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- पुस्तक समीक्षा : सांसारिकता की पृष्ठभूमि पर उगा सामाजिक तरुवर, डॉ. संजय दानी लिखित ‘रिश्तों की बुनियाद’ : समीक्षक- टीकेश्वर सिन्हा ‘गब्दीवाला’
पुस्तक समीक्षा : सांसारिकता की पृष्ठभूमि पर उगा सामाजिक तरुवर, डॉ. संजय दानी लिखित ‘रिश्तों की बुनियाद’ : समीक्षक- टीकेश्वर सिन्हा ‘गब्दीवाला’

गद्य की कथात्मक विधा कहानी के संदर्भ में कथा सम्राट मुंशी प्रेमचंद ने लिखा है- “कहानी में विस्तृत विश्लेषण की गुँजाइश नहीं होती। यहाँ हमारा उद्देश्य सम्पूर्ण मनुष्य को चित्रित करना नहीं, वरन् उसके चरित्र का अंग दिखाना है।” स्पष्ट है कि मुंशी प्रेमचंद के कहानी से संदर्भित शब्दों के संक्षिप्तीकरण ही कहानी को उपन्यास से पृथक करता है। कहानी के समस्त तात्विक तथ्यों का समावेश उसकी सम्पूर्णता को स्पष्ट करता है। कहानी मानवीय जीवन मूल्यों के सारतथ्यों को उजागर करती है। कहानी में समाज की वास्तविकता का सांसारिक पदार्पण होता है। जीवन के विभिन्न पहलुओं में मनुष्यता वास करती है, जो अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों में परिलक्षित होती है। किसी सामाजिक वृत्तांत का लघुरूप शब्द-सोपान ही कथानक होता है; और कथानक से ही कहानी की विस्तृत संरचना तैयार होती है। कथानक का प्रथम भाग कौतूहलपू्र्ण हो व मध्य में रोचकता होने पर ही अंत तक कहानी की सजीवता बनी रहती है। देश-काल के मुताबिक चरित्रों के सटीक संवाद प्रस्तुति कहानी को आनंददायक बनाती है। देशकाल के ही अनुसार सरल-सहज चारित्रिक भाषा से कहानीकार के द्वारा निज शैली के जरिए अपने लेखन उद्देश्य को प्राप्त कर लेना उनकी कामयाबी को दर्शाता है।
हिंदी साहित्य के इतिहास में कहानी लेखन का विकासक्रम भारतेन्दु युग से प्रारंभ होता है। यह विकासक्रम प्रारम्भिक काल, विकास काल एवं स्वातंत्र्योत्तर काल में विभक्त है। सभी कालों में एक से बढ़कर एक कहानियाँ लिखी गयी; एक से बढ़कर एक कहानीकार हुए। अब मैं स्वातंत्र्योत्तर काल के अंतर्गत जिस कहानीकार और उनके कहानी संग्रह का जिक्र करने जा रहा हूँ, वे हैं छत्तीसगढ़ प्रांत के दुर्ग (जिला) शहर निवासरत डॉ. संजय दानी का, जिन्होंने हिंदी साहित्य जगत को अपना “रिश्तों की बुनियाद” कहानी संकलन सौंपा है।
छत्तीसगढ़ के जाने-माने साहित्यकार रवि श्रीवास्तव, मुकुंद कौशल एवं सरला शर्मा के इस संग्रह से सम्बंधित मंतव्य से श्रीगणेश हुए “रिश्तों की बुनियाद” में कहानीकार डॉ. संजय दानी जी ने अपनी प्रथम कहानी किस्मत अपनी-अपनी में रायपुर निवासरत सेठ रतनचंद अपने दोनों पुत्र नीलचंद व पुखराज के पैतृक कारोबार की उत्तरोत्तर बढ़ोतरी पर बहुत खुश हैं। दूसरी तरफ छोटे पुत्र मोती लाल की पठन-पाठन व लेखन अभिरुचि उन्हें चिंतित करती है। मोतीलाल के साहित्य व शिक्षा के प्रति रूझान तत्कालीन समाज में उन्हें एक नामी शख्स के रूप स्थापित करता है। मोतीलाल अपनी पत्नी की अवहेलना को नजरंदाज करते हुए अपनी लेखकीय प्रतिभा को यथावत रखता है। पुत्र कृष्णा अपने पिता मोतीलाल के मन-वांच्छित कार्यों के कभी आड़े नहीं आता। मोतीलाल के मरणोपरांत उनकी अंतिम यात्रा में लोगों के हुजूम से शिक्षा एवं साहित्य प्रतिष्ठा सामाजिक रूप ले लेता है।
“शुभलांगी” जाति-धर्म पर व्यंग्य कसती हुई कथानक के साथ पठनीय बन पड़ी है। वेल-क्वालिफाइड व मल्टिटैलेंटेड् युवक विभूति अपने पिता हरिनारायण मिश्रा की ज्योतिर्विद्या के परिपालन को स्वीकारते हुए कई बार स्वयं विपत्तियों से घिर जाते हैं। लेकिन अंततः उन्हें विपत्तियों से छुटकारा मिलता ही है। गंगा-जमुना संस्कृति के अनुरूप हिंदू-मुस्लिम वैवाहिक जीवन के जरिए आदमियत के पौधे उगते ही दकियानूसी की बंजर धरा लहलहा उठती है।
जीवन को जीना तभी सार्थक लगता है, जब जीवन का आत्मिक प्रतिफल संतोषप्रद हो, परन्तु यह भी सच है कि दिलीचाहत प्रतिफल की तलाश भी आनंदित जीवन को दर्शाता है। इसी प्ररिप्रेक्ष्य में कहानीकार संजय दानी जी की कहानी “जीयो और जीने दो” दो सगे भाइयों के बीच पिता की जायदाद के बटवारे से असंतुष्टि की कहानी है। बेशुमार दौलत होने के बावजूद उनसे संतोष कोसो दूर है, पर समय आने पर सुरेश्वर उर्फ सुरेश जैनमुनि क्षीरसागर के सानिध्य में आकर धन-सम्पत्ति के प्रति अरुचि होने पर उसके जीवन में एक नया मोड़ आता है, जो बड़े भाई महेश्वर उर्फ महेश के पतन को रोकने पर कारगर सिद्ध होता है।
धन-सम्पत्ति आत्मिक रिश्तों की बुनियाद को हिला देती है। पर लेखक दौलत के कुप्रभाव से आदमियत को बचा पाने में सफल हुए हैं। “राजकुमार” कहानी एक धनाढ्य युवक की प्रवृत्ति को उजागर करती है। स्वयं के प्राण संकट में पड़ने एवं नया जीवन मिलने पर और उसके हृदय परिवर्तन की दशा में कहानीकार की लेखनी ने कमाल किया है। एक औलाद को माँ-बाप के दर्द का अहसास तब होता है जब उसकी माँ-बाप बनने की बारी आती है। साथ ही ; माँ-बाप के न होने पर ही उनकी अहमियत समझ आती है। संग्रह के शीर्षक कहानी “रिश्तों की बुनियाद” में अजय और आभा के सफल दाम्पत्य में दोनों का अहम् आड़े आता है, जो दोनों के अलगाव का कारण बनता है। दाम्पत्य का अलगाव पारिवारिक सम्बंधो को धूमिल करता है जिससे आगामी पीढ़ी प्रभावित होती है। उन्हें सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं मिल पाती, जिनके पास वे हकदार होते हैं। लेखक ने इन सबका जिक्र करते हुए एक सुंदर घर-संसार सृजन करने का सामाजिक संदेश दिया है।
कहानीकार ने कहानी “रामभरोसे के भारतीय न्यायालय” में देश की न्याय व्यवस्था की अपंगता का जिक्र किया है। सरकारी महकमे के अधिकारियों द्वारा अपने अधीनस्थ कर्मचारियों पर किये जाने वाले मानसिक प्रताड़ना एवं उसके दुष्परिणाम को लेखक ने स्पष्ट किया है। रामभरोसे जीवन भर न्याय की आस लगाये रहता है, और अंत में अपनी जमीन को न्यायालय को दान करता है। इसीलिए तो उनका चरित्र अनुकरणीय बन पड़ा है।
डॉ. संजय दानी जी की अंतिम कहानी “प्रायश्चित” एक अमीर शख्स बनवारी लाल की कहानी है। कहानी के जरिए लेखक ने गो-धन के व्यापारिक प्रचलन पर कुठाराघात किया है।
छत्तीसगढ़ के आधुनिक हिंदी साहित्य के गद्य विधा के अंतर्गत उपन्यास व कहानी लेखन में पारंगत डॉ. संजय दानी जी पेशे से एक शल्य चिकित्सक (नाक कान एवं गला रोग विशेषज्ञ) हैं। ग्रामीण परिवेश से परिचित एक नगर वासी शख्स हैं। अतएव उनकी सभी कहानियाँ न सिर्फ छत्तीसगढ़ी ग्राम्य; अपितु नगरीय वातावरण को स्पर्श करती हैं। और इसीलिए उन्होंने दोनों परिवेश के सामाजिक कुरीतियों की शल्यक्रिया कर सुधारवादी मरहम-पट्टी की है। दानी जी की कहानियों के कथानक में कहानी के सभी तत्व सटीक हैं। घर, परिवार, समाज, शिक्षा, संस्कार जैसे तथ्य कथानक में समाविष्ट हैं। कहानियों के कथोपकथन या संवाद आशान्वित प्रभावशाली नहीं लगते। कहानी में पात्र का संवाद स्पष्ट व पृथक रूप होने चाहिए, जिससे पाठकमन रमा रहे। वाक्य संरचना के अनुसार संवाद प्रस्तुति अप्रत्यक्ष कथन (इन्डायेक्ट स्पीच) रूप में हैं, जिनमें व्याकरणिक त्रुटियाँ दिखाई देती है, लेकिन पाठक को भाव समझ पाने में दिक्कत भी नहीं होती। ग्रामीण व शहरी देश-काल के मुताबिक पात्र-चयन कहानियों के कथानक के अनुकूल है। इससे पाठक की पठन-अभिरुचि कहानी के अंत तक बनी रहती है। एक चिकित्सक-कहानीकार डॉ. संजय दानी जी की कहानियों में आँचलिक छत्तीसगढ़ी हिंदी भाषा के साथ मौलिक ठेठ छत्तीसगढ़ी व चिकित्सकीय शब्दों का समावेश लाजिमी है। मुहावरों की मौजूदगी से कहानियाँ रमणीय लगती हैं। अन्य भाषाओं के शब्दों के प्रयोग से लेखन-शैली बड़ी अनूठी बन पड़ी है। लेखक डॉ. संजय दानी जी ने सांसारिकता की पृष्ठभूमि पर रिश्तों की बुनियाद को सामाजिक तरुवर के रूप में रोपित किया है। मुझे उम्मीद है कि संकलन को हिंदी साहित्य जगत में उत्कृष्ट स्थान प्राप्त होगा। इससे पाठक वर्ग और साहित्य के बीच रिश्तों की बुनियाद दृढ़ होगी। लेखक एक बहुत ही सफल कहानीकार सिद्ध होंगे.

टीकेश्वर सिन्हा ‘ गब्दीवाला ‘ समीक्षक
• संपर्क : घोटिया बालोद छत्तीसगढ़ • 97532 69282
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chhattisgarhaaspaas
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