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‘मरना भी तो संडे को’ : कृति, छ्गनलाल सोनी: समीक्षा, विनोद साव

छ्गनलाल सोनी का यह पहला व्यंग्य-संग्रह उनकी षष्ठपूर्ति पर आया है. देर से ही सही पर उन्होंने व्यंग्य के माध्यम से अपना मोर्चा सम्हाल लिया है. ये व्यंग्य उनकी सहज सरल अभिव्यक्ति की उपज हैं. इन्हें लिखते समय वे कोई विशेष भंगिमा अख्तियार नहीं करते हैं. उनकी रचनाओं को पढ़ते समय उनके पाठकों के लिए भी संभव है कि उन्हें भी किसी भंगिमा की दरकार न होती हो, वे रचना के स्वाभाविक सम्प्रेषण को अपने स्वाभाविक पठन से ग्रहण करते हों. यह साफ दिखता है कि छगनलाल जी की रचनाएँ जन की भाषा में पूरी तरह जन-सरोकार से युक्त हैं.
ये रचनाएँ उस सुविधाभोगी समाज को कोचती हैं जो स्वयं विचारहीन और विलासमय जीवन को जीते हुए दलदल में गले तक धंसे हुए है और अपने आसपास को भी उसी कीचड में घसीटे जा रहा है. उसके पास ‘अंग्रेजी क्रिकेट के हिन्दुस्तानी रंग’ हैं जिसमें “दफ्तर से भागकर घर में बैठा अफसर नये भारतीय खिलाडी के आउट हो जाने पर चयन समिति को कोसता है या टीम के कोच को. क्रिकेट में लोग सुझाव ऐसे देते हैं, जैसे संयुक्त राष्ट्र संघ में वे सुरक्षा परिषद के सदस्य हों, और विरोधी अरेबियन टीम पर हमला करना हो.” यह सुविधाभोगी समाज मृत्यु का उत्सव मनाता है. दाह-संस्कार से दशगात्र और बरसी तक उसे सेलिब्रेट करने के कई उपाय सोचता है. यह भी कहता है “शवयात्रा में भीड़ का कीर्तिमान बनाना हो तो ‘सन्डे के दिन ही मरना चाहिए.’
बदहवासी में जीता समाज अपनी ‘दिव्य दृष्टि में चश्मे का योगदान’ देखता है. इस पर लेखक का करारा व्यंग्य उभरता है “जबकि गांधीजी ने अपना चश्मा उतारकर नगर निगम वालों को दे रखा है. नगर निगम के सफाई अभियान में चश्में का प्रतीक चिन्ह, जिसमें एक ओर स्वच्छता और दूसरी ओर भारत है. चश्मा ज्यों का त्यों रखा हुआ है, जबकि स्वच्छता गाँधी के विचार की तरह व्यवस्था से गायब है.”
जब देश अशांत होता है तब राजनीति पर तो बात आएगी ही आएगी. नेहरू का वैज्ञानिक समाजवाद आज ‘गब्बरसिंह के समाजवाद’ में तब्दील होता जा रहा है- “जैसे सर्कस के शेर को हंटर दिखाकर काम लिया जाता था, ठीक ऐसे ही भारतीय मतदाता को लोकतंत्र में इन्सान को इन्सान के बजाए सर्कस का शेर बनाया जा रहा है, जो धर्मनुमा रिंग में आसानी से भीतर जाए, और अपने धर्म के लिए, अपने आका के लिए करतब दिखाए.”
हिन्दी में व्यंग्य लेखकों की संख्या बढती जा रही है. इसके साथ पाठक समाज में व्यंग्य की मान्यता बढती जा रही है. इसमें से ही अच्छे व्यंग्यकार सामने आएंगे. इसका सम्यक निर्वाह छगनलाल सोनी कर रहे हैं. इस संग्रह से वे पाठकों का विश्वास जीत सकते हैं. वे स्थितियों पर विनम्र प्रहार करते हुए अपनी रचना में हास-परिहास-उपहास की छटा बिखेरते चलते हैं.
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• संपर्क-
• विनोद साव :90098 84014
•छ्गनलाल सोनी : 98264 58461
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