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अपनी बात : प्रेतीनों की पुकार – नावेद रजा ‘दुर्गवी’
शहर का वह मोहल्ला जहाँ शायर रज़ा रहते थे, हमेशा शोर से गूंजता रहता था। बच्चों की किलकारियाँ, गलियों में बजते लाउडस्पीकर, विक्रेताओं की पुकारें — इन सबके बीच रज़ा साहब की ग़ज़लें अधूरी रह जातीं। कुछ मिसरे आते, फिर खो जाते शोर में।
कई दिनों से रज़ा बेचैन थे। उनके भीतर भावनाओं की बाढ़ थी, मगर शब्दों में ढलने से पहले ही वह ध्वनि-प्रलय में बह जाती थी।
एक शाम, थके-हारे रज़ा साहब ने सोचा,
“क्यों न शहर से दूर किसी शांत जगह चलूं, जहाँ शब्दों को जन्म देने वाला सन्नाटा मिले?”
डायरी, पेन और मोबाइल लेकर वे निकल पड़े। कुछ किलोमीटर दूर, एक पुराना पुल — जहाँ ना भीड़, ना शोर। पुल के एक ओर इमली का विशाल वृक्ष, दूसरी ओर कांटेदार बेर। नीचे खेतों में लहलहाती धान की बालियाँ और उनकी पीठ सहलाती शीतल हवा। पुल के नीचे बहती नदी की मधुर कलकल ध्वनि मानो संगीत सी लग रही थी।
यहीं रज़ा साहब अपनी गाड़ी एक ओर खड़ी कर, पुल पर बैठ गए। कुछ देर तक उन्होंने पंक्तियाँ सोचीं, फिर पीठ के बल लेट गए। सिर के नीचे डायरी, एक हाथ में पेन। आकाश में तारे टिमटिमा रहे थे, और धीरे-धीरे रज़ा साहब नींद की गोद में समा गए।
जब जागे, तो रात का गहरा अंधेरा फैल चुका था। मगर उन्हें डर नहीं लगा। वे वापस घर लौटे। पत्नी के साथ भोजन कर, बातें कीं और उसे सुलाकर अपने अध्ययन कक्ष में चले आए।
रात्रि के तीसरे पहर, अचानक दरवाज़े पर खटखटाने और स्त्रियों की धीमी बातचीत की आवाज़ ने उन्हें चौंका दिया।
दरवाज़ा खोलने पर, सामने चार-पाँच युवा लड़कियाँ खड़ी थीं — चेहरों पर अजीब सी गंभीरता, और आँखों में नमी।
“रज़ा साहब…”
“इतनी रात? आप कौन हैं?”
“हमें आपसे बात करनी है… जरूरी है… अभी।”
“मैं अपनी पत्नी को बुला लूं…”
“नहीं… हम सिर्फ आपसे बात करना चाहती हैं। कुछ पल का वक्त चाहिए, बस।”
शायर थोड़ी दुविधा में थे, मगर मान गए। वे उन्हें भीतर ले आए।
एक लड़की ने जेब से डायरी का पन्ना और रज़ा साहब का पेन निकालकर दिया।
“ये… आपने पुल के पास गिराया था।”
रज़ा चौंक गए,
“पन्ना तो मैं इमली के पेड़ के नीचे भूल गया था, लेकिन… पेन तो मेरी जेब में था! ये तुम लोगों के पास कैसे?”
अब तक वातावरण रहस्यमय हो चला था। तभी एक युवती ने धीरे से कहा,
“हम आत्माएं हैं… प्रेतीन…!”
शायर स्तब्ध रह गए।
“क्या कह रही हो तुम?”
“हम उन पेड़ों से बंधी आत्माएं थीं… जो वर्षों से वहीं बसी थीं। हम उन लड़कियों की आत्माएं हैं जिन्हें समाज ने जीते जी मार डाला। गरीब घर की लड़कियाँ थीं हम। परिवार के लिए, भाई की पढ़ाई के लिए, माँ की दवा के लिए… हमने बार में काम करना शुरू किया। वहाँ के मालिक ने… हमारे विश्वास का गला घोंटा।”
दूसरी युवती बोल पड़ी,
“नशे की दवा देकर हमारी इज्ज़त लूट ली गई… और एड्स जैसे श्राप का बोझ देकर हमें मरने को छोड़ दिया।”
“हमने किसी से कुछ नहीं कहा। एक-एक कर आत्महत्या कर ली — शर्म से, बेबसी से।”
“और तब… हम पेड़ों में बंध गए। मगर जब आप आए… आपने इमली का फल तोड़कर खाया, अपने धर्म की आयतें पढ़ीं… बीज बोकर प्रार्थना की… और हमारी आत्माएं बंधनमुक्त हो गईं।”
रज़ा साहब नि:शब्द थे।
“हम आपके शेरों में संवेदना देखते हैं, इंसानियत महसूस करते हैं। हम जानती हैं, आप वो इंसान हैं जो समाज का आईना बन सकते हैं।”
“हमें मुक्ति चाहिए… और उन मासूम लड़कियों के लिए सुरक्षा, जो आज भी उस बार में काम कर रही हैं।”
“हम आपके लिए कुछ रूपये छोड़ गई हैं… अपने परिवारों के लिए। उन्हें अपना समझिए। और हमें शांति दीजिए।”
यह कहते ही वे युवतियाँ एक के बाद एक धुंध में विलीन हो गईं।
सुबह होते ही रज़ा साहब ने सच्चाई की खोज शुरू की। पुराने केस, फर्जी नामों से आत्महत्याएं, गुमशुदगी की रिपोर्टें — सब जोड़कर एक बड़ा राज़ सामने आया। उन्होंने पुलिस और पत्रकारों की मदद से उस बार के मालिक का पर्दाफाश किया। मामला सामने आया, बार सील हुआ, आरोपी सलाखों के पीछे गया।
प्रेतीनों के परिजनों से संपर्क कर रज़ा ने उन्हें सहायता पहुंचाई। और स्थानीय पुजारियों की मदद से आत्माओं की शांति के लिए विधिवत कर्म कराए गए।
अब भी कभी-कभी उन आत्माओं की परछाईं पुल के पास या रज़ा के कमरे में महसूस होती है — मगर डर नहीं, बल्कि शांति के साथ।
वे आती हैं रज़ा की शायरी सुनने…
क्योंकि हर प्रेतीन बुरी नहीं होती — कई बार वह बस इस समाज की बेरुखी की शिकार होती है।

• संपर्क-
• 99071 21451
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