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‘बंगीय साहित्य संस्था’ : ‘कॉफी विथ साहित्यिक विचार-विमर्श आड्डा- 84 में छत्तीसगढ़ के सुप्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय हास्य कवि पद्मश्री डॉ. सुरेंद्र दुबे को श्रद्धांजलि अर्पित की गई

[बाएँ से] विपुल सेन, बृजेश मल्लिक, शंकर भट्टाचार्य, समरेंद्र विश्वास, आलोक कुमार चंदा, प्रदीप भट्टाचार्य, प्रकाशचंद्र मण्डल, स्मृति दत्त, बानी चक्रवर्ती, पल्लव चटर्जी और वीरेंद्रनाथ सरकार
‘छत्तीसगढ़ आसपास’ [भिलाई निवास,इंडियन कॉफी हाउस : 28 जून, 2025 : रिपोर्ट-प्रस्तुति प्रदीप भट्टाचार्य एवं फोटो क्लिक-पल्लव चटर्जी]

[बाएँ से] विपुल सेन, बृजेश मल्लिक, शंकर भट्टाचार्य, समरेंद्र विश्वास, आलोक कुमार चंदा, प्रदीप भट्टाचार्य, प्रकाशचंद्र मण्डल, स्मृति दत्त, दुलाल समाद्दार, बानी चक्रवर्ती, शिवमंगल सिंह और वीरेंद्रनाथ सरकार
विगत 65 वर्षों से इस्पात नगरी भिलाई में बांग्ला साहित्यिक, संस्कृति एवं सांस्कृतिक उद्देश्य को लेकर संचालित ‘बंगीय साहित्य संस्था’ प्रति सप्ताह ‘कॉफी विथ साहित्यिक विचार-विमर्श आड्डा’ का आयोजन संस्था के सदस्य करते हैं. इस कड़ी में आड्डा-84, 28 जून, 2025 को भिलाई निवास के इंडियन कॉफी हाउस में सम्पन्न हुई. इस विचार-विमर्श में शामिल हुए- ‘बंगीय साहित्य संस्था’ की सभापति एवं बांग्ला-अंग्रेजी की प्रसिद्ध लेखिका बानी चक्रवर्ती,उप सभापति एवं बांग्ला की देशव्यापी चर्चित लेखिका एवं वयोवृद्ध कवयित्री स्मृति दत्त, लब्धप्रतिष्ठित बांग्ला लेखक व कवि समरेंद्र विश्वास, ‘मध्यबलय’ के संपादक दुलाल समाद्दार, बांग्ला- हिन्दी के चर्चित कवि प्रकाशचंद्र मण्डल, कवि पल्लव चटर्जी, ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ के संपादक एवं प्रगतिशील कवि प्रदीप भट्टाचार्य, कवि वीरेंद्रनाथ सरकार,राष्ट्रवादी कवि बृजेश मल्लिक, साहित्यिक व सामाजिक चिंतक आलोक कुमार चंदा,बांग्ला कवि विपुल सेन, नवोदित कवि शंकर भट्टाचार्य और जनकवि शिवमंगल सिंह.
आज के ‘कॉफी विथ साहित्यिक विचार-विमर्श आड्डा- 84 की अध्यक्षता बानी चक्रवर्ती, मुख्य अतिथि स्मृति दत्त, विशिष्ट अतिथि समरेंद्र विश्वास एवं दुलाल समाद्दार थे. विशेष आमंत्रित अतिथि थे- हिंदी के प्रसिद्ध कवि शिवमंगल सिंह. संचालन प्रकाशचंद्र मण्डल एवं आभार व्यक्त आलोक कुमार चंदा ने किया.
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स्मृति शेष : पद्मश्री डॉ. सुरेंद्र दुबे [जन्म- 8 अगस्त 1953 : मृत्यु- 26 जून 2025]

विचार-विमर्श एवं सभा प्रारंभ के पूर्व उपस्थित सदस्यों ने डॉ. सुरेंद्र दुबे को दो मिनट का मौन श्रद्धांजलि अर्पित किया-



👉 बंगीय सदस्यों द्वारा डॉ. सुरेंद्र दुबे को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए…
डॉ. सुरेंद्र दुबे का परिचय एवं उनकी साहित्यिक यात्रा के बारे में प्रदीप भट्टाचार्य ने कहा कि- जाने-माने हास्य कवि, पद्मश्री डॉ. सुरेंद्र दुबे का निधन 26 जून को हुआ. प्राप्त जानकारी के अनुसार उनका इलाज रायपुर के एडवांस कार्डियक इंस्टीट्यूट में चल रहा था. 25 जून को एंजियोग्राफी हुई, 100% ब्लॉकेज होने की वजह से तत्काल एंजियोप्लास्टी की गई, जो सफल रही. 26 जून को सुबह वार्ड में शिफ्ट कर दिया गया था,लेकिन दोपहर को कार्डियक अरेस्ट आया. 2-3 बार अरेस्ट आया और फिर वे शांत हो गए. डॉ. सुरेंद्र दुबे का जन्म बेमेतरा में 8 अगस्त 1953 को हुआ था. भारत के अधिकांश शहरों में उन्होंने अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों में हास्य कविताओं के माध्यम से लोगों को खूब हंसाया. अंतर्राष्ट्रीय मंचों [अमेरिका के 12 शहरों, दुबई,अरब देश, इंडोनेशिया,मस्कट ओमान] के साथ-साथ दूरदर्शन, आकाशवाणी में भी वे लोगों को अपने हंसमुख अंदाज से हंसाते रहे. 2010 में भारत के महामहिम राष्ट्रपति द्वारा उन्हें पद्मश्री अलंकरण से नवाजा गया. देश के अनेकों सम्मान से सम्मानित डॉ. सुरेंद्र दुबे को अंतरराष्ट्रीय सम्मान [अमेरिका के ओहियो राज्य के गवर्नर श्री बाव टफ द्वारा लीडिंग इंडियन पोयट सम्मान, मस्कट ओमान में भारत के राजदूत द्वारा श्रेष्ठ अंतरराष्ट्रीय प्रतिभा सम्मान] भी मिले.
मिथक मंथन, किस पर कविता लिखूँ, नवा सुरूज, मोर पंड़वा गंवागे, पीरा, दो पाँव का आदमी, सवाल ही सवाल है, कविता धरातल पर, हम बोलते क्यों नहीं?, नवभारत में कवितामाला, झूठ का परिणाम, डायमंड पॉकेट बुक्स द्वारा प्रतिवर्ष प्रकाशित हास्य व्यंग्य कविताएं, ऑडियो कैसेट, चेला
बोलिस गुरु सीडी और ‘छत्तीसगढ़ आसपास’ मासिक पत्रिका [फरवरी-2013] ने उनके व्यक्तित्व एवं कृतित्व को रेखांकित करती एकाग्र संग्रह ‘हास्य दर्शन अंक- साहित्य के सूर्य पद्मश्री डॉ. सुरेंद्र दुबे पर एकाग्र’ – संयोजन, संकलन, संपादन प्रदीप भट्टाचार्य के रचियता डॉ. सुरेंद्र दुबे को शत् शत् नमन.
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प्रदीप भट्टाचार्य ने डॉ. सुरेंद्र दुबे को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उनकी लिखी एक लोकप्रिय कविता ‘मैं बस्तर हूँ’ का पाठ किया-

मैं बस्तर हूँ/स्मृद्ध, सम्पन्न/लेकिन निर्धन/खून से तर हूँ/
मैं बस्तर हूँ.
मैं मुर्गी हूँ/जो सोने का अंडा/देती है/और अंडे को/बारूद पर सेती है/मैं गुमनाम लोगों का/घर हूँ/अब तो बंद/हो गई रुलाई/एक तरफ कुआं/एक तरफ खाई/एक तरफ जवान/एक तरफ हैवान/मौत के आगे/मैं मजबूर हूँ/सो बदतर हूँ/
मैं बस्तर हूँ.
मेरे नाम पर राजनीति/जिंदगी हार गई/मौत जीती/अब समझ गये/चिमनियों की ऊँचाई/कितनी होती/मैं खौफ हूँ/मैं डर हूँ/
मैं बस्तर हूँ.
मेरी फोटो आज/टांगने के काम आती है/मेरी संतानें/नाचने के काम/आती हैं/मेरी संस्कृति बस/फिल्माई जाती है/जब सब कुछ/ठूंठ हो जाता है/तो मोमबत्तीयां/जलाई जाती हैं/मैं आज लहू से/तर-ब-तर हूँ/
मैं बस्तर हूँ.
सुना है- दिल्ली से खूब/पैसा आता है/लेकिन- मुझ तक पहुँचने के/पहले ही पैसे का/पैर निकल जाता है/और वह उल्टे पाँव/लौट जाता है/विकास का सपना/सपना रह जाता है/मैं सपने का स्कूल हूँ/सपने का अस्पताल हूँ/सपने का घर हूँ/
मैं बस्तर हूँ.
मैं मानव अधिकार/की बहस हूँ/उद्योगपतियों की/हवस हूँ/मैं सरकार बनाने का/एक यंत्र हूँ/मैं अरण्य-पुत्रों की/गुज़र-बसर हूँ/
मैं बस्तर हूँ.
लेकिन लोग/मेरे हर दरख्त को/नक्सली मानते हैं/वे मेरे भोलेपन को/कहाँ जानते हैं/अब मुझे लोग/’नक्सल भू-भाग’ के/नाम से जानते हैं/प्रवेश करने के पहले/घबराते हैं/मुझ में मां ‘देंतेश्वरी’ का वास है/चित्रकोट का जलप्रपात है/मैं अकेले में/फुट- फूटकर रोता हूँ/मैं जिंदगी का/अंतिम प्रहर हूँ/ मैं बस्तर हूँ.
लोगों ने लाखों कमा लिए/मेरे विकास पर/करोड़ों बना लिए/मेरे विनाश पर/अरबों खा गए/मेरे सत्यानाश पर/मैं फिर भी कुबेर हूँ/शाश्वत हूँ/निरंतर हूँ/ मैं बस्तर हूँ.
वे मेरे साथ हैं/मेरा हर दरख्त/रात होते ही/कार्बन डाइऑक्साइड/छोड़ता है/और कोई चालबाजी करे/तो/उसे कहीं का नहीं/छोड़ता है/प्रेम, स्नेह, अपनापन/सब मेरे पास है/लेकिन कोई मुझे/ठगना चाहे/उसकी अर्थी के लिए/मेरे पास बाँस है/मैं दवा हूँ/मैं ज़हर हूँ/मैं बस्तर हूँ.
सुर और असुर में/मुठभेड़ जारी है/निर्दोष मर गये/कैसी लाचारी है/चलूँ! बहुत देर हो गई/मुझे लाशें उठाना है/मरघट ले जाना है/जंगल में मरघट नहीं/कहाँ जाना है/जिस कोख ने जन्म दिया/उसी कोख में दफनाना है/ किसी का बेटा मरा/तुम्हें कोई फर्क नहीं पड़ता/किसी का भाई मरा/तुम्हें फर्क नहीं पड़ता/किसी का बाप मरा/तुम्हें फर्क नहीं पड़ता/क्योंकि ये तुम्हारे लिए/एक वृक्ष है/और बस्तर यक्ष है/मैं दण्डाकारण्य हूँ/मैं भगवान राम की डगर हूँ/रावण जरूर मरेगा/मैं राम का शर हूँ
मैं बस्तर हूँ.
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आज जिन्होंने अपनी-अपनी बांग्ला-हिंदी में रचना का पाठ किया-

• वीरेंद्रनाथ सरकार ने व्यंग्य लघु कथा ‘वॉट की आत्मकथा’/ • शिवमंगल सिंह ने ‘विचारधारा’ और ‘लौट चलो गाँव की ओर…’/ • विपुल सेन ने ‘चिट्ठी’/ • बृजेश मल्लिक ने प्रकाशचंद्र मण्डल लिखित कविता ‘प्रेम आपर्यंत’, ‘पति का फर्ज’ और ‘समाधान’/ • शंकर भट्टाचार्य ने ‘चौराहे का दृश्य’ और ‘मैं प्रतिक्षा में…’.

• समरेंद्र विश्वास ने अनुकथा ‘वर्चुअल प्रेम’/ • आलोक कुमार चंदा ने प्रकाशचंद्र मण्डल लिखित दो छोटी-छोटी कविता ‘एक मित्र’ और ‘मां गो…’/ • प्रदीप भट्टाचार्य ने डॉ. सुरेंद्र दुबे लिखित चर्चित कविता ‘मैं बस्तर हूँ’/ • प्रकाशचंद्र मण्डल ने ‘बेचारा इंदुर’ और ‘आपेख कोरे लाभ की…’/ • पल्लव चटर्जी ने मुक्तक ‘तीन अद्भुत शब्द {भूत, वर्तमान, भविष्य} और ‘आड्डा’.

• कविता पाठ करती हुई ‘बंगीय साहित्य संस्था’ की उप सभापति एवं बांग्ला की सुप्रसिद्ध लेखिका व कवयित्री श्रीमती स्मृति दत्त : स्मृति दत्त ने बांग्ला में एक मार्मिक, गंभीर कविता ‘पृथ्वी ते-के-कबितार मृत्यु नई…’ सुनाई. इस कविता के माध्यम से उन्होंने यह संदेश देना चाहा कि कविता कभी मर नहीं सकती, वो हमेशा जीवंत है और जिंदा रहेगी.

• कविता पाठ करते हुए ‘बंगीय साहित्य संस्था’ की हाउस पत्रिका ‘मध्यबलय’ के संपादक एवं बांग्ला-हिंदी में लिखने वाले विचारशील कवि दुलाल समाद्दार : दुलाल समाद्दार ने बांग्ला में दो महत्वपूर्ण कविता ‘अशुक’ याने ‘बीमार’ और ‘आका सहोज ना’ याने ‘कलाकृति करना इतना आसान नहीं..’ ! दोनों कविता एक प्रश्न छोड़ जाती है?

• ‘बंगीय साहित्य संस्था’ की सभापति एवं बांग्ला-अंग्रेजी भाषा में सिद्धहस्त कवयित्री व लेखिका श्रीमती बानी चक्रवर्ती ने अपने उद्बोधन में कही कि- आज उपस्थित सभी सदस्यों की कविता कुछ न कुछ संदेश दे जाती है. कविता छोटी हो या लंबी हो. कविता में कुछ समकालीन कविता को जोड़ती हुई सार्थक रचनाशीलता होनी चाहिए. ‘आड्डा’ से लिखने वालों की रचना परिष्कृत के साथ- साथ नए-नए विषयों को लेकर अविष्कृत भी हो रहा है. कविता को पढ़ने के साथ-साथ उस कविता पर समालोचनात्मक समीक्षा भी जरुरी है. तब ‘आड्डा’ को और सार्थक बनाया जा सकता है.
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• ‘कॉफी विथ साहित्यिक विचार-विमर्श आड्डा-84’ के कुछ सचित्र झलकियाँ-

• प्रकाशचंद्र मण्डल अपनी नवीनतम कृति ‘फिर भी चलना होगा’ [हिंदी काव्य संग्रह] स्मृति दत्त को सप्रेम भेंट करते हुए…

• विपुल सेन को अपनी बांग्ला में प्रकाशित काव्य संग्रह ‘कॉखोन जे कोन कॉथा कबिता होए जाए’ भेंट करते हुए कृतिकार प्रकाशचंद्र मण्डल…

• ‘बंगीय साहित्य संस्था’ के सदस्य

• ‘बंगीय साहित्य संस्था’ के सदस्य

• ‘बंगीय साहित्य संस्था’ के सदस्य
[ • रपट एवं प्रस्तुति : प्रदीप भट्टाचार्य ]
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chhattisgarhaaspaas
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