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‘ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान’ पर कृति-चर्चा सम्पन्न : कैलाश बनवासी की कहानियां समय को लांघती हैं- प्रो. जयप्रकाश : समयबिद्ध विशिष्ट कथाकार हैं कैलाश बनवासी- प्रो. सियाराम शर्मा : कैलाश जी के इस संग्रह की कहानियां सीधी-सरल, मर्म को छुती हुई और संवेदनशील हैं. इन्हें समझने और समझाने के लिए आलोचना की जरूरत भी नहीं है- लोकबाबू

‘छत्तीसगढ़ आसपास’ [रिपोर्ट, सुरेश वाहने]
जन संस्कृति मंच, दुर्ग-भिलाई के तत्वावधान में देश के चर्चित कथाकार उपन्यासकार कैलाश बनवासी की कृति ‘ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान’ पर ‘हिंदी डिजिटल कक्ष’, कल्याण स्नातकोत्तर महाविद्यालय भिलाई में सम्पन्न हुई।
कल्याण स्नातकोत्तर महाविद्यालय के सहयोग से आयोजित इस कार्यक्रम की शुरुआत कथाकार कैलाश बनवासी द्वारा अपनी पसंदीदा कहानी ‘लुप्त होता इन्द्रधनुष’ के पाठ से हुई। उन्होंने अपनी कृति पर वक्तव्य देते हुए कहा कि मेरी कहानियाँ छत्तीसगढ़ के जनजीवन पर देश काल की स्थितियाँ कैसा असर डाल रही है, उनके राग-रंग, दुःख-सुख आदि को प्रकट कर सकने की कोशिशें हैं। मौजूदा संचार क्रांति, तकनीक, कार्पोरेट पूंजी और राजनीति ने मनुष्य की संवेदना पर गहरा असर डाला है। अब लोग साहित्य, कला या संस्कृति से तमाम कारणों से दूर हो गये हैं, कैरियरवादी एप्रोच हावी है और उपभोक्तावाद की गहरी चपेट में है। साहित्य मनुष्य की मनुष्यता, सहयोग, पारस्परिकता बचाये रखने का काम करता है और कल के बेहतरी का स्वप्न पाठकों में जगाता है। मेरी कहानियों का यही केन्द्रीय लक्ष्य है।
वरिष्ठ आलोचक प्रो. सियाराम शर्मा ने कहा कि कैलाश बनवासी की कहानियाँ स्थितियों की कहानियाँ हैं। पूरी कहानियों के परिदृश्य में एक समयबिद्ध कथाकार के रूप में उनकी विशिष्ट पहचान बनती है। भूमंडलीकरण के दौर में उन्होंने अपनी श्रेष्ठ कहानियाँ दीं। ‘ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान’ की कहानियाँ सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने की प्रक्रिया और साम्प्रदायिक माहौल की गहराई से पूरी संवेदनशीलता के साथ पड़ताल करती हैं।
कृति-चर्चा की अध्यक्षता करते हुए आलोचक जयप्रकाश ने महत्वपूर्ण टिप्पणियाँ दीं- “कहानी साहित्यिक विधाओं में सबसे कठिन विधा है। कहानी-कला समय को फलांगने की कला है, सार्वभौमिकता संवेदना की ऊँचाई तक पहुँचाने की कला है। ‘उमस’ और ‘लुप्त होता इंद्रधनुष’ इस संग्रह की श्रेष्ठ कहानियाँ हैं। ये कहानियाँ अपने समय, स्थान से बंधी नहीं हैं और देश-काल का अतिक्रमण करने की क्षमता रखने वाली कहानियाँ हैं। इनमें विषयों का दबाव नहीं है। कैलाश बनवासी की कहानियों को पढ़ते हुए रोमांच पैदा होता है।”
कथाकार ऋषि गजपाल ने संबोधित करते हुए कहा कि कैलाश बनवासी की कहानियाँ गाँव और शहर के आवागमन की कहानियाँ हैं। उन्होंने तीर्थयात्रा, उमस और शोक कहानी पर प्रभावशाली टिप्पणियाँ दीं।
युवा कवि डॉ. अंजन कुमार ने कृति पर बात रखते हुए कहा- “कैलाश बनवासी गाँवों की दुर्दशा को केन्द्र में रखकर कहानी लिखने वाले विरले कथाकार है। इनकी कहानियों का फलक काफी बड़ा है। स्थितियों, स्मृतियों और किरदारों के माध्यम से इनका समय इसमें प्रवेश करता है और बदलते हुए यथार्थ को बड़ी सहजता से उजागर करता है। यह कहानियाँ हमारे जीवन अनुभव की करीब की कहानियाँ है। इसलिए इन्हें पढ़ते हुए पाठक का सहज ही जुड़ाव बन जाता है। यह कहानियाँ हमारे समय की छीजती जा रही संवेदना, मूल्यों के विघटन और बदलते समय और समाज की बड़ी बारीकी से पड़ताल करती हैं।”
कार्यक्रम का संचालन सुबोध देवांगन तथा आभार प्रदर्शन जन संस्कृति मंच दुर्ग-भिलाई के सचिव सुरेश वाहने ने किया।

• प्रो. जयप्रकाश कृति पर चर्चा करते हुए बोले – कहानी साहित्यिक विधाओं में सबसे कठिन विधा है…

• प्रो. सियाराम शर्मा ने कहा कि – ‘ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान’ की कहानियां सामाजिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने की प्रक्रिया और साम्प्रदायिक माहौल की गहराई से पूरी संवेदनशीलता के साथ पड़ताल करती है…

• कथाकार कैलाश बनवासी ने अपनी कृति पर वक्तव्य देते हुए कहा कि मेरी कहानियां छत्तीसगढ़ के जनजीवन पर देश काल की स्थितियां कैसा असर डाल रही हैं, उनके राग-रंग, दुःख-सुख आदि को प्रकट कर सकने की कोशिशें हैं…
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‘ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान’ की समीक्षा देश के सुप्रसिद्ध कथाकार लोकबाबू ने कुछ इस तरह की. लोकबाबू कार्यक्रम में उपस्थित नहीं हो सके, उन्होंने उद्बोधन/समीक्षा ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ के संपादक प्रदीप भट्टाचार्य को प्रेषित किया. पूरी समीक्षा हम हूबहू प्रकाशित कर रहे हैं…

• कथाकार कैलाश बनवासी
* इस संग्रह की ज्यादातर कहानियाँ पढ़ते हुए मुझे अत्यधिक प्रसन्नाता हुई और कुछ कहानियों ने जिसमें ‘उमस’, ‘पीपल’ भी है. मेरे मन में ईष्या पैदा कि काश ये मेरी लिखी हुई कहानियाँ होती!
* कैलाश जी के इस संग्रह की कहानियां सीधी-सरल, मर्म को छुती हुई और संवेदनशील हैं. इन्हें समझने और समझाने के लिए आलोचना की जरूरत भी नहीँ है.
* ज्यादातर कहानियां निम्न वर्ग, निम्न मध्यवर्ग की चिंताओं और उनकी परिस्थितियों पर केंद्रित हैं और एक टीस दे जाती है.
* कहानी ‘लुप्त होता इंद्रधनुष’- एक गरीब छात्र की पंचमढ़ी जाने की इच्छा पर गरीबी के कुठाराघात से टूटते इंद्रधनुष की कहानी है.
* ‘ठग्स ऑफ़ हिन्दोस्तान’ कहानी समाज पर व्यंग्य करती है. छोटे ठगों पर उसकी नज़र तो है किंतु बड़े ठगों को वह अनदेखा करता है.
* गाँव से जोड़े रखने वाले ‘बबा’ हो या ‘पीपल’, सुंदर कहानी बनी है. ‘पीपल’ और ‘बबा’ मरकर भी दूसरों को कुछ दे जाते हैं.
* थाना, कचहरी, चिकित्सा, शिक्षा आज आम आदमी की फटी जेब पर डाका डाल रहे हैं. ईलाज को डॉक्टर वकील के मुकदमें की तरह खींचते चले जाते हैं. ‘एक्स रे’ ऐसी ही कहानी है.
* कथावाचक रीतू की सुंदर कहानी है ‘उमस’. वह प्रेम विवाह कर खुद तो खुश हो जाती है किंतु इसका जो प्रभाव परिवार पर पड़ता है, उसकी यह कहानी सुंदर अभिव्यक्ति है.
* नीरा की आत्महत्या की कोशिश को दर्शाती कहानी ‘रात की तरह’ एक साधारण कहानी है.
* ‘आयुष्मान पूर्णिमा’ – यह कहानी भी मुझे साधारण लगी. किंतु बेरोजगारी के दंश को दर्शा ती कहानी ‘अलगाव’ एक प्रभावशाली कहानी बन पड़ी है. ‘नकल पे नकेल’ कहानी आज की ज्यादातर परीक्षा व्यवस्था के ढांचे पर करारा व्यंग्य करती बेहतरीन क हानी है. कहानी ‘शोक’ अपने अनावश्यक विस्तार के कारण कमजोर लगती है.
* आज देश में हिंदू-मुसलमान पर खूब डिबेट चल रही है. लोगों में मुसलमान के प्रति घृणा और दूरी को बढ़ाये जाने की प्रवृत्ति को रेखांकित करती अच्छी कहानी है ‘जागरूक नागरिक’.
* ‘तीर्थयात्रा’ कहानी कुछ ज्यादा लंबी हो गई है जो बाकी सभी कहानियों से ज्यादा जगह घेरने के बावजूद अधिक प्रभावित नहीं करती. इसमें ‘तीर्थयात्रा’ को जाने का लंबा विवरण है, मगर एक झटके में यहां लौटना हो जाता है. अपनी उपदेशात्मकता के कारण भी यह अन्य कहानियों से एकदम अलग है.
मगर कुल मिलाकर कैलाश बनबासी का यह कथा संग्रह, पूर्व के संग्रहों से ज्यादा प्रभावशाली, संवेदनशील और स्मरणीय बन पड़ा है. इसका अंग्रेजी शीर्षक चौकाता भी है. इस संग्रह के लिए कैलाश बनवासी को हार्दिक बधाई और शुभकामनाएं. मैं आशा करता हूँ कि आप इसी तरह और इससे भी बेहतर लिखें और हमारे अंचल का नाम रोशन करें.
धन्यवाद
– लोकबाबू
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• सभागार में उपस्थित प्रबुद्धजन
इस आयोजन में साहित्यकारों, संस्कृतिकर्मियों, बुद्धिजीवियों और पाठकों की उपस्थिति रहीं जिनमें प्रमुख रूप से रवि श्रीवास्तव, विजय वर्तमान, वासुकि प्रसाद ‘उन्मत्त’, मणिमय मुखर्जी, शरद कोकास, राजकुमार सोनी, समीर दीवान, वी. एन. प्रसाद राव, सुमन साहू, शुचि ‘भवि’, ओमकुमारी देवांगन, मेनुका श्रीवास्तव, राजेन्द्र सोनबोइर, संग्राम सिंह निराला, डॉ. नौशाद सिद्दीकी, दिनेश कुमार, राकेश यादव, नमन अवसरिया, अशोक अवसरिया आदि शामिल हैं।
[ • रपट, सुरेश वाहने ]
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