- Home
- Chhattisgarh
- ‘साहित्य सृजन संस्थान’ के तत्वावधान में कवि सम्मेलन और ‘साहित्य सृजन न्याय रत्न सम्मान’ , ‘साहित्य सृजन श्रेष्ठ रचनाकार सम्मान’ और ‘साहित्य सृजन श्रेष्ठ काव्य पाठ सम्मान’ से सम्मानित हुए- नीलमचंद सांखला, ऋषि साव पटवारी और श्रीमती आशा झा.
‘साहित्य सृजन संस्थान’ के तत्वावधान में कवि सम्मेलन और ‘साहित्य सृजन न्याय रत्न सम्मान’ , ‘साहित्य सृजन श्रेष्ठ रचनाकार सम्मान’ और ‘साहित्य सृजन श्रेष्ठ काव्य पाठ सम्मान’ से सम्मानित हुए- नीलमचंद सांखला, ऋषि साव पटवारी और श्रीमती आशा झा.

• छत्तीसगढ़ आसपास न्यूज़ :
• रायपुर सिविल लाइन वृंदावन सभागार से डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’ की रिपोर्ट

‘साहित्य सृजन संस्थान’ के तत्वावधान में कवि सम्मेलन एवं सम्मान कार्यक्रम के मुख्यअतिथि थे नीलमचंद सांखला और अध्यक्षता की ‘साहित्य सृजन संस्थान’ के अध्यक्ष व सेवानिवृत प्रधान सत्र न्यायधीश वीर अजीत शर्मा थे. प्रारंभ में सरस्वती वंदना, दीप प्रज्ज्वलित और मंचासीन अतिथियों का स्वागत किया गया.
इस वर्ष का ‘साहित्य सृजन रत्न सम्मान’ नीलमचंद सांखला, ‘ साहित्य सृजन श्रेष्ठ रचनाकार सम्मान’ ऋषि साव पटवारी और ‘साहित्य सृजन श्रेष्ठ काव्य पाठ सम्मान’ दुर्ग की कवयित्री श्रीमती आशा झा को दिया गया. सभी सम्मानित होने वालों को शॉल, श्रीफल, मोमेंटो और प्रशस्ति देकर सम्मान किया गया.
▪️ काव्य संध्या में अंचल के प्रतिष्ठित कवियों द्वारा काव्य पाठ की कुछ झलकियां-

👉 उपस्थित रचनाकार
महा विस्फोट से पहले/असहनीय शांति होती है/अंधेरा ख़तम करने को, प्रभा की क्रांति होती है/शरा सन तान वध करने को हैं तैयार राघव भी/मगर सुग्रीव, बाली, रूप में ही भ्रांति होती है.
• विवेक भट्ट
कहता है क्या ज़माना मुझको फिकर नहीं है/अपनी हदें है मालूम, गिरने का डर नहीं है/सच के कबेलू टिकते, चाहे लाख तूफ़ाँ आयें/ओडूं फरेबी चूनर, मुझमें हुनर नहीं है.
• ममता खरे ‘मधु’
सुनंदा प्रेम की बातें बहुत कम करती है/पर जब भी करती है/उसके दिल पे ज़ख़म करती है/बड़ा इतराया करता था, जो साथ होने से हमारे/आज उसकी ही कमी, मेरी आँखों को नम करती है.
• सुनंदा शर्मा
रब में मत मुझको ढुंडे/फ़कत इंसा होती है/ना जाति ना धर्म वर्ग पर/माँ बंदे सिर्फ माँ होती है.
• प्रमदा ठाकुर
अब रूठने मनाने की कोई रस्म बाकी नही रही/कहाँ दें दलीले की अब कोई बज़्म बाकी नहीं रही/लिख देते थे पहले अनुवाद आसुंओं का भी हम/अब क्या कहें कि अब कोई नज़्म बाकी नही रही.
• अमृतांशु शुक्ला
सभी मतलब परस्तों और कुछ फ़ नकार लोगों से/खुदा महफूज़ रक्खे, सबको बद किरदार लोगों से/जो तेरे मुंह प तेरे हैं, जो मेरे मुंह प मेरे हैं/मुझे नफ़रत है दुनिया के इन्हीं मक्कार लोगों से.
• आलिम नकवी
माँ मैं हर जनम में, तेरी बेटी या बेटा बनूँगा/तू चींटी बनकर देख, मैं तेरी नन्हीं चींटीं बनूंगा/माँ तू एक बार पेड़ बनकर देख/मैं तेरे पेड़ का एक पत्ता बनूंगा/माँ मैं हर जनम तेरी बेटी या बेटा बनूंगा.
• नीलमचंद सांखला
याद में तेरे आँचल के ये सिर झुका हुआ रहता है/जीवन में सब कुछ होकर भी, कुछ खाली सा लगता है/सब दोबारा मिल सकते हैं, पर माँ नहीं मिल सकती/माँ तुम बहुत याद आती हो, माँ तुम बहुत याद आती हो.
• मुकेश कुमार सोनकर
गुलमोहर का रंग है, चटक लाल रतनार/हँस-हँस गाता गीत है, करे धरा श्रृंगार/केसर क्यारी कह रही, नखरैली गुलनार/जवाकुसुम का फूल है, कुसुमित गुच्छेदार.
• सुषमा पटेल
कविता एक रचना है, मेरे हृदय की/कविता एक परीक्षा है, मेरे विनय की/कविता एक संग्रह है, मन प्रवाह की/कविता एक धारा है, हिंदी सरिता की.
• वंदना ठाकुर
हारता नहीं कभी ममता
हारती नहीं कभी माँयें.
• अर्पणा अंजन
ख़ुद को बेहद उदास रखते हो/यानी हर किसी से आस रखते हो/रखना है सबको पास तुम्हें/क्या, ख़ुद को अपने पास रखते हो?
• अनिल राय ‘भारत’
जीवन को संघर्ष मानकर चलता है राही/उगता है सूरज की भांति, ढलता है राही/मैं भी हंसते-हंसते मुस्कुराते चलता हूँ/अपने ही जीवन से कठिनाइयों से लड़ता हूँ.
• ऋषि कुमार साव ‘पटवारी’
क्या लिखूँ? मैं क्या लिखूँ/अपनी इस विषयहीन कविता में क्या लिखूँ?/ बता ऐ मेरे पथ सहचारी, मैं क्या लिखूँ?/अमीरी में इठलाती, जनता का अभिमान लिखूँ?/गरीबी में रोती, जनता का पैग़ाम लिखूँ? /या सड़कों पर भीख मांगते, बच्चों का हाल लिखूँ? /बता ऐ मानवता के पुजारी, मैं क्या लिखूँ? /अपनी इस विषयहीन कविता में क्या लिखूँ?
• निवेदिता वर्मा ‘मेघा’
श्याम सुंदर कर न मोसे छल/मोसे कर नही तू छल/सुख हँसाते, दुख रुलाते, अजब तेरा खेल/बन जाए जीवन सार्थक, जब दोनों का हो मेल/दिखते कभी छिप जाते हो, रह जाती आँखें मल/मोसे कर नही तू छल.
काव्य पाठ करती हुई आशा झा
• आशा झा
आँखों में उसको नींद या बाँहों में कोई है/या बालमा की याद में बिस्तर में खोई है/आदत लगाके हमको, अपनी मीठी बात का/जाने वो किसकी याद में रोई या खोई है.
• पुष्पराज गुप्ता
जो उसूलों की बात करते हैं/आदमी ऐसे घट रहे हैं बहुत/फैलते जा रहे हैं शह मगर,
गाँव अपने सिमट रहे हैं बहुत.
• सुखनवर हुसैन ‘रायपुरी’
बूढ़ा-कोढ़ी और लाश देख/शहजादे ने सन्यास लिया/बीवी-बच्चे और राजघाट/छोड़ा जाकर वनवास लिया/सिद्ध।र्थ नाम का शहजादा/इस तरह जगत प्रख्यात हुआ/भगवान बुद्ध गौतम कहकर/संसार ने उनके चरण छु आ.
• उमेश कुमार सोनी ‘नयन’
क्या लिखूँ माँ मैं आपके लिए/शब्द कम और आप विशाल वजूद लिए/नहीं कर पायेगा कोई वर्णन शब्द लिए/माँ तो बस माँ है, ममता की छाँव में बच्चों को लिए…
• भारती यादव ‘मेघा’
आँखें सूनी दिल भी बंजर अपना है/फिर भी जलती रात का मंज़र अपना है/नर्म मुलायम घास पे पहले चलते थे/अब तो जलती रेत मुकद्दर अपना है…
• जावेद नदीम
हरी दूब वह उपवन वाली/केसर वाली क्यारी थी/निंदिया रानी झट आ जाती/माँ जब लोरी गाती थी…
• विजया सुनील पांडे
टूटा तेरा अंश-अंश, अरे दुष्ट पापी कंस/खत्म होगा तेरा वंश, कृष्णा का ऐलान है…
• अमिताभ दीवान
विकास की परिभाषा का यह कैसा भ्रम है/वेताल मनाएं खुशियाँ, उदास खड़ा विक्रम है/सत्य पर ही जब, प्रश्न चिन्ह लग जाते हैं/तब लगता सारा जग दुर्वासा का आश्रम है…
• योगेश शर्मा ‘योगी’

संचालन ‘साहित्य सृजन संस्थान’ के सचिव योगेश शर्मा ‘योगी’ और महिला प्रकोष्ठ की अध्यक्षा श्रीमती ममता खरे ‘मधु’ ने किया
[ •रिपोर्ट, डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’ ]
०००
chhattisgarhaaspaas
विज्ञापन (Advertisement)