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मुलाकात और भेंट : ‘श्री चतुर्भुज मेमोरियल फाउंडेशन’ के संस्थापक अरुण कुमार श्रीवास्तव से कवि प्रकाशचंद्र मण्डल और प्रदीप भट्टाचार्य ने सौजन्य मुलाकात की : प्रकाशचंद्र मण्डल ने अपनी नव प्रकाशित काव्य संग्रह ‘फिर भी चलना होगा’ उन्हें सप्रेम भेंट किया

▪️ {बाएँ से} प्रदीप भट्टाचार्य, अरुण कुमार श्रीवास्तव और प्रकाशचंद्र मण्डल
‘छत्तीसगढ़ आसपास’ [भिलाई]
विगत दिनों बांग्ला-हिंदी के लब्ध प्रतिष्ठत कवि व नाट्यकार प्रकाशचंद्र मण्डल एवं ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ के संपादक व प्रगतिशील कवि प्रदीप भट्टाचार्य ने ‘श्री चतुर्भुज मेमोरियल फाउंडेशन’ के संस्थापक संयोजक व समाजसेवी अरुण कुमार श्रीवास्तव से सौजन्य मुलाकात की. इस मुलाकात में प्रकाशचंद्र मण्डल ने अपनी नव प्रकाशित काव्य संग्रह ‘फिर भी चलना होगा’ सप्रेम भेंट किया. अरुण श्रीवास्तव ने प्रकाशजी की साहित्यिक यात्रा पर कहा कि आप यूँ ही अनवरत लिखते रहें. मेरी अंतर्मन से आपको हार्दिक शुभकामनाएं है.
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‘फिर भी चलना होगा’
[ हिंदी काव्य संग्रह ]
– कृतिकार प्रकाशचंद्र मण्डल

‘फिर भी चलना होगा’ प्रकाशचंद्र मण्डल की दूसरी हिंदी काव्य संग्रह है. इसके पहले इनकी पहली हिंदी काव्य कृति ‘शब्दों की खोज में’ थी. शब्दबितान प्रकाशनी कोलकाता से प्रकाशित इस संग्रह में कुल-64 कविताएँ प्रकाशित हुई है. मुखपृष्ठ परिकल्पना हर्ष देवांगन और अनुभव कुमार मण्डल का है एवं प्रकाशक हैं- डॉ. सुबिदिता कुंडू. कवि प्रकाशचंद्र मण्डल ने इस संग्रह को स्व. माता-पिता को उत्सर्ग करते हुए पत्नी सुमीता मण्डल, पुत्री प्रियंका एवं पुत्र अनुभव को समर्पित किया है.
प्रकाशचंद्र मण्डल की हिंदी के 2 काव्य संग्रह के आलावा बांग्ला में 4 संग्रह प्रकाशित हो चुकी है. क्रमवार : तुमी एले ताई/एक फालि रोद्दुर/आमाके उन्मुक्त करो और कोखोन जे कोन कथा कबिता होए जाए.
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अरुण कुमार श्रीवास्तव के आग्रह पर प्रकाशचंद्र मण्डल ने ‘फिर भी चलना होगा’ संग्रह से अपनी एक-दो रचना का पाठ किया, जिसे हम ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ के पाठकों के लिए प्रकाशित कर रहे हैं-
• मेरी माँ की महिमा
एक साधारण सा बीज/जो धरती के गर्भ में दबकर/चारों ओर से आए भीषण दबाव में/एक विशाल वृक्ष का निर्माण करती है/ऐसी ही मेरी मां है, जो/एक जादूगरनी की तरह/मेरे सपनों को- असल रूप देती है/मुझे वृक्ष की तरह दृढ़ बनाती है/मेरे मन में उपजी सारी समस्याओं को/पता नहीं वह कैसे जान जाती है/मेरी इच्छा अनिच्छा को पल में सुलझाती है/मेरी मां छाए की तरह है/सूरज की तेज गर्मी से निजात दिलाती है/कोमल बाहों में जकड़कर/हमें नरम बिछोना में सुलाती है/माँ मेरी दु:खों के पलों के विष को/अमृत की तरह खुद पी जाती है/और मुझे सुख के सपनों में/सैर कराती है- ऐसी ही है मेरी माँ/माँ तुझे मेरा बारंबार प्रणाम/तुझ जैसी मां मुझे/हर जन्म में मिले/यही मेरी आखिरी ख्वाहिश है.
• फिर भी चलना होगा
लंबे कद वाला एक वृक्ष/रास्ते में चलता हुआ/देखा जा सकता है/लंबाई और उम्रदराज़ के कारण/कमर से झुका हुआ/प्रतिदिन वह ऐसे ही चलता है/कभी ठोकर खाकर गिर पड़ता है/कभी थककर बैठ जाता है/जीवन भर का दायित्वों का बोझ/उठाते-उठाते थक सा गया है/कमबख्त़ भूख को भी/साथ लिए चलता है/वह उम्रदराज़ वृद्ध/चलता रहता है निरंतर/ढलती उम्र में हर एक/शि राएं जाग उठी है/चेहरे का चमड़ा झुलस सा गया है/चमकती आँखों का मणी भी/किसी कटोरे में समा गया है/रीढ़ की हड्डी झुक गयी है/धनुष की तरह/फिर भी उसे चलना होगा निरंतर/कर्तव्यों का बोझ ढोते-ढोते/सिलसिला कब रुकेगा/पता नहीं! फिर भी चलना होगा/चलते ही रहना होगा.
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अरुण कुमार श्रीवास्तव ने कवि और कृति पर प्रकाश डालते हुए बोले…
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chhattisgarhaaspaas
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