सकता है | ज्योतिरबिंदु परम पिता परमात्मा इसी लोक में निवास करते हैं | सभी धर्मों की पवित्र आत्मायें भी अव्यक्त रूप में यहीं निवास करती हैं | यहां सभी अशरीरी (निराकारी) रहते हैं | इसलिए यहां न संकल्प है, न वचन है, न कर्म है | न सुख, न दुख बल्कि एक न्यारी अवस्था है – ‘बिंदु रूप |’ यहीं से आत्मायें अपने समय पर पार्ट बनाने सृष्टि मंच पर आती हैं | इसे मूल वतन भी कहते हैं |
शिव आराधना से होती है मोक्ष की प्राप्ति –
कोई भी मनुष्य दूसरे मनुष्य आत्माओं को क्षणिक सुख भले दे सकता है, लेकिन सदा काल के लिए परमात्मा ही दुखों से छुड़ा सकते हैं | वे सदा शिव हैं | उन्हें दुख हर्ता, सुख कर्ता कहते हैं | उनकी आराधना से सभी प्रकार के बंधन कटते जाते हैं | उनकी याद से विकर्म विनाश होते हैं | दोष, दुर्गुण दूर होते हैं और पाप भस्म होते हैं | परमात्मा ही दुखों से मुक्ति देता है |
मन की शांति केवल बाहरी साधनों से नहीं मिलती, भीतर की मनोवृत्ति को अनुकूल बनाना होता है | सुख शांति का श्रोत तो परमात्मा है | उनसे मन का नाता जोड़कर असीम सुख शांति और मोक्ष पा सकते हैं |
शिवरात्रि के सही अर्थ को समझें –
परमात्मा शिव का अवतरण कलियुग रूपी रात्रि में होता है | इसलिए शिव के अवतरण दिवस को शिवरात्रि कहा जाता है | वर्तमान समय कलियुग का सारा काल ही महारात्रि है | परमात्मा शिव इस धरती से पांचों विकारों (काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार) रूपी राक्षसों का खात्मा कर देते हैं जिससे धरती फिर से पावन हो जाती है |
अभी सृष्टि के महापरिवर्तन का समय चल रहा है | दुनिया तेजी से बदल रही है | प्रकृति, पुरुष और सत्ता सभी में बदलाव दिख रहा है | यह कलियुग के अंतिम चरण और सतयुग के प्रारंभ का समय है | परमात्म शक्ति द्वारा महा परिवर्तन हो रहा है | तीन सत्तायें काम कर रही हैं – परम सत्ता (सर्वोच्च सत्ता) , मनुष्य आत्मायें और प्रकृति | ऐसा परिवर्तन परमात्मा के सानिध्य में होता है | इसमें मनुष्यात्मा और प्रकृति दोनों ही पवित्र और सतोप्रधान बनते हैं | फिर नई दुनिया का आगमन होता है | यह वही समय है | एक ओर आसुरी प्रवृत्तियों का तांडव तो दूसरी ओर परमात्म शक्ति द्वारा पूरे विश्व का परिवर्तन | दोनों जारी है |
कहीं कहीं इस दिन को शंकर पार्वती के विवाह प्रसंग से जोड़ते हैं और कइयों का कहना है कि शंकर पार्वती का विवाह तो बैसाख मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को हुआ था |
शिवरात्रि के आध्यात्मिक रहस्य को जानकर अब अपने तीसरे नेत्र को खोलिये और परमात्मा शिव से मिलन मनाइये | परमात्मा वह जिसे सबने माना | विश्व के कोने कोने में शिव पिता को ज्योतिर्लिङ्ग के रूप में विभिन्न नामों से याद करते व ईश्वर मानते हैं | यह वही ज्योति स्वरूप परमात्मा है, जिसे सबने माना और जिनके दिव्य अवतरण दिवस के यादगार पर्व को महाशिवरात्रि के रूप में मनाते हैं |

▪️ डॉ.नीलकंठ देवांगन
▪️ संपर्क- 84355 52828
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