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‘बंगीय साहित्य संस्था’ : ‘कॉफी विथ साहित्यिक विचार-विमर्श आड्डा- 83 में शामिल हुए- स्मृति दत्त, गोविंद पाल,दुलाल समाद्दार, प्रकाशचंद्र मण्डल,प्रदीप भट्टाचार्य, बृजेश मल्लिक, विपुल सेन, सुजॉशा सेन, आलोक कुमार चंदा, पं. बासुदेव भट्टाचार्य,शंकर भट्टाचार्य और रविंद्रनाथ देबनाथ

[ बाएँ से ] 👉 सुजॉशा सेन, रविंद्रनाथ देबनाथ, बृजेश मल्लिक, आलोक कुमार चंदा, प्रदीप भट्टाचार्य, प्रकाशचंद्र मण्डल, स्मृति दत्त, दुलाल समाद्दार,गोविंद पाल, शंकर भट्टाचार्य, विपुल सेन और पं. बासुदेव भट्टाचार्य
‘छत्तीसगढ़ आसपास’ [भिलाई निवास,इंडियन कॉफी हाउस : 21 जून, 2025 : रिपोर्ट-प्रस्तुति प्रदीप भट्टाचार्य]
विगत 65 वर्षों से इस्पात नगरी भिलाई में बांग्ला साहित्यिक, संस्कृति एवं सांस्कृतिक उद्देश्य को लेकर संचालित ‘बंगीय साहित्य संस्था’ प्रति सप्ताह ‘कॉफी विथ साहित्यिक विचार-विमर्श आड्डा’ का आयोजन संस्था द्वारा किया जाता है. इस कड़ी में आड्डा-83, 21 जून, 2025 को भिलाई निवास के इंडियन कॉफी हाउस में सम्पन्न हुई. इस विचार-विमर्श में शामिल हुए- ‘बंगीय साहित्य संस्था’ की उप सभापति एवं बांग्ला की देशव्यापी चर्चित लेखिका एवं वयोवृद्ध कवयित्री स्मृति दत्त, लब्धप्रतिष्ठित लेखक व कवि गोविंद पाल, ‘मध्यबलय’ के संपादक दुलाल समाद्दार, बांग्ला- हिन्दी के चर्चित कवि प्रकाशचंद्र मण्डल, ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ के संपादक एवं प्रगतिशील कवि प्रदीप भट्टाचार्य, राष्ट्रवादी कवि बृजेश मल्लिक, साहित्यिक व सामाजिक चिंतक आलोक कुमार चंदा,बांग्ला कवि विपुल सेन, बांग्ला गायिका श्रीमती सुजॉशा सेन, हिंदुत्ववादी कवि पं. बासुदेव भट्टाचार्य,शंकर भट्टाचार्य और रविंद्र नाथ देबनाथ.
आज के ‘कॉफी विथ साहित्यिक विचार-विमर्श आड्डा- 83’ की अध्यक्षता स्मृति दत्त और विशिष्ट अतिथि गोविंद पाल एवं दुलाल समाद्दार थे.संचालन प्रकाशचंद्र मण्डल एवं आभार व्यक्त आलोक कुमार चंदा ने किया.
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आज विचार-विमर्श के प्रारंभ में 11 वें अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर बंगीय सदस्यों ने अपने-अपने विचार रखे-

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस प्रतिवर्ष 21 जून को मनाया जाता है. यह दिन वर्ष का सबसे लंबा दिन होता है और योग भी मनुष्य को दीर्घ जीवन प्रदान करता है. पहली बार यह दिवस 21 जून 2015 को मनाया गया, जिसकी पहल प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदीजी ने 27 सितम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र महासभा में अपने भाषण से की थी.
नरेंद्र मोदीजी ने कहा था कि-
21 जून को ही योग दिवस क्यों मनाया जाता है. इस सवाल का जवाब ज्योतिष विज्ञान में मिलता है. 21 जून का दिन उत्तरी गोलार्ध का सबसे लंबा दिन है, ग्रीष्म संक्रांति के बाद सूर्य दक्षिणायन का समय आध्यात्मिक सिदिद्धयां प्राप्त करने में बहुत लाभकारी माना जाता है. इसी कारण 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस मनाया जाता है.
योग भारत की प्राचीन परंपरा का एक अमूल्य उपहार है. यह दिमाग और शरीर की एकता का प्रतीक है. 11 दिसम्बर 2014 को संयुक्त राष्ट्र के 177 सदस्यों द्वारा 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस को मनाने के प्रस्ताव को मंजूरी मिली. 90 दिनों के अंदर पूर्ण बहुमत से पारित किया गया, जो संयुक्त राष्ट्र संघ में किसी दिवस प्रस्ताव के लिए सबसे कम समय है. न पूजा की जरूरत, न प्रार्थना की बात, योग तो है बस भीतर की शांत सौगात. ना कोई पंथ, ना संप्रदाय का नाम, योग करता है सबको संतुलित करने का काम. 170 से अधिक देशों में प्रचलित है योग. नरेंद्र मोदीजी ने कहा – दुनिया इस बात को स्वीकार कर चुकी है कि शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए योग बेहतर कारगर है. छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री विष्णुदेव साय कहते हैं – योग न केवल शरीर को स्वस्थ रखता है, बल्कि मन को भी शांत करता है और हमें प्रकृति के करीब लाता है.
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आज जिन्होंने अपनी-अपनी बांग्ला-हिंदी में रचना का पाठ किया-

स्मृति दत्त ने बांग्ला में दो कविता ‘नशाखोर’, ‘छद वृद्धश्रम’/दुलाल समाद्दार ने ‘शीतलपाठी’, बंगीय साहित्य संस्था के संस्थापक स्व. शिबव्रत देवानजी को समर्पित रचना ‘शिबु दा’, प्यार की भावना को व्यक्त करती हुई कविता ‘सुदुताई’ {सिर्फ तुम}/ गोविंद पाल ने ‘मानुष-र-खोजे’ {मनुष्य की खोज में}, ‘मानुष माने मृत्युजंय’ और हिंदी में प्रयोग की गई दोहा-गोविंद के दोहे ‘भटक चुके जड़ों को…’/ विपुल सेन ने ‘प्रताड़ना’ और ‘कॉफी हाउस’/ सुजॉशा सेन ने दुलाल समाद्दार की कृति ‘निर्वाचित कविता’ से ‘सर्वनाम’ और ‘प्रतिशोध’

प्रकाशचंद्र मण्डल ने ‘आलोकिक’, ‘आज वो बांधा आछी…’ एवं ‘पोका’/ आलोक कुमार चंदा ने ‘निर्वाचित कविता’ संग्रह से एक कविता ‘मानुषिक टाका-पौसा’/ पं. बासुदेव भट्टाचार्य ने छोटी-छोटी कविता ‘पिछोने आझे’, ‘शेष इच्छा’, ‘प्रतिध्वनि’ और ‘मशीनी-र-जुगे’ {मशीनीयुग} बृजेश मल्लिक ने ‘मां- आमार स्वर्गवासी माँ’, ‘फैशन का जमाना’ और ‘अल्ला मेघ दे ईश्वर पानी दे’/शंकर भट्टाचार्य ने हिंदी में दो कविता ‘हांफती जिंदगी’ और ‘दीवार में टन्गी तस्वीर’

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प्रदीप भट्टाचार्य ने ‘इतिहास’ के दो चित्रों को रेखाकिंत करते हुए अपनी कविता का पाठ किया, कुछ इस तरह-
* वे अपने ही इतिहास पर/साध रहे हैं निशाना/जिन्हें नहीं आता है/इतिहास को बनाना.
* इतिहास भी/अपने इतिहास पर/रो रहा है/यह देखकर कि/क्या से क्या हो रहा है.


[ • रिपोर्ट/प्रस्तुति – प्रदीप भट्टाचार्य ]
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chhattisgarhaaspaas
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