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लघुकथा : डॉ. दीक्षा चौबे [ दुर्ग छत्तीसगढ़ ]

▪️ डॉ. दीक्षा चौबे
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काम पर

निर्माणाधीन इमारत में मजदूरी करती इमरती आज अपने चार वर्षीय बेटे दीनू को भी साथ ले आई थी । उसकी तबीयत ठीक नहीं लग रही थी तो घर पर अकेले छोड़ने का मन नहीं हुआ । बाकी दिन तो उसके घर पहुँचने तक मुहल्ले में बच्चों के साथ खेलता रहता था । सिर पर ईंट उठाते वक्त थोड़ा दीनू की तरफ देखकर आश्वस्त हो जाती और अपने काम पर लग जाती । बच्चे की बालसुलभ क्रीड़ाएँ माँ के ममतामयी हृदय को आनंद से विलोडित कर देतीं और उसकी सारी थकान दूर हो जातीं । जहाँ दीनू और दो-एक बच्चे खेल रहे थे जाने कैसे कहाँ से एक लकड़ी का पट्टा जोर से गिरा.. और इमरती की दुनिया वीरान कर गया । इमरती अपनी आँखों के आगे उजड़ती कोख देखकर पथरा गई थी । जिसके लिए काम पर आई थी , काम उसे ही निगल गया था।
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सांड की शिष्टता

कल रुचि अपनी एक्टिवा में बाजार जा रही थी । सड़क के बीच में तीन लोग खड़े थे , दो मनुष्य और एक सांड । काफी दूर से ही वह हॉर्न बजा रही थी पर वहाँ कोई हलचल नहीं हुई। थोड़ा पास जाने पर पहले उन्होंने मुड़ कर देखा फिर एक-दूसरे की तरफ । मनुष्यों ने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी , सांड ने अपना पिछला हिस्सा हिला कर थोड़ी जगह बना दी और उसकी गाड़ी निकलने लायक जगह बन गई । पता नहीं सांड थोड़े शिष्ट हो गए हैं या मनुष्य अशिष्ट।
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जानवर

रीना अपनी सहेली रुचि के साथ बाजार गई थी । गोधूलि बेला में चौपाए अपनी झुंड के साथ वापस लौट रहे थे । उसने रुचि से कहा –” रुचि !हम यहीं सड़क के किनारे खड़े हो जाते हैं , जानवरों का क्या भरोसा । किसी ने सींग मार दी तो हम सँभल भी नहीं पाएँगे । ” सावधानी के साथ वे किनारे खड़े हो गए । उसकी शंका निर्मूल थी , झुंड चुपचाप वहाँ से गुजर गया । वे कुछ दूर ही आगे बढ़े थे कि सामने से मोटरसाइकिल पर सवार संभ्रात दिखाई देने वाले दो युवकों में से पीछे बैठे युवक ने अचानक रुचि के पेट में जोर से कुहनी मारी और निकल गया । यह सब इतनी तेजी से हुआ कि उन्हें सँभलने या सोचने का वक्त ही नहीं मिला । रुचि की आँखों में गहरी पीड़ा उभर आई थी । रीना सोच रही थी जानवर कौन है?
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