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- इस समय जनता के लिए आवश्यक है कि वे युद्ध विराम की माँग करें! युद्ध नहींं, बल्कि जन एकता और सामाजिक सौहार्द ही आतंकवाद को हरा सकते हैं – पी जे जेम्स, महा सचिव भाकपा [माले] रेड स्टार
इस समय जनता के लिए आवश्यक है कि वे युद्ध विराम की माँग करें! युद्ध नहींं, बल्कि जन एकता और सामाजिक सौहार्द ही आतंकवाद को हरा सकते हैं – पी जे जेम्स, महा सचिव भाकपा [माले] रेड स्टार

8 मई 2025 को हुई सर्वदलीय बैठक में सरकार ने स्पष्ट रूप से यह घोषणा की कि उसके “गैर-आक्रामक” सैन्य हमले ने अपने “इरादे और उद्देश्य” प्राप्त कर लिए हैं। यह भी बताया गया कि सरकार को “स्थिति को और बिगाड़ने में कोई दिलचस्पी नहीं है।” लेकिन वर्तमान में, भारत और पाकिस्तान के बीच के ये तथाकथित “गैर-आक्रामक हमले” एक पूर्ण युद्ध की ओर बढ़ते दिख रहे हैं। यह हर युद्ध का स्वाभाविक परिणाम है — जो युद्ध शुरू करता है, वह उसे रोक नहीं सकता।
इस समय, जहां जम्मू-कश्मीर की जनता सबसे अधिक प्रभावित है, वहीं पाकिस्तान से सटे अन्य राज्य भी इस बढ़ती हुई युद्धस्थिति के बोझ को झेल रहे हैं। जानमाल की हानि और अकथनीय पीड़ा मुख्यतः जम्मू-कश्मीर में हो रही है, लेकिन उसका असर अब अन्य स्थानों पर भी फैल रहा है। पाकिस्तान में स्थिति और भी भयावह हो सकती है। ‘सैन्य-राज्य’ और तथाकथित ‘विफल राष्ट्र’ कहे जाने वाले पाकिस्तान ने पहले ही अपनी सेना को पूर्ण निर्णय लेने का अधिकार दे दिया है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि पहलगाम में हुई आतंकवादी घटना के बाद,भारत, जिसे “लोकतंत्र की जननी” कहा जाता है, ने भी अपनी सेना को हमलों के फैसले लेने की पूरी छूट दे दी है। यह सैन्यवाद (militarism) को समर्थन देना है — वह भी उस समय में, जब मानवता के सामने खड़े किसी भी संकट का समाधान सैन्य मार्ग से नहीं हो सकता, चाहे वह आतंकवाद ही क्यों न हो!
इस बीच, भले ही युद्ध की औपचारिक घोषणा नहीं हुई है, लेकिन गोदी मीडिया और कॉर्पोरेट-स्वामित्व वाले टीवी चैनल युद्ध के लिए सहमति तैयार करने में दिन-रात लगे हुए हैं। जहां सरकार की ओर से झूठी खबरों, युद्धोन्माद और युद्ध की उन्मादी मानसिकता पर कोई लगाम नहीं लगाई जा रही, वहीं स्वतंत्र सोच को सामने रखने वाली वेब मैगज़ीनों और पोर्टलों को सेंसर या ब्लॉक करने के लिए सरकारी निगरानी सक्रिय है। जो लोग असहमति या भिन्न मत व्यक्त कर रहे हैं, उन्हें चुप कराया जा रहा है, यहाँ तक कि उन्हें गिरफ्तार करके जेल में डाला जा रहा है। इसी समय, पूरे भारत में मुस्लिमों और कश्मीरी लोगों (यहाँ तक कि विद्यार्थियों) के विरुद्ध अलगाव, प्रताड़ना और घृणा फैलाने की घिनौनी फासीवादी कोशिशें भी चरम पर हैं।

ऐसे समय में, जनता को — विशेषकर उस बहुसंख्यक मेहनतकश और उत्पीड़ित वर्ग जो भोजन, दवा और आश्रय जैसी बुनियादी जरूरतों से भी वंचित है — आगे आकर मजबूती से कहना चाहिए: ‘युद्ध नहीं चाहिए’। युद्ध ,शासकों के लिए एक सुनहरा अवसर होता है — जनता का ध्यान उनकी असली समस्याओं से भटकाने के लिए। युद्ध साम्राज्यवादी ताकतों जैसे अमेरिका और चीन के सैन्य-उद्योगिक गठजोड़ों के लिए भी मुनाफा कमाने का मौका होता है, जिन पर भारत और पाकिस्तान दोनों हथियारों के लिए निर्भर हैं। और इस युद्ध का सारा बोझ जनता पर ही पड़ेगा — बढ़ती महंगाई, टैक्स, सामाजिक सुरक्षा में कटौती, आदि के रूप में — जिसे ‘युद्ध आधारित संसाधन जुटाने’ के नाम पर थोपा जाएगा।
इसलिए जरूरी है कि तत्काल कूटनीतिक प्रयास किए जाएं और सार्थक संवाद की पहल की जाए ताकि यह सैन्य आक्रामकता
रुके। लेकिन वर्तमान नव-फासीवादी माहौल में, जैसा हमने यूक्रेन युद्ध और फिलिस्तीन पर ज़ायोनी इजरायल के हमलों के दौरान देखा, अंतरराष्ट्रीय समुदाय से केवल बयानबाज़ी के सिवा कोई ठोस और ईमानदार पहल नहीं हो रही है। ऐसे में यह जनता का दायित्व बनता है — चाहे उनका वैचारिक या धार्मिक दृष्टिकोण कुछ भी हो — कि वे देश के सभी प्रगतिशील और लोकतांत्रिक ताकतों के साथ मिलकर एकजुट हों और सरकार को तत्काल युद्धविराम और शांति की दिशा में कदम उठाने के लिए बाध्य करें। आतंकवाद को केवल जनता की एकता और सामाजिक सौहार्द से ही जड़ से मिटाया जा सकता है।
इस समय की सबसे बड़ी ज़रूरत है — एक व्यापक और शक्तिशाली जन-आंदोलन जो युद्ध को रोक सके!
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chhattisgarhaaspaas
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