- Home
- Chhattisgarh
- ‘साहित्य सृजन संस्थान,रायपुर’ : पितृ दिवस पर आयोजित काव्य संध्या में अनेक रचनाकारों ने प्रस्तुति दी : सर्वश्रेष्ठ रचना के लिए राजकुमार धर द्विवेदी, डॉ. वेणुधर रौतिया एवं डॉ. अभिषेक तिवारी को सम्मानित किया गया
‘साहित्य सृजन संस्थान,रायपुर’ : पितृ दिवस पर आयोजित काव्य संध्या में अनेक रचनाकारों ने प्रस्तुति दी : सर्वश्रेष्ठ रचना के लिए राजकुमार धर द्विवेदी, डॉ. वेणुधर रौतिया एवं डॉ. अभिषेक तिवारी को सम्मानित किया गया

छत्तीसगढ़ आसपास [रायपुर से डॉ. नौशाद अहमद सिद्दीकी ‘सब्र’]
एक पिता हैं जनक समान
चार सुता उनकी पहचान
एक बेटा उनका धीरवीर
वह तेजस्वी है और गंभीर
डॉ परमेश्वरी दास
हर एक दर्शन में रहते हैं पिताजी।
मेरे सृजन में रहते हैं पिताजी।
समस्या में उलझ जाऊं अगर मैं।
तो फिर उलझन में रहते हैं पिता जी।।
~ राकेश तिवारी
चलने की उम्र में, जो दौड़ना सिखाता है
हर ख्वाब को हमारे, जो अपनी आंखों में बसाता है
और वीराने जीवन में, जो दीप उम्मीद के जलाता है
हां वही शख्स पिता कहलाता है
अदिति वर्मा
मेरे पिता राम है
गीता और कुरान है
उनकी छत्र छाया संसार है
उनके हर शब्द संविधान है।
वीर अजीत शर्मा
अपने बच्चों को देते दुआ हर वक़्त वालीदेन हैं
दुनिया में खुदा की सदाक़त, वालीदेन हैं
दौलत, शौहरत, रुतबा, सब ठीक है मगर
इंसा को खुदा की सबसे बड़ी नेमत वालीदेन हैं
फरीदा शाहीन
भिलाई
ग़ज़ल
हमारी शान के परचम पिताजी ।
कभी रहबर कभी हमदम पिताजी ।
हरिक फरमाइशें पूरी करे वो,
कहाँ कहते बजट है कम पिताजी ।
डॉ गीता विश्वकर्मा ‘नेह’
कलंगपुर, बालोद
“पिता ”
माँ अगर होती ज़मीं तो
आसमां होते पिता
घर की हर दीवार को
रखते सम्हाले हैँ पिता l
राह के सब शूल चुनकर
फूल भर देते हैँ वो,
प्रेम का निश्चल सा झरना
होते हैँ हर एक पिता l
पूर्वा प्रभा श्रीवास्तव
.……….ग़ज़ल
……………..बाबूजी
कहीं दूर जायेंगे बाबूजी मेरे
बहुत याद आयेंगे बाबूजी मेरे
चले जाते हैं काम करने को दिन भर
यूँ बोझा उठायेंगे बाबूजी मेरे
अशोक कुमार दास
कोसरंगी, रायपुर (छ.ग.)
पिता
विधा – दोहा
जलकर तपते धूप में , छाले पड़ते पाँव।
बनकर बरगद-तरु पिता, देते शीतल छांँव।।
न्योछावर जीवन किया , संतानों के नाम।
पिता देवता तुल्य है , शत्-शत् बार प्रणाम।।
जुगेश चंद्र दास
कोसरंगी
रायपुर छत्तीसगढ़
वो फ़रिश्ता ना सहीं पर जाँ लुटाना याद है।
इक पिता की भूमिका उनका निभाना याद है।
जोड़ कर जो थे रखे पैसों को सारे तोड़ कर,
मुश्किलों में भी बहुत ही घर चलाना याद है।
दशरथ सिंह भुवाल सोनपांडर भिलाई छत्तीसगढ़
————— दोहे —————
बापू होते भाव से , श्रीफल के दो छोर।
अंदर से तो नर्म हैं, ऊपर लगें कठोर।।
बापू जीवन की धुरी, उनसे ही परिवार।
बापूजी की जेब में, खुशियाँ भरी अपार।।
राकेश अग्रवाल
पिता वट वृक्ष सम
———————————————-
देने हमें सारे सुख, सह लेते प्यास भूख,
संबल स्वरूप पिता,
कष्ट हर लेते हैं।
चरणों में शीश धरें, पिता का सम्मान करें,
काँधें पर बिठा कर,
सारे सुख देते हैं।
:सुषमा पटेल
बाबा (पिता की याद)
सब कुछ पूरा करके माँ करती पूरी भरपाई,
पर बाबा तुम्हारी कमी कभी सह नहीं पाई।
बिन तुम्हारे खुशियाँ कुछ ठहर नहीं पातीं,
यादें खूब रूलाती अब मैं वहाँ रह नहीं पाती।
पल्लवी झा (रूमा)
रायपुर छत्तीसगढ़
मौज़ूदगी में आपकी, चिन्ता से मुक्त थे
दुख दर्द ज़िन्दगी से हमारी विलुप्त थे
पाबन्द आप वक्त के, स्वभाव शांत शांत
कोमल थे दिल से और इरादे सशक्त थे
(आर डी अहिरवार)
🧑🏻🌾 ** पिता ** 👩🌾
पिता नींव है घर की मानो।
बात सही ये जिद मत ठानो।
किसके दम पर टिका हुआ घर,
अपने घर में ही पहचानो।
।। राजेंद्र रायपुरी।।
हमारे दिल की धड़कन है हमारी जान बाबूजी
हमारे घर की रौनक है हमारी शान बाबूजी
सदा कहते थे तेरा तो अभी ये बाप ज़िंदा है।
खुले आकाश में तू उड़ बहादुर तू परिंदा है
सदा पंखों में हिम्मत की भरे उड़ान बाबूजी।।
दिनेश राठौर दानिश
केवल एक दिल नहीं रखता,
लाखों दिलों का वह बादशाह होता है
अपने बच्चों के लिए हर पिता,
मुश्किलों में भी रास्ता होता है
भुनेश्वर साहू रायपुर
ना दिल में कोई पश्चाताप होता है l
ना चेहरे पर कोई संताप होता है l
बच्चों क़ो बनाने में मिट जाये खुद –
जहाँ में वो सिर्फ एक बाप होता है l
उमेश कुमार सोनी ‘नयन’
मां धरा तो है पिता क्या, एक पहेली हम भी जाने,
मां सहेली तब पिता क्या, बात अगली हम भी माने।
बिन छतों के घर हों कैसा, बूझो समझो क्या पिता,
जिसने खोया उसने समझा, क्या पहेली है पिता,
मेरी गुड़िया कह के तुम ही, कर देते पुचकार ।
कौन करता स्वार्थी जग में, मां बाबा सा प्यार।।
-सोमू प्रवीण मिश्रा
तपती धूप में जो कर देते हैं जीवन में छांव,
पिता साथ हो तो ही बसता है रिश्तों का गांव।
कष्ट घनेरे सह लेते पर उफ भी नहीं जो करते,
अपने हिस्से के सुख देकर देते हैं खुशी की ठांव।
ऊंच नीच का फर्क बताते हैं पिता,
भ्रमित हुये तो राह दिखाते हैं पिता।
खुद पथरीली राहों पर चलकर,
जीने का मर्म सिखाते हैं पिता।
ममता खरे ‘मधु’




कार्यक्रम में किशोर लालवानी,वंदना ठाकुर, हबीब खान समर,बागबाहरा,अंजु पाण्डेय अश्रु,सुरेन्द्र रावल, सरोज सप्रे,संजय देवांगन, डॉ.सिद्धार्थ श्रीवास्तव, डॉ,वेणुधर रौतिया,रूमाली, शिव शंकर गुप्ता, मोहित कुमार शर्मा,अदिति वर्मा,अनामिका शर्मा,राममूरत शुक्ला, शमा भारती,संतोष शर्मा,मंजूषा अग्रवाल, डॉ साधना कसार, दानीराम वर्मा,आशा मानव,डॉक्टर चंद जैन अंकुर,मिताली वर्मा ,शिव सोनी,यशवंत यदु,दशरथ सिंह भुवाल,भिलाई,ओस मानी साहू,आर.विश्वकर्मा, शुभा शुक्ला,मन्नू लाल यदु,दीपिका ऋषि झा,ने काव्य पाठ कर उपस्थिति दर्ज कर एक शाम पिता के नाम कार्यक्रम का आनंद लिया।
रिपोर्टर
डा, नौशाद अहमद सिद्दीकी, सब्र,
🟥🟥🟥
chhattisgarhaaspaas
विज्ञापन (Advertisement)