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- ‘बंगीय साहित्य संस्था’ के तत्वावधान में कॉफी विथ साहित्यिक विचार-विमर्श आड्डा- 80 : साहित्य चर्चा और काव्य पाठ में शामिल हुए- बानी चक्रवर्ती, स्मृति दत्त, समरेंद्र विश्वास, प्रकाशचंद्र मण्डल, दुलाल समाद्दार, प्रदीप भट्टाचार्य, बृजेश मल्लिक और आलोक कुमार चंदा
‘बंगीय साहित्य संस्था’ के तत्वावधान में कॉफी विथ साहित्यिक विचार-विमर्श आड्डा- 80 : साहित्य चर्चा और काव्य पाठ में शामिल हुए- बानी चक्रवर्ती, स्मृति दत्त, समरेंद्र विश्वास, प्रकाशचंद्र मण्डल, दुलाल समाद्दार, प्रदीप भट्टाचार्य, बृजेश मल्लिक और आलोक कुमार चंदा

▪️ [बाएँ से] 👉 दुलाल समाद्दार, समरेंद्र विश्वास, आलोक कुमार चंदा, प्रदीप भट्टाचार्य, प्रकाशचंद्र मण्डल, स्मृति दत्त, बानी चक्रवर्ती और बृजेश मल्लिक
‘छत्तीसगढ़ आसपास’ [भिलाई निवास के इंडियन कॉफी हाउस : 24 मई, 2025]

विगत 60 वर्षों से इस्पात नगरी भिलाई में बांग्ला साहित्यिक, संस्कृति एवं सांस्कृतिक उद्देश्य को लेकर संचालित ‘बंगीय साहित्य संस्था’ प्रति सप्ताह ‘कॉफी विथ साहित्यिक विचार-विमर्श आड्डा’ का आयोजन संस्था के सदस्य करते हैं. इस कड़ी में आड्डा-80, 24 मई को भिलाई निवास के इंडियन कॉफी हाउस में सम्पन्न हुई. इस विचार-विमर्श में शामिल हुए- ‘बंगीय साहित्य संस्था’ की सभापति एवं बांग्ला की देशव्यापी चर्चित लेखिका, कवयित्री बानी चक्रवर्ती, उप-सभापति एवं वयोवृद्ध लेखिका,कवयित्री स्मृति दत्त, ‘मध्यबलय’ के संपादक,कवि दुलाल समाद्दार, लब्धप्रतिष्ठित कवि समरेंद्र विश्वास, संस्था के उप-सचिव एवं कवि प्रकाशचंद्र मण्डल,’छत्तीसगढ़ आसपास’ के संपादक एवं प्रगतिशील कवि प्रदीप भट्टाचार्य, राष्ट्रवादी कवि बृजेश मल्लिक और साहित्यिक व सामाजिक चिंतक आलोक कुमार चंदा.
आज के ‘कॉफी विथ साहित्यिक विचार-विमर्श आड्डा- 80’ की अध्यक्षता बानी चक्रवर्ती और विशिष्ट अतिथि स्मृति दत्त, समरेंद्र विश्वास थे. संचालन प्रकाशचंद्र मण्डल ने किया.
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बांग्ला भाषा में प्रकाशित साहित्यिक लिटिल पत्रिका ‘मध्यबलय’ और पत्रिका के संपादक दुलाल समाद्दार का सम्मान-

बानी चक्रवर्ती ने प्राप्त सम्मान का उल्लेख करते हुए कही ,यह संस्था के लिए गर्व की बात है कि ‘मध्यबलय’ पत्रिका को ‘आरात्रिक साहित्य सम्मान-2025’ से सम्मानित किया गया है. ‘आरात्रिक’ पत्रिका कोलकाता से प्रकाशित होती है और इस पत्रिका के संपादक दुर्गादास मिदया हैं. यह सम्मान ‘मध्यबलय’ के संपादक दुलाल समाद्दार को पत्रिका की निरंतरता व उत्कृष्टता के लिए प्रदान किया गया. उपस्थित सदस्यों ने दुलाल दा को बधाई दी.
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‘छत्तीसगढ़ आसपास’ के संपादक, प्रगतिशील कवि प्रदीप भट्टाचार्य ने आज के संदर्भ में साहित्य के प्रति अपने विचार में बोले-

आजकल तथाकथित साहित्यकार अपने नाम के साथ अंतरराष्ट्रीय/डॉक्टर लगा रहे हैं. मैं यह कहना चाहता हूँ ऐसे साहित्यकारों को लेखन/रचना में प्रतिबद्ध होकर लिखने-पढ़ने में ध्यान देना चाहिए. अंतर्राष्ट्रीय या डॉक्टर लिखकर आप महान नहीं हो जावोगे. आपकी रचना ही आपको कालजयी बनायेगी. मुंशी प्रेमचंद, विश्वप्रसिद्ध कथाकार रहे, उन्होंने कभी अपने नाम के आगे अंतरराष्ट्रीय और डॉक्टर नहीं लिखा और ना ही पुरुस्कार/सम्मान के पीछे भागे. उनकी {मुंशी प्रेमचंद}रचनाओं के कारण आज भी वे याद किए जाते हैं, ना कि अंतरराष्ट्रीय/डॉक्टर. मैं पूछना चाहता हूँ कि तथाकथित कवि/लेखक नाम के आगे डॉक्टर लिखते हैं !? क्या वे वाकई में वे डॉक्टर हैं. डॉक्टर एक तो एमबीबीएस {डॉ.} होते हैं और पीएचडी प्राप्त ही {डॉ.} लिख सकते हैं. फर्जी संस्थान जो पैसे लेकर फर्जी डॉक्टर की उपाधि देते हैं, सरकार को इस पर कार्यवाही करनी चाहिए. छत्तीसगढ़ से लब्धप्रतिष्ठित लेखक विनोद कुमार शुक्ल को इस वर्ष देश का सर्वोच्च सम्मान ‘ज्ञानपीठ पुरुस्कार’ से सम्मान किया गया. जिनकी रचना विश्वप्रसिद्ध है, वे कभी नाम के आगे अंतरराष्ट्रीय और डॉक्टर नहींं लिखते. ऐसे तथाकथित साहित्यकार को सीख लेने की आवश्यकता है?
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काव्यपाठ हुआ ,जिसका संचालन प्रकाशचंद्र मण्डल ने किया-

{बाएँ से चित्र-1} प्रकाशचंद्र मण्डल, बृजेश मल्लिक और समरेंद्र विश्वास
{बीच में} बानी चक्रवर्ती, स्मृति दत्त
{अंतिम लाइन में} आलोक कुमार चंदा, प्रदीप भट्टाचार्य और दुलाल समाद्दार
स्मृति दत्त ने ‘छोबी'{चित्र}, अनुवाद कविता ‘आतंक व अराजकता’/बानी चक्रवर्ती ने ब्लूचिस्तान के कवि की अनुवाद कविता ‘निरूत्व हाँसी’, ‘चोलते थाकी’और ‘शेष नई’/बृजेश मल्लिक ने सेवानिवृत्त के संदर्भ में लिखी कविता ’60 के बाद’/समरेंद्र विश्वास ने अनुगोल्पो {लघु कथा} ‘बै.. बै.. मैं.. मैं’/आलोक कुमार चंदा ने रुद्र किशोर कवि की कविता ‘शेष बॉयोसे भालोभाषा’ {अंतिम उम्र में प्यार} और प्रकाशचंद्र मण्डल लिखित कविता ‘चाँदनी रातें’/प्रकाशचंद्र मण्डल ने ‘जीवन रे किछु कॉथा आमाय किछु डाके’ {जिंदगी की कुछ बातें मुझे बुलाती है} और ‘नयनोंर नील’ {आँखों में पानी} और प्रदीप भट्टाचार्य ने डेल कार्नेगी लिखित सूक्तियाँ को पढ़कर सुनाया कि आज साहित्य की परिभाषा कुछ ऐसी हो गई-
‘यदि आप शत्रु चाहते हैं/तो अपने मित्रों से श्रेष्ठ बनें/किंतु- यदि आप मित्र चाहते हैं/तो अपने मित्रों को/अपने से श्रेष्ठ बनने दें’ और ‘आपका अपना रास्ता है/मेरा अपना रास्ता है/जहाँ तक सही रास्ते/ और/एकमात्र रास्ते की बात है/तो- ऐसा कोई रास्ता नहीं है’.

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आभार व्यक्त बृजेश मल्लिक ने किया.
[ • रिपोर्ट एवं प्रस्तुति : प्रदीप भट्टाचार्य ]
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chhattisgarhaaspaas
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