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‘प्रत्यावर्तन- स्वयं की ओर’ : ‘स्वयंसिद्धा’ संस्था की स्थापना के 20 वर्ष पश्चात प्रकाशित स्मारिका ‘प्रत्यावर्तन’ महिला सशक्तिकरण की ओर उठाए गए कदमों को समेटने का एक प्रयास है- अनंत पुरोहित

मुझे आज़ादी चाहिए
परिवार से नहीं,
पुरानी मान्यताओं से
रिश्तों से नहीं,
रूढ़िवादी परंपराओं से
घर से नहीं,
बंधनों से
अंधविश्वास से, अशिक्षा से
घिसे-पिटे नियमों से, अपमान से
मुझे पंख चाहिए, नई उड़ानों के
परिवार की धुरी हूॅं
मैं हूॅं स्वयंसिद्धा……
डॉ.सोनाली चक्रवर्ती (दीदी) की ये पॅंक्तियाॅं न केवल उनके समूचे व्यक्तित्व को व्यक्त करती हैं बल्कि यह उनके संस्था “स्वयंसिद्धा – ए मिशन विथ विज़न” को भी परिभाषित करती हैं। दीदी की आज़ादी की माॅंग बहुत से विवादस्पद संगठनों की आज़ादी की माॅंग से बिल्कुल अलग सकारात्मक सोच लिए हुए है।
संस्था की स्थापना के 20 वर्ष पश्चात प्रकाशित स्मारिका ‘प्रत्यावर्तन’ दीदी के द्वारा महिला सशक्तिकरण की ओर उठाए गए कदमों को समेटने का एक प्रयास है।
दीदी के कार्यों, उनकी लगन व मेहनत को किताब के चंद पन्नों में समेटना एक दुष्कर कार्य है। यह संभव ही नहीं है। परंतु जो इस संस्था से अभी-अभी जुड़े हैं, उन्हें संस्था के कार्यों की एक झलक मात्र दिखाती है यह किताब।
अपनी नानी की वेदना से व्यथित व प्रेरित होकर दीदी ने इस संस्था की स्थापना की। प्रत्यावर्तन के संपादकीय में अपने पति से उपेक्षित, पति प्रेम को तरसती नानी की वेदना को उन्हीं के शब्दों में लिखा है – “जितना सुहाग मेरे नाम लिखा है, सब भगवान इसी जनम में पूरा कर दे बस यही इच्छा है। दूसरे किसी जनम में शादी करके यह ‘सौभाग्य’ दुबारा न भोगना पड़े, इसीलिए यह सुहाग चिन्ह नहीं मिटाती”
इन कथनों के पीछे छुपी वेदना को समझ पाना संभव नहीं है। यह उसी के लिए ही संभव है जिसने इसे साक्षात् जिया है या फिर उस व्यक्ति को इस वेदना से गुजरते देखा है। दीदी की असीमित इच्छाशक्ति, साहस और परिश्रम निस्संदेह इन्हीं पॅंक्तियों से ही प्रेरित हैं और इसी का ही परिणाम है – “स्वयंसिद्धा – ए मिशन विथ विज़न” जो महिलाओं को अवसाद से निकालने और उनके सपनों को पंख देने का महान कार्य कर रही है।
माता सरस्वती की वरदपुत्री सोनाली दीदी की लगन, मेहनत व जुझारूपन अवश्य उनकी विशिष्टताऍं हैं परंतु उनकी विनम्रता उन्हें अद्वितीय बनाती है। इसी विनम्रता को उनकी शिष्या ईजा नेल्सन पाॅल कुछ इस तरह लिखती हैं – …… she seemed to us genuine, humble and gentle and I felt it wasn’t the awards or beautiful home, it’s her being herself made that class and home, Magical!
उनके एक अन्य छात्र नित्य सुंदर शर्मा लिखते हैं – सत्य के रास्ते में चलना ही जीवनबोध का मूलमंत्र होता है। चलने की गति को सटीक दिशा में चालित करने के लिए एक माध्यम, एक गुरु चाहिए।
निस्संदेह गुरु के बिना ज्ञान नहीं है। जिस प्रकार शिष्य चयन में प्राचीन भारतीय गुरु अत्यंत कठिन मानदंड रखते थे, उसी प्रकार गुरु का चयन भी सही होना अत्यंत आवश्यक है। स्वामी विवेकानंद ने अपनी स्वयं की कसौटियों पर खरा उतरने के पश्चात ही स्वामी रामकृष्ण परमहंस को अपना गुरु बनाया था। निश्चित ही सोनाली दीदी में एक अच्छे गुरु की सारी खूबियाॅं हैं, यह नित्य सुंदर जी के उपरोक्त वाक्यों से स्पष्ट हो जाता है।
इसी को ही शिष्या आस्था त्रिपाठी कुछ इस तरह बयान करती हैं – संगीत गुरु सिर्फ संगीत के ही नहीं वल्कि जीवन के सुरों को भी साधना सिखाते हैं।
स्मारिका में डाॅ सोनाली ने पद्मविभूषण तीजन बाई जी से अपनी मुलाकात के संस्मरण को एक अध्याय में स्थान दिया है। जिसमें छत्तीसगढ़ का एक कोहिनूर दूसरे कोहिनूर के लिए लिखता है – तीजन दीदी छत्तीसगढ़ के लिए कोहिनूर हीरा हैं और यह बात छत्तीसगढ़ के हर नागरिक व सरस्वती के वरदपुत्र अच्छी तरह जानते हैं।
तीजन बाई के सादगी और सरलता को बताता हुआ यह अध्याय अनेकों के मन में विनम्रता के बीज बो सकता है।
भारतीय संस्कार, संस्कार निर्माण में माता की भूमिका व परिवार के महत्व को दर्शाते हुए “आरक्षण नहीं अधिकार चाहिए” अध्याय में दीदी लिखती हैं – पारिवारिक विघटन के इस विसंगतियों के दौर में परिवार को बाॅंध के रखना एवं अपने बच्चों को संस्कारित करने में एक माॅं ही सबसे अहम् भूमिका निभा सकती है।
ये पॅंक्तियाॅं स्पष्ट करती हैं कि दीदी की भारतीय सामाजिक संरचना व ताना-बाना पर समझ अत्यंत गहरी है। हर माता जीजाबाई व जयवंता बाई जैसी हो तो निस्संदेह पुत्र शिवाजी और महाराणा प्रताप ही बनेगा। धृतराष्ट्र और गांधारी दुर्योधन को ही जन्म दे सकते हैं।
भिलाई की बहु नाटिका को जिसने प्रत्यक्ष न भी देखा हो तो विजय वर्तमान जी के आलेख को पढ़कर स्वयं को उस नाट्यशाला में बैठा हुआ अनुभव करेगा। नाटिका के बारे में विजय जी लिखते हैं – “सांस्कृतिक भिन्नताजन्य प्रारंभिक तकरारों…….. सबने मिलकर हौले से एक साझी संस्कृति की नीव रख दी”
भिलाई की अनोखी मिली-जुली संस्कृति का सूत्रपात करने वाली भिलाई की बहुऍं अवश्य ही बधाई की अधिकारिणी हैं। नाटिका के विषय में विजय जी आगे लिखते हैं – विपरीत परिस्थितियों में मनुष्य की रचनात्मक अनुकूलन क्षमता के सुखद संकेत नाटिका में व्याप्त हैं।
निश्चित ही यह इस बात का प्रमाण है कि प्रतिकूल परिस्थितियों में ही प्रतिभा के प्रसून प्रस्फुटित होते हैं।
कविता “वो जो कभी मंच पर नहीं चढ़ीं” आम गृहिणियों को समर्पित हैं। आम गृहिणियों के सपनों को पंख देने हेतु कविता की अंतिम पॅंक्तियों में मेनका जी लिखती हैं –
आइए इन्हें बहने दें
आज जी की बात खुलकर कहने दें
कविता की कसौटी पर न परखकर
इन्हें कलम से दोस्ती करने दें
सच बात है कि विवाह पश्चात गृहिणी बनते ही कइयों की प्रतिभा और सपने पाकशाला की चारदीवारी में दम तोड़ देती हैं। इन्हें खुलने का अवसर मिले तो क्या पता एक और सोनाली या तीजन बाई या महादेवी वर्मा मिल जाए राष्ट्र को।
आगे एक अन्य अध्याय में लिखा है – स्त्रियां ही स्त्रियों के लिए अपना हाथ बढ़ाती हैं तो दुनिया बदलने लगती है। यह सटीक विश्लेषण है। इसी का दूसरा पहलू जब स्त्री ही स्त्री की शत्रु हो जाए तो परिस्थितियाॅं कितनी भयानक हो जाती हैं अन्यत्र प्रकाशित एक नवगीत में –
केवल पुरुष नहीं है दोषी
सहभागी नारी भी
यौतुक प्राप्ति हेतु नारी ही
शत्रु बड़ी नारी की
बिन दहेज आई दुल्हन को
धनलोलुप ने मारा
दर्द चीखकर मौन हो गया
हृदय हुआ बेचारा
नारी नारी की सहयोग करने लगे, दहेज व अन्य कुरीतियों का पुरजोर विरोध करने लगे तो निश्चित ही हम एक कुरीति मुक्त समाज गढ़ने में सफल हो सकते हैं।
“टीम वर्क की मिसाल है स्वयंसिद्धा” आलेख में डाॅ. अंकुश देवांगन जी की पॅंक्तियाॅं -“उधर से खनकती आवाज ने टेलीफोनिक चर्चा में ही साबित कर दिया कि वह अपरिचित मेरी सगी बहन है”।
ठीक ऐसा ही अनुभव मेरा स्वयं का भी था जब मैंने पहली बार दीदी से बात किया था। किसी अजनबी को भी अपना बनाने में दीदी सिद्धहस्त हैं। या क्या पता कोई ‘मोहिनी चूरन’ अपने साथ छुपाकर रखती हैं और चुप से खिलाकर चल देती हैं, सब कोई उन्हें अपना मान लेता है और उतनी ही उदारता और विनम्रता से दीदी भी उन्हें अपना बना लेती हैं। इसका प्रमाण मैं स्वयं हूॅं – मुखपुस्तिका (फेसबुक) से प्रारंभ हुआ परिचय इतना प्रगाढ़ हो चुका है कि अब यह रक्त संबंध का मोहताज नहीं है। दीदी का स्नेह मुझ पर सगे भाई सा ही बरसता है। कभी-कभी तो लगता है कि ‘गौरा पंत ‘शिवानी’ के स्वयंसिद्धा की कोई काल्पनिक नायिका सजीव बनकर भिलाई में उतर आई है।
अंत में स्मारिका “प्रत्यावर्तन – स्वयं की ओर” एक पठनीय व अनुकरणीय किताब है जो निश्चित ही पाठकों के लिए प्रेरणा का स्रोत बनेगी।
स्वयंसिद्धा सोनाली व स्वयंसिद्धा – ए मिशन विथ विज़न’ को अनेकानेक शुभकामनाओं के साथ मैं कामना करता हूॅं कि दोनों ही उपलब्धियों के नये कीर्तिमान स्थापित करें।

[ • ‘प्रत्यावर्तन’ के विषय में लिखे इस आलेख के लेखक अनंत पुरोहित, पेशे से इंजीनियर एवं भाव से लेखक व कवि हैं. ]
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chhattisgarhaaspaas
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