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कुछ जमीन से कुछ हवा से : राम की गाथा- विनोद साव

पुराण कथाओं के आख्यानकर्ता (माइथोलॉजिस्ट) देवदत्त पटनायक की किताब ‘राम की गाथा’ पढने में आई. यह पेंगुइन बुक्स से प्रकाशित है. देवदत्त पटनायक अंग्रेजी में लिखते हैं जिसका हिंदी अनुवाद यहां प्रभात रंजनं ने किया है जो महात्मा गाँधी अंतर्राष्ट्रीय विश्विद्यालय की प्रसिद्द हिंदी साहित्यिक पत्रिका ‘बहुवचन’ के संपादक रह चुके हैं. लेखक देवदत्त पटनायक आधुनिक समय में पौराणिक गाथाओं की प्रासंगिता पर लिखते हैं. चित्र बनाते हैं और व्याख्यान देते हैं. उनकी दर्जनों किताबें प्रकाशित हैं और अनेक अख़बारों पत्रिकाओं में उनके स्तंभ छपते रहते हैं. इनमें हिन्दू आख्यानों को समझकर उनका विश्लेषण कर पाठकों को समझाने का प्रयास वे करते हैं.
अपनी पुस्तक की भूमिका में वे लिखते हैं “राम की कहानी जनता के पास क्लिष्ट संस्कृत भाषा के पाठों के माध्यम से नहीं पहुंची है बल्कि स्थानीय भाषाओँ में नाटकों, गानों और नृत्य की प्रस्तुतियों से पहुंची है. मैंने यह किताब आम आदमी के राम के गुणगान में लिखी है.” लेखक ने राम की कथा गाथा को लेकर जो अनेक भ्रम पैदा होते हैं उनका तोड़ यहां प्रस्तुत किया है. पुराणों के अपने गहन और विशाल अध्ययन से वे हर कहीं से कथा से सम्बद्ध संदर्भ जुटा लेते हैं और कथाओं के मूल स्रोत को खोज निकालते हैं. यह बताते हुए कि धर्म और विज्ञान के रास्ते अलग अलग हैं; विज्ञान प्रमाण की मांग करता है, धर्म किसी तरह के प्रमाण की मांग नहीं करता वह आस्था जनित और आस्था आश्रित होता है.. फिर भी लेखक धार्मिक तथ्यों की प्रामाणिकता जुटाने का हर संभव प्रयास करते हैं ताकि इन पुराकथाओं को आधुनिक समय के अनुकूल ग्राह्य और प्रेरक बनाया जा सके. जैसे वाल्मीकि ने अपने युग के अनुसार लिखा और तुलसी तथा अनेक कथावाचकों ने अपने अपने युग के अनुकूल कथा का परायण किया है. इस ग्रंथ में लेखक ने रामायण के चरित्रों को क्रमवार रखकर हर पात्र के परिचय और उनके विकास को उसके उद्गम से निकाला है.
लेखक द्वारा दिए गए कई प्रमाण हमारे परम्परागत ज्ञान से अलग हैं जैसे कि संस्कृत में लिखी गई वाल्मीकि रामायण दो हजार वर्ष पूर्व ही लिखी गई है और वाल्मीकि के डाकू होने का कोई उल्लेख नहीं मिलता है. उनके डाकू से ऋषि के रूप में परिवर्तित होने की कथा मात्र पांच सौ वर्ष पूर्व के भक्तिकाल में प्रचलित स्कन्द पुराण तथा अन्य क्षेत्रीय भाषाओँ के ग्रंथों में पाई जाती है.
१२ वी शताब्दी के बाद जब भारत में अनेक स्थानीय भाषाओँ ने रूपाकार लेना शुरू किया तो कवियों ने रामायण की रचना स्थानीयं भाषाओँ में की. अधिकतर भाषाओँ में रामायण ही पहली साहित्यिक कृति थी. आश्चर्य जनक है कि अवधी (हिंदी) में जब तुलसीदास ने संवत सोलह सौ एकतीसा में रामचरित मानस लिखा उसके चार सो वर्ष पहले तमिल में कंबन मुनि ने ‘रामायण’ लिख डाली थी और १३ वीं शताब्दी में तेलुगु में बुद्ध रेड्डी ने ‘रघुनाथ रामायण’, १४ वीं में असमिया भाषा में माधव कान्दली ने ‘कथा रामायण’, १५ वीं शताब्दी में उड़िया में बलराम दास ने ‘दंडी रामायण’, कन्नड़ में नरहरि ने ‘तोरवे रामायण’, कृतिवास ने ‘बांग्ला रामायण’, मलयालम में एझुथाचन ने ‘आध्यात्म रामायण’ की रचना कर ली थी. इनके बाद तुलसीदास ने लिखी फिर मराठी में एकनाथ ने ‘भावार्थ रामायण’ लिखी. उल्लेखनीय है कि १७ वी शती में पंजाबी में सिक्खों के दसवें गुरु गोविन्द सिंह ने ‘गोविन्द रामायण’ की रचना की, १८ वी में कश्मीरी रामायण लिखी गई और अंत में १९ वी शती में ही गिरिधरदास ने गुजराती में ‘गिरिधर रामायण’ की रचना की. भारतीय व्यापारी रामायण को दक्षिण पूर्व एशिया लेकर गए और राम की कहानी अब इंडोनेशिया, थाई और मलय संस्कृतियों का अविभाज्य हिस्सा है जो वहां के रंगमंच, पुतली कला और शानदार भित्ति चित्रों का हिस्सा बन गया है.
वैसे तो बौद्ध धर्म और जैन धर्म ने मुख्य धारा के हिन्दू धर्म को ख़ारिज कर दिया था पर वे राम को ख़ारिज नहीं कर सके. बौद्ध धर्म में ‘दशरथ जातक’ की कथा है, जो ३०० ईस्वी पहले प्राकृत भाषा में लिखी गई थी जिसमें राम की पहचान पूर्व जन्म में बोधिसत्व के रूप में की गई है. यहां राम करुणा और बुद्धि के देवता हैं. इसी समय में जैन रामायणों में भी ‘पद्म चरित’ आया. यह अपभ्रंश में विमलश्री द्वारा लिखा गया है जिसमें राम को ‘पद्म’ के रूप में देखा गया और जिनमें जैनियों के सभी सद्गुण हैं. जैनी राम हिंसा नहीं करते इसलिए वे रावण को मारते भी नहीं हैं. यह काम अधिक उग्र लक्ष्मण के लिए छोड़ दिया गया.
सभ्यता के आरंभ से ही धर्म का उपयोग एक समूह को बेहतर बताने और दूसरे को दानव बताने के लिए किया जाता रहा है. धर्म के राजनीतिक पहलू को नजर अंदाज कर पाना भोलापन है. नियमों के प्रति निष्ठावान रहने के कारण स्वाभाविक रूप से राम को अन्य भगवानों से अधिक तरजीह दी जाती है. उदाहरण के लिए कृष्ण, जो नियमों को तोड़ने वाले चालाक रणनीतिकार हैं, या शिव के मुकाबले जो कि दुनियावीं मामलों से निरपेक्ष रहने वाले हैं.
गाँधी भजन की बहुप्रचलित पंक्ति का जिक्र है- “रघुपति राघव राजाराम/पतित पवन सीताराम/ईश्वर अल्ला तेरो नाम/सबको सन्मति दे भगवान. इसे प्रसिद्द शास्त्रीय-भजन गायक विष्णु दिगंबर पलुस्कर ने संगीतबद्ध किया था और यह गाँधी की दांडी यात्रा के समय चलते हुए समूह स्वर में गाया जाता था. यह सत्रहवीं शताब्दी के मराठी संत कवि रामदास के एक पद पर आधारित था. इसमें स्वाधीनता संग्राम के समय में सद्भाव लाने के लिए ‘अल्ला’ शब्द गाँधी जी ने जोड़ा था लोगों को जोड़ने के लिए. जिसे लेकर आजकल विरोध किया जा रहा है. जबकि ऐसा कोई पहली बार नहीं हुआ है, हमारे पुराणों शास्त्रों में तो जोड़ तोड़ का इतिहास भी समृद्ध रहा है. शम्बूक वध की ही तरह सीता के परित्याग की कहानी भी बाद की ज्यादातर कथाओं और अनुवादों में संपादित कर दी गई है. दोनों ही असहज पाठ हैं. दोनों राम की न्यायप्रियता को चुनौती देते हैं.
वर्ण की दृष्टि से रावण (ब्राम्हण) को राम (क्षत्रिय) से श्रेष्ठ माना गया है पर उसके श्रेष्ठ होने के बाद भी राम उसे इसलिए मारते हैं क्योंकि बेहद शिक्षित और समर्थ होने के बाद भी रावण ने अपनी जिद में आकर अपने अंदर के जानवर को शांत करने से इंकार कर दिया. एक बार उसने शिव की तपस्या कर उनकी पत्नी को मांग लिया था. दूसरी बार वह राम की पत्नी का अपहरण कर भाग निकला था. वह प्रभुत्व बनाना चाहता है. रावण विरोध का प्रतीक है. प्रतीक रूप में रावण का अंत अधम मानवीय प्रवृत्तियों का अंत है. राम के लिए वर्ण धर्म समाज को व्यवस्थित करने और पेशों को तय करने का प्रयास किसी एक समूह के लोगों द्वारा दूसरे के ऊपर धौंस ज़माने के लिए नहीं होता. अगर राम जाति व्यवस्था को मानते तो वे आदिवासी स्त्री शबरी के हाथों से भोजन या उनके जूठे बेरों को कभी ग्रहण नहीं करते.
रामायण कभी भी राम के जीवन की कहानी नहीं रही. यह कहानी इस बारे में है कि राम दूसरों के लिए किस तरह से जिए. उनकी कहानी बार बार लिखकर कथावाचकों में यह उम्मीद जगती है कि उनके माध्यम से वे खुद को और दूसरों को इसके लिए प्रेरित कर सकें कि वे वैसा जीवन जिएँ जैसा जीवन राम ने जिया था.
राजनीतिक प्रतीक राम बाँहें चढाते हैं और उनका रुख उग्र है. यह एक ऐसी बात है जो धार्मिक प्रतीकों के संदर्भ में देखी नहीं गई. राजनीतिक प्रतीक राम अकेले खड़े होते हैं और उनके साथ उनकी पत्नी नहीं होती है- यह ऐसी बात है धार्मिक ग्रंथों में जिसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती है. इस राम को किसी खास समय या खास दौर से बांधकर नहीं रखा जा सकता है. वे देश और काल के बंधन से आजाद हैं. वे हर वक्त हर कहीं हैं. वे हमारे अंदर हमारी आत्मा हैं, हमारी सच्ची पहचान, हमें अनुप्राणित करते हुए, हमें देखते हुए.
जब इस राम की समझ हो जाती है, तो राजनीतिक जीत की ख्वाहिश कमजोर पड़ जाती है. इन्सान के अन्दर सभी के लिए प्यार, बुद्धि और सहिष्णुता आ जाती है. धर्म सबसे ऊपर राज्य करने लगता है और हमारे अन्दर और हमारे आसपास रामराज्य की स्थापना हो जाती है.
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